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द लास्ट कोच: हम फिर आएंगे

यह बदलाव की ब्यार है। इसे आने वाले दिनों में लोग महसूस करेंगे। नौकरी, पढ़ाई, सामाजिक शिष्टाचार, एक दूसरे के घर आना-जाना, सब कुछ बदल जाएगा। या यूं कहें कि बदल गया है। इन दिनों मौसम भी बदल गया है। गर्मी में ठंडी हवा बह रही है। अजूबा तो यह कि जिन लोगों ने लंबी सड़कें बनाई, वे भी उनके लिए पराई हो गईं। उन पर चलते हुए कामगारों के तलवों पर छाले पड़ गए। इन सड़कों पर सदी के सबसे बड़े पलायन का इतिहास दर्ज है, आने वाली पीढ़ियां इसे पढ़ेंगी। एक ऐसी पीड़ा जो कालखंडों में सिसकती रहेंगी।

Coronavirus, Coronavirus in india, Coronavirus death troll, Coronavirus Covid 19 epidemic, migrating workersकोरोनावायरस महामारी और लॉकडाउन में बेहाल गृह राज्य लौटते प्रवासी मजदूरों की प्रतीकात्मक तस्वीर।

रात के साढ़ दस बज चुके हैं। टाइम कीपर का फोन आ रहा है। कह रहे हैं कि दोपहर दो बजे आए थे और अब रात के 11 बज रहे हैं। आखिर घर कितने बजे जाएंगे। वही घर जहां मैं सिर्फ सोने के लिए जाता हूं, बाकी जिंदगी तो यहीं दफ्तर में गुजर गई।… मैं कंप्यूटर ऑफ कर अपने कागज-कलम समेट रहा हूं। डिजिटल क्रांति के इस दौर में कलम का साथ आज भी नहीं छूटा है। ठीक वैसे ही, जैसे सच्चे दोस्तों का दामन। हालांकि कुछ दोस्त साथ छोड़ गए तो कुछ पीठ में छुरा घोंप निकल गए।… उनकी कुर्सी यहीं धरी रह गई है। और एक दिन मुझे भी चले जाना है।

इन दिनों दफ्तर में कुछ आदतें बदल गई हैं। ड्यूटी शुरू करने से पहले अब तापीय जांच यंत्र से बुखार की जांच होती है। फिर हथेलियों को एक खास घोल से विषाणु रहित किया जाता है। इन दिनों सेनिटाइजर से हथेलियों को मलते हुए अकसर सोचता हूं कि जिंदगी का कारवां गुजर रहा है और मैं गुबार देख रहा हूं। अब हाथ मलने के सिवाय कुछ बचा भी तो नहीं। जिस देश में लोगों को पीने का पानी नहीं मिलता, वहां हाथ धोने की नसीहत देना बेमानी है। वो लोग बड़े भाग्यशाली हैं जो जीवन से हाथ धोने से बच गए और बार-बार हाथ धोकर खुद को और दूसरों को भी बचा रहे हैं। सलाम हैं उनको।

हमारे चालक विमल जी ने गाड़ी में बैठने से पहले अगली और पिछली सीट पर स्प्रे कर दिया है। मुंह पर मास्क है। तीखी गंध से पल भर के लिए दम घुट गया है। इन दिनों शुद्ध हवा के लिए सब तरस गए हैं। मुंह और नाक को मास्क से ढके लोग कोरोना से लड़ रहे हैं। एक दिन घर लौटते हुए दिल्ली-नोएडा सीमा पर अवरोधक के पास खड़े पुलिस अधिकारी ने मेरी नाक से नीचे खिसक गए मास्क को देख कर कहा कि आप पत्रकार लोग ही ऐसा करेंगे, तो दूसरे लोग क्या सीखेंगे। एक पल के लिए के लिए मैं सकपका गया। तब से नाक पर जाबा यानी मास्क कस कर बांधता हूं। अब तो गली के कुत्ते भी मुझे नहीं पहचानते। पैरों को सूंघ कर समझ जाते हैं कि बंदा घर आ गया है। सच कहूं तो मेरी हालत घोड़े जैसी हो गई है। कम बोलता हूं। अपना काम करता जाता हूं।

…मैंने कार के शीशे खोल दिए हैं। नई ब्यार बह रही है। यह बदलाव की ब्यार है। इसे आने वाले दिनों में लोग महसूस करेंगे। नौकरी, पढ़ाई, सामाजिक शिष्टाचार, एक दूसरे के घर आना-जाना, सब कुछ बदल जाएगा। या यूं कहें कि बदल गया है। इन दिनों मौसम भी बदल गया है। गर्मी में ठंडी हवा बह रही है। अजूबा तो यह कि जिन लोगों ने लंबी सड़कें बनाई, वे भी उनके लिए पराई हो गईं। उन पर चलते हुए कामगारों के तलवों पर छाले पड़ गए। इन सड़कों पर सदी के सबसे बड़े पलायन का इतिहास दर्ज है, आने वाली पीढ़ियां इसे पढ़ेंगी। एक ऐसी पीड़ा जो कालखंडों में सिसकती रहेंगी।

चालक विमल जी बता रहे हैं, सर सीएनजी खत्म हो गई है। कहिए तो भरवा लूं। बीच रास्ते में खत्म हो गई तो दिक्कत होगी। … अरे यह भी पूछने की बात है। मैंने उन्हें जवाब दिया। गाड़ी दिल्ली-नोएडा मार्ग से मयूर विहार स्थित सीएनजी स्टेशन की ओर मुड़ गई है। सीएनजी पंप पर सफेद रंग की चार नई कारें खड़ी हैं। हमारी कार कार भी उन गाड़ियों के पीछे खड़ी हो गई हैं। मैं गाड़ी से उतर गया हूं। देख रहा हूं कि उन नई गाड़ियों के कैरियर पर कपड़ों में लिपटी पूरी गृहस्थी बंधी है। सीएनजी स्टेशन के बाहर दूसरे किनारे मजदूरों के चार परिवार खुद में सिमटे-सकुचाए खड़े हैं।

मेरे कदम उधर ही बढ़ चले हैं। मेरी आंखों में सवाल है। एक दंपति ने मुझे देख कर अनदेखा किया। उनकी दो नन्ही बेटियां मुझे टुकुर-टुकुर ताक रही हैं। बच्चे कहां जा रहे हो। यह पूछते ही दोनों बच्चियां सहम कर मां के आंचल में छुप गई हैं। उनके पिता ने संकोच के साथ कहा कि हम लोग अपने गांव सहरसा लौट रहे हैं। पटना से आगे बिहार का सहरसा जिला। यह तो बहुत दूर है, मैंने कहा। क्या करें बाबू जी। यहां रह के भी क्या होगा। मकान मालिक को देने को किराया नहीं। फिर यहां कोई काम-धाम भी नहीं। न जाएं तो भूखों मरें। सड़क पर बच्चियों को लेकर कितने दिन भटकेंगे।

एक बेबस पिता के चेहरे से पीड़ा की परतें उतरने लगी हैं। मैं उसे नसीहतें देने या समझाने की हालत में नहीं हूं। शहरों में लाखों कामगार अपने गांवों-घरों को लौट चुके हैं। अब बचे-खुचे मजदूर परिवार लौट रहे हैं। अफसोस कि छोटे बड़े सभी शहर यह कह कर भी नहीं रोक पाए कि कुछ महीने बाद क्या करोगे। हमारे पास उनको देने के लिए क्या है। कुछ भी तो नहीं। आप काम वाली बाई को एक महीने का राशन देने को तैयार नहीं जो बरसों आपके घरों में चौका-बासन करती रही। बिना काम किए दो महीने का मेहनताना देना तो दूर की बात है।

इस बेबस पिता के पैरों से उसकी दुबली-पतली बच्ची लिपट गई है। वह ध्यान से पिता की बातों को सुन रही है। वह कह रहा है, बाबू जी वो सामने मेट्रो की लाइन देख रहे हैं न। उसे बनाने में हम मजदूर लोग भी शामिल थे। कई महीने तक काम किया मेट्रो का खंभा बनाने में। अब उस पर मेट्रो दौड़ती हैं और हम पैदल चलते हैं। चलते जाते हैं। कौन पूछता है हमें कि क्यों पैदल चले जा रहे हो। उसका इशारा उन साथी मजदूरों के लिए था जो हजारों किलोमीटर पैदल ही घर गए। …वह कह रहा.. मगर हम में दम नहीं है बाबू। हम बच्चों को लेकर, बूढ़ी मां को लेकर, मेहरारू को लेकर नहीं चल सकते। ऊपर पर से इतना सामान। उसने गाड़ियों पर लदे सामान की ओर इशारा किया।

तब तक गाड़ियों में सीएनजी भरी जा चुकी है। सड़क किनारे खड़े परिवार गाड़ियों में बैठने का इंतजार कर रहे हैं। मैं उस पिता से पूछ रहा हूं, अब आप लोग कब लौटेंगे। वह रह रहा है… फिलहाल छह महीने तो वहीं खेती-खलिहानी करेंगे। फिर सोचेंगे, क्या करना है। शायद होली बाद लौटें। अभी तो दिल्ली से विदा हो रहे हैं। याद आएगी दिल्ली और ये आपकी मेट्रो भी, जिसे बनाने में हमारा भी पसीना बहा।

देख रहा हूं कि उसकी पत्नी की आंखों से आंसू बह चले हैं। उसने अचरे से उन्हें पोंछ लिया है। बेबस पिता बता रहा है कि ये जो गाड़ियां देख रहे हैं न, इसे भाड़े पर ले जा रहे हैं। इसके लिए हमें घर के गहने बेचने पड़े हैं। घर से पैसे भी मंगाने पड़े। क्या करते ट्रेन के लिए पंजीकरण कराया, मगर कोई जवाब नहीं मिला, तो पूरी गृहस्थी लाद कर यहां से निकल रहे हैं।

…नई चमचमाती गाड़ियां मजदूर परिवारों के सामने खड़ी हो गई हैं। वे एक-एक कर बैठ रहे हैं। मैंने बटुए में रखे बचे खुचे रुपए उन बच्चियों को थमा रहा हूं, यह कह कर कि रास्ते में कुछ मिले तो खरीद कर खा लेना। वे अपने पिता का मुंह ताक रही हैं। बेबस पिता ने कहा, मत दीजिए कुछ भी। क्या करेंगे। हमने तो आपके शहर को अपना पसीना दिया है। हमें स्वाभिमान से जाने दीजिए बाबू। यह कह कर उसने हाथ जोड़ दिए हैं। रुपए मेरे हाथ में रह गए हैं। मैं दिल्ली की श्रम शक्ति को जाते हुए देख रहा हूं।

तभी विमल जी गाड़ी लेकर आ गए हैं। कह रहे हैं बैठिए सर। आज बहुत देर हो गई। सच कह रहे हैं। इस बार तो कई मामलों में देरी हो गई। ….गाड़ी चल पड़ी है। मुख्य सड़क पर आते ही मेट्रो की लाइन पर फिलहाल परीक्षण के तौर पर चल रही मेट्रो ने ध्यान खींच लिया है। वह कह रही है … मैं फिर लौटूंगी। तुम मिलोगे न लास्ट कोच में। उसी कोने की सीट पर। कुछ लिखते हुए कुछ पढ़ते हए। मैं मन ही मन कह रहा हूं, हां जरूर मिलूंगा। तुम जीवन रेखा हो। तुम मिलोगी तो जिंदगी चलेगी। तुम्हारे बिना अधूरी है जिंदगी। और मेरी कहानियां भी।

… देख रहा हूं कि आगे-आगे उन मजदूरों की गाड़ियां जा रही हैं। उस बेबस पिता के शब्द गूंज रहे हैं- हम फिर आएंगे। … हम फिर आएंगे।

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