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नृत्य : गुरुओं के सम्मान में शिष्यों की पेशकश

भरतनाट्यम नृत्यांगना गुरु सरोजा वैद्यनाथन की शिष्या देविका राजारामन ने भरतनाट्यम नृत्य पेश किया।
पंडित बिरजू महाराज की पौत्री व शिष्या रागिनी महाराज शिव स्तुति पेश करतीं हुईं।

शास्त्रीय नृत्य और संगीत गुरुमुखी विद्या मानी जाती है। गुरु के सानिध्य में ही शिष्य कला की बारीकियों को सही तरीके से समझ और सीख पाते हैं। वैसे आज के गुरुओं का मानना है कि उनके शिष्यों में कला के सीखने के प्रति जुझारूपन में कमी आई है। बहरहाल, गुरुओं को ऐसे कम अवसर मिलते हैं, जब शिष्य की प्रस्तुति को गुरु देख पाते हैं। ऐसी एक शाम तपस-दि एकेडमी ऑफ परफॉरमिंग आर्ट्स ने आयोजित किया।

एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में पंचरत्न नाट्य समारोह का आयोजन किया गया था। इस समारोह में कला विद् और सांसद डा. कर्ण सिंह ने पंडित बिरजू महाराज, गुरु सरोजा वैद्यनाथन, गुरु सिंहजीत सिंह, गुरु माधवी मुदगल और गुरु स्वप्न सुंदरी को पंचरत्न सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके बाद, उनकी शिष्याओं ने इन गुरुओं और दर्शकों के सामने नृत्य पेश किया। नृत्य प्रस्तुति का आरंभ कथक नृत्य से हुआ। इसे पंडित बिरजू महाराज की पौत्री व शिष्या रागिनी महाराज ने शिव स्तुति के रूप में पेश किया। उन्होंने अपने दादागुरु की रचना ‘अर्धनारीश्वर’ को नृत्य में ढाला। रचना ‘अर्धांग भस्म भभूत सोहे’ पर उन्होंने शिव-पार्वती के रूप का विवेचन हस्तमुद्राओं और भंगिमाओं से किया। उन्होंने कुछ टुकड़े, तिहाइयों और चक्करों को अपने नृत्य में समाहित किया।

भरतनाट्यम नृत्यांगना गुरु सरोजा वैद्यनाथन की शिष्या देविका राजारामन ने भरतनाट्यम नृत्य पेश किया। उन्होंने कृष्ण स्तुति पेश की। यह राग कलरंजिनी और आदि ताल में निबद्ध थी। रचना ‘ओम नमो नारायण’ में कृष्ण के बाल रूप और लीलाओं का संक्षिप्त चित्रण किया गया। देविका के नृत्य अभिनय में अभी परिपक्वता नहीं आई है। उन्हें अपने नृत्य को और बेहतर करने की जरूरत है।

आंध्रप्रदेश की नृत्य शैली कुचिपुड़ी को ऐश्वर्या ने पेश किया। गुरु वेदांतम शास्त्री ने कुचिपुड़ी में जतीस्वरम की शुरुआत की। राग वसंत और आदि ताल में निबद्ध जतीस्वरम को ऐश्वर्या ने प्रस्तुत किया। नृत्यांगना स्वप्न सुंदरी ने इसकी नृत्य व संगीत रचना की थी। ऐश्वर्या ने इसमें शुद्ध नृत्य के पद, हस्त और अंग संचालन पेश किया। उनकी प्रस्तुति में तकनीकी बारीकियों का समावेश सहज था।

ओडिशी नृत्य की बारीकियों को प्रेरणा अग्रवाल ने पेश किया। प्रेरणा अग्रवाल ने ओडिशी नृत्य गुरु माधवी मुदगल से सीखा है। उन्होंने गुरु केलुचरण महापात्र की नृत्य परिकल्पना को पेश किया। उन्होंने सावेरी पल्लवी में चौक और त्रिभंग भंगिमाओं का प्रयोग करते हुए, लयात्मक पद व हस्त संचालन पेश किया। प्रेरणा ने पूरे आत्मविश्वास के साथ नृत्य किया। समारोह का समापन गुरु चारूसिजा माथुर और सिंहजीत सिंह की शिष्या नंदिता देवी के मणिपुरी नृत्य से हुआ। कवि जयदेव की अष्टपदी ‘धीरे समीरे यमुना तीरे’ पर भाव नृत्य किया। मणिपुरी नृत्य शैली में प्रस्तुत नंदिता देवी का नृत्य भावप्रवण था।

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