चाहे वह सिया गोयल को धिक्कारने के लिए हो, चाहे सामाजिक उपदेश देने के लिए या फिर इंटरनेट के खातों पर अपनी दृश्यता बनाए रखने के लिए—सोशल मीडिया का लगभग हर नामचीन व्यक्ति सिया गोयल पर लिख रहा है। ज्यादातर लोग घटना का सामान्यीकरण करते हुए कह रहे हैं कि राजा रघुवंशी वाले मामले में सोनम को कड़ी सजा मिल गई होती तो सिया गोयल की ऐसी हिम्मत नहीं होती।

वैसे, हममें से ज्यादातर लोग यह नहीं जानते कि अब तक सामने आए ऐसे मामलों में अदालत के सामने कौन-कौन से सबूत पेश किए गए, किन मुद्दों पर जिरह हुई और किन कारणों से किसी आरोपी को जमानत मिली या नहीं मिली।

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यदि पिछले मामलों में आरोपियों को अब तक कड़ी सजा नहीं मिल पाई है, तो क्या सिर्फ इसी वजह से सिया गोयल ने ऐसा कदम उठाया? अपराधशास्त्र इस प्रश्न को अलग नजरिए से देखता है। मानव मन अत्यंत जटिल होता है। उसके भीतर कब, किस बात को लेकर आकर्षण पैदा हो जाए, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। इसलिए यह तर्क कि सिया को परिवार में कैसे संस्कार मिले या पहले ऐसे अपराधों में कड़ी सजा नहीं मिली, इस पूरे प्रश्न का पर्याप्त उत्तर नहीं हैं।

फ्रांसीसी अपराधशास्त्री टार्डे का कहना था कि मनुष्य का बहुत-सा सामाजिक व्यवहार अनुकरण पर आधारित होता है। हम सभी अपने आसपास होने वाले व्यवहारों से प्रभावित होते हैं। यदि कोई व्यवहार अत्यधिक चर्चित हो जाए और सार्वजनिक बहस का विषय बन जाए, तो वह अनेक लोगों के अवचेतन मन में अलग तरह से प्रवेश कर जाता है। फिर व्यक्ति अपनी परिस्थितियों की तुलना उन घटनाओं से करने लगता है।

कई शोधकर्ताओं ने ‘कॉपीकैट क्राइम’ यानी नकल के अपराध की अवधारणा भी प्रस्तुत की है। खासकर सामूहिक हिंसा, स्कूल या सार्वजनिक स्थानों पर हमले, आत्महत्या और आतंकवादी घटनाओं के मामलों में देखा गया है कि बाद में उनकी नकल करने की कोशिश की गई। यही कारण है कि अनेक विशेषज्ञ अपराध की रिपोर्टिंग में संयम बरतने की सलाह देते हैं।

अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में अपराध का नाट्य रूपांतरण किसी सामान्य नाटक जैसा नहीं रह गया है। कई बार उसकी प्रस्तुति ऐसी होती है कि अपराध भय का नहीं, बल्कि भव्यता और रोमांच का विषय प्रतीत होने लगता है।

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स्टैनली कोहेन ने अपने सिद्धांतों में समझाने की कोशिश की है कि किस प्रकार मीडिया और सार्वजनिक विमर्श कभी-कभी किसी सामाजिक समस्या को इतनी अधिक अहमियत दे देते हैं कि वह सामूहिक अवचेतना में असामान्य स्थिति पैदा कर देती है। यही वजह है कि मनोवैज्ञानिक हमेशा आगाह करते हैं कि अपराध की तकनीकी जानकारी को सीमित रखा जाए।

सामाजिक संरचना में अपराध को सूचना तक सीमित रखना अधिक उचित होता है। आपकी रचनात्मक, उपदेशात्मक या अत्यधिक विवरणात्मक प्रस्तुति समाज पर आपकी इच्छानुसार ही प्रभाव डालेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। अपराध इस धरती की सबसे जटिल अवधारणाओं में से एक है। इसलिए उसे मीम, मनोरंजन और चुटकुलों का विषय बनाने से बचना ही समाज की सेहत के लिए बेहतर है।