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जड़ों से कटने का नतीजा

इधर हिंदी में जो नए लेखक आ रहे हैं, वे बहुत पढ़े-लिखे हैं और ज्ञान के दूसरे अनुशासनों से संबद्ध हैं। वे ज्ञानी तो हैं, पर स्थानीय बोली-बानी और परिवेश से कटे हुए हैं। उनके अनुभव क्षेत्र में गांव-देहात, किसान-मजदूर बहुत दूर तक शामिल नहीं हैं। एक तरह से वे स्थानीय भाषा और संस्कृति से कटे हुए हैं।

Author June 3, 2018 4:48 AM
हिंदी में जो नए लेखक आ रहे हैं वे बहुत पढ़े-लिखे हैं और ज्ञान के दूसरे अनुशासनों से संबद्ध हैं।

हिंदीभाषी क्षेत्र काफी विस्तृत है। इसमें कई बोलियां बोली जाती हैं। हिंदी भाषा के स्वरूप में बोलियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। लोग अपनी मातृभाषा के रूप में इन्हीं बोलियों का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए हिंदी का लेखक जब कोई साहित्य रचता है तो उसके लेखन में बोलियों के शब्द और मुहावरे आने स्वाभाविक हैं। भोजपुरी, अवधी, ब्रज, मैथिली आदि क्षेत्रों से आने वाले रचनाकारों की रचनाओं में इन बोलियों के शब्द स्वत:स्फूर्त आते हैं। इसी तरह, मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड आदि प्रदेशों के लेखकों की रचनाओं में क्षेत्रीय शब्दों का प्रयोग देखा जा सकता है।

स्थानीय बोलियों से प्रयुक्त शब्दों के कारण ही हिंदी साहित्य का एक विविधतामूलक परिदृश्य उभरता है। अगर हिंदी देश के व्यापक हिस्से में बोली जाने वाली भाषा है, तो उसके साहित्य में भी उस भाषाई व्यापकता के दर्शन होने चाहिए। नहीं तो साहित्य और भाषा में एक अलगाव पैदा होगा। भाषा तो विविधतामूलक रहेगी, पर साहित्य में एकरूपता आ जाएगी। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि भाषा के विस्तार का लाभ उसके साहित्य को नहीं मिल पाता। यह अकारण नहीं है कि हिंदी बोलने वालों की संख्या बढ़ रही है, उसका क्षेत्रगत विस्तार भी हो रहा है, पर हिंदी साहित्य पढ़ने वालों की संख्या घट रही है। पिछले कुछ सालों में हिंदी साहित्य के भीतर भाषाई एकरूपता बहुत तेजी से बढ़ी है। एक विंडबनापूर्ण स्थिति यह है कि साहित्य में भाषाई एकरूपता आती जा रही है, पर समाज में भाषाई विविधता बरकरार है। आज भी भिन्न-भिन्न प्रदेशों के हिंदी बोलने वालों को अलग-अलग पहचाना जा सकता है। पर उनकी रचना के आधार पर उनके प्रदेश या क्षेत्र की पहचान करना अब संभव नहीं रह गया है।

भाषा का विषय-वस्तु से भी गहरा रिश्ता होता है। अगर हिंदी में लिखे जा रहे साहित्य की भाषा से स्थानीय बोलियों के शब्द गायब हो रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि हिंदी साहित्य से स्थानीय संदर्भ भी गायब हो रहे हैं। स्थानीय संदर्भों के गायब होने से साहित्य अपनी जड़ों से कट जाता है। वह लाखों-करोड़ों जनता की यातना और संघर्ष को स्वर देने की जगह खाए-अघाए लोगों की पतनशील जीवन-शैली को रोमांचक बना कर प्रस्तुत करने लगता है। पिछले एक-डेढ़ दशक से हिंदी साहित्य में महानगरीय भाव-बोध बहुत तेजी से बढ़ा है। इसी दौरान साहित्य से स्थानीय शब्दों का विस्थापन तेज हुआ है और हिंदी साहित्य की भाषाई विविधता भी संकुचित हुई है।

हिंदी साहित्य की भाषाई विविधता नष्ट होने का सीधा असर उसकी प्रसार संख्या और पठनीयता पर पड़ रहा है। पाठक उस रचना से जल्दी जुड़ता है, जिसमें उसकी बोली-बानी और परिवेश की अभिव्यक्ति होती है। एक बड़ा प्रश्न है कि महानगरीय भाव-बोध की रचनाओं को गांव या कस्बों में रहने वाला व्यक्ति क्यों पढ़ेगा? जिस रचना से वह बेदखल है उसके साथ उसका जुड़ाव कैसे हो सकता है? हिंदी साहित्य आज पठनीयता के जिस बड़े संकट से गुजर रहा है, उसका एक बड़ा कारण आम आदमी, गरीब, मजदूर, किसान आदि के दुख-दर्द, बोली-बानी और परिवेश से साहित्य का कट जाना है।

यह सोचने का समय है कि भूमंडलीकरण के कारण जब स्थानीय भाषा-बोली, रीति-रिवाज, संस्कृति सब कुछ पर संकट मंडरा रहा है और हर एक स्थानीय चीज को तहस-नहस करने का उपक्रम जारी है तब साहित्य और साहित्यकार का क्या दायित्व होना चाहिए? क्या उसे भी भूमंडलीकरण की परियोजना के साथ हो जाना चाहिए या उसका प्रतिरोध करते हुए अपने साहित्य में स्थानीय बोली-बानी और संस्कृति को संरक्षित करने का काम करना चाहिए? जब चारों तरफ से स्थानीयता पर हमले हो रहे हों तब साहित्यकार का दायित्व और बढ़ जाता है। अझेल हमलों के बीच साहित्य ही वह अंतिम शरणस्थली है, जहां स्थानीयता को बचाया जा सकता है। इतिहास साक्षी है कि भाषाएं समाप्त हो जाती हैं, पर उनमें रचित साहित्य बचा रहता है। पालि, प्राकृत, अपभ्रंष जैसी अनेक भाषाएं आज समाज-व्यवहार का हिस्सा नहीं हैं, पर उनमें रचित साहित्य आज भी मौजूद है। ये भाषाएं आज साहित्य के रूप में ही संरक्षित हैं। यह तथ्य उन सभी स्थानीय बोलियों-भाषाओं के लिए भी सच है, जो आज संकट के दौर से गुजर रही है।

दुनिया आज बहुत तेजी से बदल रही है। बदलाव की इस प्रक्रिया में सभी परंपरागत चीजें नष्ट हो रही हैं। बहुत से परंपरागत शब्द भी विलुप्त हो रहे हैं। शब्दों का रिश्ता भौतिक जगत से होता है। जब भौतिक जगत में परिवर्तन होता है, तो शब्दों की दुनिया में भी परिवर्तन होता है। जब परंपरागत चीजें और अनुभव समाप्त होंगे, तो उनको अभिव्यक्त करने वाले शब्द भी धीरे-धीरे प्रचलन से गायब हो ही जाएंगे। भविष्य के लिए वे शब्द और अनुभव सिर्फ साहित्य के माध्यम से संरक्षित हो सकते हैं। ऐसे शब्द और अनुभव स्थानीय बोली-बानी में ही अभिव्यक्त होते हैं।

साहित्य में स्थानीय बोलियों के शब्दों का इस्तेमाल वर्तमान समय में एक तरह से भाषाई प्रतिरोध है। एकरूपता के विरुद्ध विविधता के पक्ष में खड़े होना है और सबसे बड़ी बात कि भाषाई लोकतंत्र को बचाए रखने के संघर्ष में शामिल होना है। भाषाई एकरूपता हिंदी की मूल प्रकृति के विरुद्ध है। साहित्य में भाषाई एकरूपता का होना एक खास भावबोध, विषय-वस्तु और दृष्टि को आत्मसात करना है। यह प्रवृत्ति साहित्य में केंद्रीकरण को बढ़ावा देती है। इससे उन साहित्यकारों की उपेक्षा होती है, जो महानगरों या शहरों से दूर रहते हैं या स्थानीय भाषा और संवेदना को अपने साहित्य के माध्यम से रेखांकित करने का प्रयास करते हैं।

एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि हिंदी की साहित्यिक रचनाओं में भाषाई विविधता क्यों खत्म हो रही है? इधर की अधिकांश रचनाओं में एक ही तरह के भाषा-प्रयोग देखने को मिल रहे हैं। लेखक भाषा के स्थानीय प्रभाव से क्यों मुक्त हो रहे हैं? कई लोग इसका यह जवाब देते हैं कि स्थानीय शब्दों और मुहावरों के प्रयोग के कारण दूसरे क्षेत्र के पाठकों को पढ़ने में कठिनाई होती है। ऊपर से देखने पर यह बात सही लग सकती है, पर गहराई में जाकर देखें तो यह बात बहुत सही प्रतीत नहीं होती। प्राय: ऐसा देखा गया है कि जो लोग स्थानीय शब्दों से परहेज करते हैं, उनकी रचनाओं में अंग्रेजी शब्दों का खूब इस्तेमाल होता है। उन्हें अंग्रेजी से तो कोई समस्या नहीं है, लेकिन बोलियों से है। दरअसल, यह एक अभिजात मानसिकता है, जो स्थानीयता के प्रति विरोध से भरी होती है। जहां तक पाठकों का प्रश्न है, यह सोचने वाली बात है कि वह कैसा पाठक है जो बोलियों के शब्द तो नहीं समझ पाएगा, पर अंग्रेजी के शब्द समझ लेगा? हिंदी का पाठक अंग्रेजी की तुलना में दूसरे क्षेत्रों की बोलियों से निश्चय ही अधिक करीब होता है। स्थानीय शब्दों और बोलियों को नजरअंदाज करके अंग्रेजी शब्दों को तरजीह देना हिंदी साहित्य के लिए कहीं से भी श्रेयस्कर नहीं है।

इधर, हिंदी में जो नए लेखक आ रहे हैं वे बहुत पढ़े-लिखे हैं और ज्ञान के दूसरे अनुशासनों से संबद्ध हैं। वे ज्ञानी तो हैं, पर स्थानीय बोली-बानी और परिवेश से कटे हुए हैं। उनके अनुभव क्षेत्र में गांव-देहात, किसान-मजदूर बहुत दूर तक शामिल नहीं हैं। एक तरह से वे स्थानीय भाषा और संस्कृति से कटे हुए हैं। इस अलगाव के कारण वे स्थानीय संदर्भों का रचनात्मक उपयोग कर सकने में असमर्थ हैं। उनकी इस असमर्थता के कारण समकालीन लेखन से स्थानीय भाव-बोध विलुप्त होता जा रहा है। यह हिंदी साहित्य के लिए आत्मघाती है।

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