महफिल अपने शबाब पर थी। शाम ढल चुकी थी और दीयों की पीली रोशनी में कमरा जगमगा रहा था। सामने बैठे रईस, जमींदार, शायर और रसिक श्रोता बेसब्री से अगली बंदिश का इंतजार कर रहे थे। जैसे ही गायिका ने ठुमरी की पहली पंक्ति उठाई, पूरा माहौल थम-सा गया। कुछ क्षण बाद चारों ओर से आवाजें उठीं – “वाह! वाह!” “मुकर्रर अर्ज है!” सुरों और अदाओं की उस दुनिया में वह केवल एक तवायफ नहीं थी; वह महफिल की जान थी, संगीत की निगहबान थी और उस तहजीब की नुमाइंदा थी जिसे बाद के इतिहास ने अक्सर गलत समझा। उसका नाम था मलका जान।

आज मलका जान को अधिकतर लोग सिर्फ इसलिए जानते हैं कि वह भारत की पहली रिकॉर्डिंग स्टार मानी जाने वाली गौहर जान की मां थीं। लेकिन यह परिचय अधूरा है। उनकी अपनी कहानी भी कम असाधारण नहीं थी। और इस कहानी की शुरुआत कलकत्ता या बनारस से नहीं, बल्कि संगम की धरती इलाहाबाद (आज का प्रयागराज) से होती है।

उन्नीसवीं सदी का इलाहाबाद आज के प्रयागराज से बिल्कुल अलग था। अंग्रेजी राज के अधीन यह तेजी से विकसित हो रहा प्रशासनिक शहर था। कचहरियां थीं, व्यापार था, सेना की मौजूदगी थी और साथ ही एक जीवंत सांस्कृतिक संसार भी था। पुराने शहर की गलियों में उर्दू शायरी, संगीत और लोकजीवन की अपनी अलग धड़कन थी।

इसी शहर में 1855 के आसपास एक बच्ची का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया एडेलीन विक्टोरिया हेमिंग्स (Adeline Victoria Hemmings)। उसके पिता ब्रिटिश सैनिक थे और मां भारतीय मूल की थीं। उस दौर के इलाहाबाद में ऐसे परिवार असामान्य नहीं थे, जहां विभिन्न संस्कृतियां एक-दूसरे से मिल रही थीं। किसे पता था कि यही बच्ची आगे चलकर मलका जान के नाम से मशहूर होगी और उसकी बेटी भारतीय संगीत इतिहास का एक नया अध्याय लिखेगी।

प्रेम, विवाह और जीवन का मोड़

मलका जान की जिंदगी का पहला बड़ा मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात एक आर्मेनियाई मूल के इंजीनियर रॉबर्ट विलियम योवार्ड (Robert William Yeoward) से हुई। दोनों ने विवाह किया और 1873 में उनकी बेटी का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया एलीन एंजेलीना योवार्ड (Eileen Angelina Yeoward)।

लेकिन यह विवाह ज्यादा समय तक नहीं चला। पारिवारिक तनाव और कथित संबंधों के विवादों के बीच दोनों अलग हो गए। उस दौर में किसी महिला के लिए तलाक या वैवाहिक विघटन केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट भी होता था। यहीं से शुरू होती है उस महिला की दूसरी जिंदगी।

विवाह टूटने के बाद वह अपनी बेटी को लेकर बनारस चली गईं। वहीं उन्होंने इस्लाम स्वीकार किया और नया नाम अपनाया – मलका जान। उनकी बेटी एंजेलीना आगे चलकर गौहर जान कहलाने लगी। क्या तवायफ सिर्फ नाचने-गाने वाली होती थीं? आज “तवायफ” शब्द सुनते ही बहुत से लोगों के मन में एक सीमित छवि उभरती है। लेकिन उन्नीसवीं सदी में तवायफों की भूमिका इससे कहीं व्यापक थी।

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वे संगीत, नृत्य, शायरी, भाषा, अदब और सामाजिक शिष्टाचार की सरपरस्त थीं। लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद और कलकत्ता जैसे शहरों में तवायफों के कोठे केवल दिलबहलाव या तफरीह के ठिकाने नहीं थे, बल्कि तहजीब के केंद्र भी थे।

इतिहासकारों के अनुसार, कई रईस परिवार अपने बेटों को तहजीब, अदब और मेल-जोल का सलीका सीखने के लिए तवायफों की महफ़िलों में भेजते थे। वहां केवल संगीत और नृत्य की प्रस्तुतियां ही नहीं होती थीं, बल्कि भाषा, शायरी, संवाद-कला और मुआशरती तौर-तरीकों की भी तालीम दी जाती थी। इन महफिलों में कला के साथ-साथ व्यवहार, शिष्टाचार और तहजीबी संस्कारों की भी परवरिश होती थी।

मुमकिन है कि पुराने शहर में भी ऐसी महफिलें सजती रही हों। हालांकि इनके विस्तृत दस्तावेज बहुत कम उपलब्ध हैं, लेकिन उत्तर भारत की सांस्कृतिक परंपरा को देखते हुए इसे असंभव नहीं माना जा सकता। बनारस में मलका जान ने संगीत और नृत्य की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। उनकी प्रतिभा जल्द ही चर्चित होने लगी। बाद में वह कलकत्ता पहुंचीं, जो उस समय ब्रिटिश भारत की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता था।

कलकत्ता में उन्होंने केवल नाम ही नहीं कमाया, बल्कि आर्थिक सफलता भी हासिल की। कुछ वर्षों के भीतर उन्होंने अपनी हवेली और कोठा स्थापित कर लिया। यह स्थान संगीत, कविता और कला प्रेमियों का केंद्र बन गया। वह केवल गायिका नहीं थीं। उन्होंने उर्दू शायरी भी की। उनका काव्य-संग्रह “मख़ज़न-ए-उल्फत-ए-मलका जान” आज भी उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का प्रमाण माना जाता है। यानी इलाहाबाद में जन्मी वह लड़की अब कलकत्ता की सबसे चर्चित तवायफों में गिनी जाने लगी थी।

मलका जान का सबसे बड़ा योगदान शायद उनकी अपनी प्रसिद्धि नहीं, बल्कि अपनी बेटी की शिक्षा और प्रशिक्षण था। उन्होंने गौहर जान को उस समय के सर्वश्रेष्ठ उस्तादों से संगीत की तालीम दिलाई। ठुमरी, खयाल, दादरा, कथक, बंगाली गीत, उर्दू अदब – हर क्षेत्र में उसे प्रशिक्षित किया गया। यह प्रशिक्षण किसी साधारण कलाकार को तैयार करने के लिए नहीं था। मलका जान जानती थीं कि बदलते समय में प्रतिभा को नए मंचों की जरूरत होगी। शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि उनकी बेटी आगे चलकर पूरे हिंदुस्तान में मशहूर हो जाएगी।

जब कोठे से निकली आवाज पूरे देश में गूंजी

बीसवीं सदी की शुरुआत में एक नई तकनीक -ग्रामोफोन – भारत पहुंची। जहां अधिकतर पारंपरिक उस्ताद रिकॉर्डिंग को संदेह की नजर से देखते थे, वहीं कुछ कलाकारों ने इसे अवसर के रूप में देखा। उनमें सबसे आगे थीं गौहर जान। 1902 में उन्होंने रिकॉर्डिंग कराई। तीन मिनट की सीमित अवधि में शास्त्रीय संगीत को समेटना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने यह चुनौती स्वीकार की।

रिकॉर्डिंग के अंत में उनकी आवाज सुनाई देती थी – “माई नेम इज़ गौहर जान!” यह वाक्य भारतीय संगीत इतिहास का हिस्सा बन गया। धीरे-धीरे गौहर जान की लोकप्रियता पूरे देश में फैल गई। उनके रिकॉर्ड बिकने लगे, उनकी तस्वीरें छपने लगीं और उनका नाम शहर-शहर पहुंचने लगा। आज जब लोग उन्हें भारत की पहली रिकॉर्डिंग स्टार के रूप में याद करते हैं, तो उस मुकाम के पीछे मलका जान की वर्षों की मेहनत, परवरिश और सही समय को पहचानने की समझ भी शामिल थी।

गौहर जान केवल ग्रामोफोन तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने कई राजदरबारों में प्रस्तुतियां दीं। दरभंगा राज सहित अनेक रियासतों में उन्हें सम्मान मिला। 1911 के दिल्ली दरबार में जब ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के राज्यारोहण समारोह का आयोजन हुआ, तब चुनिंदा कलाकारों को प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया गया। गौहर जान उनमें शामिल थीं। एक अर्थ में यह उस यात्रा का शिखर था, जिसकी शुरुआत कभी इलाहाबाद में जन्मी एक महिला के संघर्ष से हुई थी।

यही वजह है कि इस कहानी की हेडलाइन – “इलाहाबाद की वह तवायफ, जिसकी बेटी कोठे से निकलकर राजदरबारों की मलिका बनी” – सिर्फ एक आकर्षक वाक्य नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक यात्रा का सार है।

आज प्रयागराज की पहचान आमतौर पर संगम, कुंभ, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, हाईकोर्ट या स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी यादों में खोजी जाती है। लेकिन शहर का सांस्कृतिक इतिहास इससे कहीं व्यापक है। मलका जान की कहानी हमें याद दिलाती है कि यह शहर केवल राजनीति और प्रशासन का केंद्र नहीं था; यह उन लोगों की भी भूमि था जिन्होंने संगीत, साहित्य और कला की दुनिया को आकार दिया।

संभव है कि पुराने इलाहाबाद की अनेक कहानियां अभी भी अभिलेखों, पुराने अखबारों, उर्दू पत्रिकाओं और लोकस्मृतियों में बिखरी पड़ी हों। मीरगंज, चौक, कटरा और पुराने शहर की गलियों में शायद ऐसे कई नाम दफन हैं, जिन्हें इतिहास ने पर्याप्त जगह नहीं दी।

मलका जान की कहानी केवल एक तवायफ की कहानी नहीं है। यह पहचान बदलने, संघर्ष से उभरने, कला को साधने और अगली पीढ़ी के लिए रास्ता बनाने की कहानी है। यह उस दौर की कहानी भी है जब तवायफें केवल कोठों की निवासी नहीं थीं, बल्कि संगीत और संस्कृति की संरक्षक थीं। और शायद यही कारण है कि डेढ़ सदी बाद भी इलाहाबाद से शुरू हुई उनकी यात्रा हमें आकर्षित करती है। क्योंकि इस कहानी में प्रेम है, विछोह है, संघर्ष है, संगीत है और इतिहास की वह गूंज भी, जो आज तक पूरी तरह खामोश नहीं हुई। कहीं न कहीं, उन पुरानी महफिलों की “वाह-वाह” आज भी प्रयागराज के इतिहास में सुनाई देती है।

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मीरगंज की रात किसी घड़ी की सुई देखकर नहीं उतरती। वह धीरे-धीरे आती है। पहले चौक की दुकानों पर रोशनी गाढ़ी होती है। फिर सर्राफा बाजार के शटर आधे झुकने लगते हैं। खोया मंडी में दिनभर की आवाजाही के बाद तौल-कांटे समेटे जाते हैं। कहीं आखिरी गिलौरियां बन रही होती हैं, कहीं दुकानदार दिनभर की कमाई गिन रहा होता है। घी, चांदी, तंबाकू, पान और मसालों की मिली-जुली गंध पुरानी गलियों में ऐसे तैरती रहती है, जैसे किसी पुराने संदूक से बीते दिनों की महक बाहर निकल आई हो। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक