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कला और संस्कृति: नृत्यांगना, दर्शनशास्त्री और भरतनाट्यम की कोरियोग्राफ रुक्मिणी देवी अरुंडेल

मदुरई के ब्राह्मण परिवार में जन्मीं रुक्मिणी, नीलकंठ शास्त्री और सीशामल्ल की आठ संतानों में से एक थीं। उनके पिता, इंजीनियर और मद्रास स्थित थियोसोफिकल सोसाएटी के एक उत्साही अनुयायी और करीबी सहयोगी थे।

Author Published on: February 16, 2020 2:42 AM
कत्थक नृत्यांगना रुक्मिणी देवी अरुंडेल (फोटो- विकीपीडिया)

रुक्मिणी देवी अरुंडेल देश की जानी-मानी भरतनाट्यम नृत्यांगना थीं। नृत्यांगना होने के साथ-साथ वे दर्शनशास्त्री और भारतीय शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम की कोरियोग्राफर भी थीं। उन्हें भरतनाट्यम की एक विधा ‘साधिर’ के पुनरुत्थान के लिए जाना जाता है। भारतीय नृत्य कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का श्रेय भी उन्हें जाता है। नृत्य के अलावा उन्होंने पशु अधिकारों के लिए भी कई कार्य किएं।

प्रारंभिक जीवन
मदुरई के ब्राह्मण परिवार में जन्मीं रुक्मिणी, नीलकंठ शास्त्री और सीशामल्ल की आठ संतानों में से एक थीं। उनके पिता, इंजीनियर और मद्रास स्थित थियोसोफिकल सोसाएटी के एक उत्साही अनुयायी और करीबी सहयोगी थे। थियोसोफिकल सोसाएटी की बदौलत संस्कृति, रंगमंच, संगीत और नृत्य के नए विचारों से अवगत हुईं। यहीं उनकी मुलाकात प्रमुख ब्रिटिश थियोसोफिस्ट डॉ जॉर्ज अरुंडेल से हुई और 1920 में दोनों ने शादी कर ली। 1923 में, वे आॅल इंडिया फेडरेशन आफ यंग थियोसोफिस्ट्स और 1925 में वर्ल्ड फेडरेशन आफ यंग थियोसोफिस्ट्स की अध्यक्ष बनीं।

डीम्ड विश्वविद्यालय
1920 के दशक में जब भरतनाट्यम को अच्छी नृत्य शैली नहीं माना जाता था और लोग इसका विरोध करते थे, तब भी उन्होंने न केवल इसका समर्थन किया बल्कि इस कला को अपनाया भी। उन्होंने ‘मायलापुर’ गौरी अम्मा के सानिध्य में भरतनाट्यम की बारीकियां सीखी और ‘पंडनाल्लूर’ मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई से प्रशिक्षण लेकर उसे उत्कृष्ट स्वरूप प्रदान किया। 1935 में उन्होंने तमाम विरोधों के बावजूद अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी थी। इसके बाद 1936 में उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर चेन्नई के अड्यार में नृत्य एवं कला प्रशिक्षण केंद्र कलाक्षेत्र खोला, जिसे बाद में 1962 में वह तिरुवंमियूर ले गईं। वर्तमान में कलाक्षेत्र फाउंडेशन के तहत यह संस्थान एक राष्ट्रीय महत्व का डीम्ड विश्वविद्यालय है।

‘साधिर’ को पहचान दिलाई
उन्होंने पारंपरिक भारतीय कला और शिल्प की पुन: स्थापना के लिए भी काम किया। मंदिर नर्तक, देवदासियों के बीच प्रचलित भरतनाट्यम की एक विधा ‘साधिर’ के पुनरुत्थान और पहचान दिलाने का श्रेय भी रुक्मिणी देवी को जाता है। उन्होंने इस नृत्य शैली को अंतरराष्ट्रीय स्तर की बुलंदियों पर पहुंचाया।

शाकाहार को बढ़ावा
उन्होंने देश में शाकाहार को बढ़ावा देने के लिए बहुत काम किया। वे जानवरों की हत्या और बलि की घोर विरोधी थीं। उन्होंने देश में जानवरों की बदहाली, मांस के लिए उनके कत्ल और उन्हें बचाने के सभी जरूरी प्रयास किएं। उन्होंने ही सबसे पहले संसद में पशु क्रूरता रोकथाम विधेयक 1953 में पेश किया। उन्हीं की बदौलत 1960 में यह बिल पारित हो सका। वे 31 सालों तक अंतरराष्ट्रीय शाकाहारी संघ की उपाध्यक्ष भी रहीं।

पुरस्कार और सम्मान
भारतीय नृत्य कला में योगदान के लिए 1956 में पद्म भूषण, 1957 में संगीत नाटक पुरस्कार और 1967 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप से नवाजा गया था। रुक्मिणी देवी को 1952 और 1956 में भारतीय संसद की राज्य परिषद (राज्य सभा) के सदस्य के रूप में नामित किया गया था। वह भारतीय इतिहास की पहली महिला थीं जिन्हें राज्यसभा का सदस्य नामित किया गया था। राज्य सभा के सदस्य के रूप में वे विभिन्न मानवीय संगठनों से जुड़ी थीं। 1977 में उन्हें मोरारजी देसाई ने राष्ट्रपति पद के लिए भी मनोनीत करने का विचार दिया था लेकिन उन्होंने इस पद के लिए बड़ी ही विनम्रता से मना कर दिया था। रुक्मिणी देवी ने राष्ट्रपति भवन से ज्यादा अहमियत अपनी साधना यानी कला को दिया था।
निधन : 24 फरवरी 1986 को चेन्नई में उनका निधन हो गया।

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