जनवरी का महीना था। शीतलहर से आज थोड़ी-बहुत राहत मिली थी। दादाजी धूप में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। सुमन ने आकर चाय की प्याली थमाई। मगर दादाजी ने कप को टेबल पर रख दिया। उनकी निगाह अखबार के एक ही पन्ने पर देर से टिकी हुई थी।
सुमन ने उनका ध्यान खींचते हुए कहा, “दादाजी! आप तो चाय के बड़े शौकीन हैं। लेकिन आज आपने चाय की तरफ देखा तक नहीं। मैं कितनी अच्छी अदरक वाली चाय बनाकर लाई हूं और आप खोए हुए हैं। अखबार में कोई खास खबर है क्या?”
“हां बेटे! बहुत खास खबर है। तुम्हारी जैसी ही दो बेटियों की कहानी है।” दादाजी ने चाय की प्याली उठाते हुए जवाब दिया। सुमन की जिज्ञासा बढ़ गई। उसने कौतूहल से पूछा, “क्या किया उन दोनों ने? लुटेरों पर पिस्तौल तान दी क्या? बताइए तो भला! कितनी हिम्मत वाली हैं वे!”
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“लगता है कि अब तुम्हारे अंदर भी भरपूर उत्सुकता जाग गई है। ठीक है, अब मैं तुम्हें पूरी कहानी ही सुना देता हूं। कल बुधवार की ही घटना है यह। अपने राज्य के हाजीपुर शहर में एक बैंक है—उत्तर बिहार क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक। बैंक में ग्राहकों की काफी भीड़ थी। बाहर दरवाजे पर दो महिला सिपाही तैनात थीं—जूही और शांति। ध्यान देने की बात है कि उस बैंक की मैनेजर भी महिला ही हैं—श्रेया।”
“मगर हुआ क्या, दादाजी?” सुमन ने जल्दी ही असली बात जाननी चाही। “वही तो बताने जा रहा हूं।”
दादाजी ने बात को आगे बढ़ाया, “जूही और शांति बहुत ही सतर्क रहती थीं। बैंक में कोई फालतू आदमी तो नहीं जा रहा है, इस पर नजर रखने के लिए हर आगंतुक की पूरी तरह से जांच-पड़ताल करती थीं।”
दादाजी ने चाय की एक और चुस्की लेते हुए कहना जारी रखा, “ऐसे ही व्यस्त कामकाजी दिन में वे दोनों आने वालों से बैंक में उनके काम के बारे में पूछ रही थीं। तभी एक साथ पांच युवक दो मोटरसाइकिलों से उतरकर दरवाजे के अंदर जाने लगे। गेट पर तैनात जूही ने सवाल किया, ‘क्या काम है आप लोगों को?’
‘पैसा निकालना है।’ एक ने कहा और सबने हामी भरी। ‘पासबुक दिखाइए।’ दूसरी सिपाही शांति ने कहा। ‘तुम कौन होती हो पासबुक देखने वाली?’ एक युवक ने तुनककर पूछा। तभी दूसरे युवक ने बंदूक तान दी, ‘हम बैंक लूटने आए हैं। चुपचाप हाथ ऊपर करो।’
‘तुम्हारी इतनी हिम्मत!’ शांति ने निडरता से बंदूक पकड़ ली। फिर तो दोनों तरफ से छीना-झपटी होने लगी।” एकाएक जूही ने फुर्ती से पिस्तौल निकालकर निशाना साधते हुए गरजकर कहा, “हिलना मत, वरना यहीं भूनकर रख दूंगी।” उसी समय अचानक सड़क पर खड़ी एक औरत चिल्ला उठी, “दौड़ो-दौड़ो! बचाओ-बचाओ! बैंक लुटेरे आ गए हैं।”
औरत का शोर सुनकर सड़क पर आते-जाते लोग बैंक की तरफ दौड़ पड़े। देखते ही देखते भारी भीड़ उमड़ पड़ी। इस घटनाक्रम से पांचों लुटेरे हड़बड़ा गए। वे जैसे-तैसे हाथ छुड़ाकर भाग खड़े हुए। पांचों ने पैदल ही सरपट दौड़ लगा दी।
हंगामे की आवाज सुनकर ग्राहकों, कर्मचारियों के साथ मैनेजर श्रेया बाहर आईं। उमड़ी भीड़ को देखकर उन्होंने मामले की गंभीरता भांप ली। सबने पूरी कहानी कह सुनाई। फिर पुलिस बुलाई गई। खुद पुलिस अधीक्षक बैंक में आ पहुंचे। लुटेरों की मोटरसाइकिलें जब्त कर ली गईं। सीसीटीवी कैमरे में पूरी घटना साफ दिख रही थी।
पुलिस अधीक्षक सीसीटीवी फुटेज के उस दृश्य को बार-बार देख रहे थे, जिसमें दोनों महिला सिपाही गुंडों से भिड़ जाती हैं। उन दोनों के चेहरों पर एक क्षण के लिए भी भय नहीं दिखा। दिखा तो बस यह जज्बा कि हम लुटेरों को किसी भी कीमत पर बैंक के अंदर नहीं घुसने देंगे। दोनों की चुस्ती-फुर्ती देख सभी लोग दंग रह गए।
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एसपी साहब ने दोनों महिला सिपाहियों की तारीफ करते हुए कहा, “बेटियो! हमें तुम पर गर्व है। तुम्हारी निडरता, वीरता और साहस के लिए पुलिस विभाग तुम दोनों को पुरस्कृत और सम्मानित करेगा। तुमने अपनी जान की परवाह नहीं की। बैंक की लाखों की संपत्ति और जान-माल की सुरक्षा की। शाबाश जूही! शाबाश शांति! तुम जैसी जांबाज सिपाहियों ने स्त्री-सशक्तीकरण की एक नई कहानी लिखी है। देखना, आने वाले समय में तुम दोनों के ये वीडियो फुटेज पूरी दुनिया देखेगी।”
दादाजी ने गौर से कहानी सुन रही अपनी पोती को अखबार में छपी दोनों सिपाहियों की तस्वीरें भी दिखाईं। “यह तो सचमुच खास खबर है!” सुमन ने रोमांचित होते हुए कहा, “दादाजी! मैं भी पुलिस में जाऊंगी।”
“शाबाश सुमन!” दादाजी ने सुमन की पीठ ठोंकी। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे जूही और शांति को ही शाबाशी दे रहे हों। वे सोचने लगे, एक समय ऐसा था, जब लड़कियों के लिए काम के कुछ चुनिंदा क्षेत्र ही थे। अब लड़कियां हर क्षेत्र में काम कर रही हैं और किसी से कम नहीं हैं। वे अपनी पोती सुमन के लिए भी यही सपना देखते थे कि वह जहां भी काम करे, जैसा भी काम करे, हमेशा हौसले और ईमानदारी के साथ रहे।
सुमन ने कहा, “दादाजी, आज आपने इस कहानी पर कुछ ज्यादा ही सोच लिया। आपकी तो चाय ही ठंडी हो गई। रुकिए, मैं दूसरी चाय बनाकर लाती हूं।” दादाजी ने दूसरी चाय के लिए मना कर दिया। आज उन्हें ठंडी चाय भी अच्छी लग रही थी।
