बुआ का चेहरा फूला हुआ है। बुआ के आने से पहले शादी में आया दहेज अलमारी में रख दो। ओह! यह नया सूट सामने क्यों रख दिया, बुआ आते ही कहीं इसे मांग न ले। सोशल मीडिया पर बुआ को लेकर ‘मीम’ बनाने का चलन इतना ‘संक्रामक’ हो गया है कि एक बार फिर से समाज में फैले पितृसत्ता के संक्रमण पर नजर चली जाती है।
मीम वाली बुआ को परे हटा कर एक बार सवाल पूछते हैं कि कौन हैं देश की ज्यादातर बुआएं। वही बुआ, जब वह छोटी थी तो उन चार या छह बहनों में से एक थी, जिनकी कतार लगने के बाद उन्हें एक भाई मिला था। चार बहनों का संसाधन एक तरफ और एक भाई का संसाधन दूसरी तरफ। अगर शादी के लिए मामूली शिक्षा-दीक्षा जरूरी नहीं होती तो बुआ ने स्कूल-कालेज का मुंह भी नहीं देखा होता। बचपन में बुआ की हर इच्छा पर यही कहा जाता था कि जब शादी हो जाएगी तो अपने घर जाकर यह सब शौक-अरमान पूरे करना।
‘अपना घर’ यानी बुआ का बचपन जिस घर में बीत रहा था वह उसका अपना था ही नहीं। शादी के बाद पहला ताना यही मिला था कि पता नहीं अपने घर से क्या सीख कर आई है, पता नहीं अपने घर से क्या लेकर आई है। यानी अब वह घर अपना हो गया था, जिसे बचपन में अपने घर के तौर पर नकारा गया था। बुआ की शादी संपन्न परिवार में हुई है।
दूर का इंसाफ सुहाना लगता है: सोशल मीडिया के न्याय और वास्तविक जीवन की चुप्पी | मार्गदर्शन
बुआ का सपना ताजमहल, कश्मीर, मनाली जैसी जगहों पर घूमने का नहीं था। बुआ तो यूरोप घूमना चाहती थी। लेकिन इतने संपन्न घर में अभी बुआ को अपना हिस्सा कहां मिला था। अभी तक सब या तो सास-ससुर या पति का है। इतनी अमीरी में से कुछ पैसे बुआ अपनी मर्जी से नहीं खर्च कर सकती है।
आज बुआ का भाई आने वाला था। बुआ बहुत खुश थी। भाई ने आते ही दस्तखत करने के लिए कागज और कलम पकड़ा दिए। भाई को अपनी पैतृक संपत्ति बेचने के लिए बुआ का ‘नो आब्जेक्शन’ चाहिए था। बुआ को लगा, वह ठगी गई। जिस घर के बारे में कहा गया था कि उसका कोई अधिकार नहीं, वही उसका पैतृक घर है, और वहां उसका अधिकार है। जिस घर में कानून उसे अधिकार देता है, वहां मां-बाप यही क्यों बताते रहे कि यहां तुम्हारा कुछ नहीं है।
दूर का इंसाफ सुहाना लगता है: सोशल मीडिया के न्याय और वास्तविक जीवन की चुप्पी | मार्गदर्शन
बुआ कागज-कलम को देख रही है। भाई ने मान लिया है कि सारी संपत्ति उसके नाम होने में बुआ को कोई परेशानी नहीं है। बुआ कागज पर लिखे शब्द पढ़ने की कोशिश करती है। भाई कहता है-पढ़ क्या रही हो, ये कानूनी शब्द तुम्हें समझ नहीं आएंगे, तुम बस दस्तखत कर दो अपना। बुआ सोच रही है, काश! ऐसा कोई कागज उसने पहले देखा होता।
काश! ऐसे कानूनी शब्दों के बारे में उसे पहले पता चला होता। काश! काश! और न जाने कितने काश! भाई ने यह कैसे सोच लिया कि बहन कोई विरोध नहीं करेगी। आखिरकार भाई सोचे भी क्यों न! उसी की सत्ता के लिए तो बहन को विरोध जैसे शब्द से दूर रखा गया था। बुआ पहली बार विरोध बोलना चाह रही थी।
