बारह साल की क्लाडिया अपने माता-पिता की सबसे बड़ी संतान है। आम बच्चों की तरह उसे भी ज्यादातर समय यही शिकायत रहती है कि उसके घर में उसकी कोई कद्र नहीं है। उसे गलतफहमी है कि घर में उसके छोटे भाई जेमी को ज्यादा तवज्जो मिलती है। अपनी उपेक्षा के ऊहापोह में एक दिन वह यह सोच कर रोमांच महूसस करती है कि अगर वह इस घर से चली जाए तो घरवाले उसकी गैरमौजूदगी से किस तरह प्रभावित होंगे? क्या वे उसके लिए बेचैन होंगे? उसे लगता है कि घर छोड़ने के बाद ही उसकी महत्ता समझ में आएगी। उसके बाद ही जीवन में कोई बदलाव आएगा।
क्लाडिया और जेमी घर से भाग जाते हैं। वे न्यूयार्क के मेट्रोपालिटन कला संग्रहालय में छुप कर रहने लगते है। दिन की भीड़-भाड़ में दोनों भाई-बहन संग्रहालय के दर्शकों का हिस्सा होते हैं और रात में वहीं पर छुप कर सो जाते हैं। क्लाडिया संग्रहालय में रखी वस्तुओं को इस नजरिए से समझने की कोशिश करती है कि आखिर किस योगदान के कारण ये यहां हैं।
पैसे खर्च करने को लेकर भाई-बहन की नोक-झोंक उपन्यास का मजेदार अंश है
लोगों को इनके बारे में जानकारी क्यों होनी चाहिए? वह वहां बहुत कुछ सीखती है। जल्दी ही उसका नजरिया भी बदलने लगता है। भाई-बहन के पास पैसे भी बहुत थोड़े हैं। पर क्लाडिया को इस बात की ज्यादा फिक्र नहीं है। वहीं जेमी पैसे को मितव्यता से खर्च करना चाहता है। क्लाडिया जेमी को कंजूस मानती है। पैसे खर्च करने को लेकर भाई-बहन की नोक-झोंक उपन्यास का मजेदार अंश है।
संग्रहालय में कहानी जासूसी-कथा का मोड़ तब लेती है जब वहां एक एंजेल की मूर्ति आती है। इस मूर्ति को माइकल एंजेलो की कृति माना जा रहा है। इस मूर्ति के रहस्य को समझने के दौरान ही भाई-बहन की मुलाकात श्रीमति बासिल ई फ्रैंकवेलर से होती है। इस घटनाक्रम के बाद क्लाडिया को अपने घर में अपना वजूद भी समझ आने लगता है।
अब वह परिवार की जरूरत महसूस करती है। उसे लगता है कि घर में उसकी बात सुनी जाएगी। घर में उसकी एक खास पहचान है। वह क्लाडिया है जो कोई और नहीं है। वह दूसरों से अलग है। दूसरों से अलग होना ही तो नायिका के गुण हैं। दुनिया की सबसे बड़ी कला संस्थाओं में से एक में अपना अस्थायी बसेरा बसाने के बाद उसे अपना घर और वहां उसके वजूद के महत्त्व का पता चलता है।
