आम तौर पर हम किसी प्रसिद्ध स्कूल या कॉलेज का नाम तो जानते हैं, पर उस स्कूल-कॉलेज की बुनियाद का पत्थर रखने वालों के बारे में बहुत कम लोगों को पता होता है।
‘सरस्वती’ एक ऐसी पत्रिका थी, जिसे हम हिंदी साहित्य की पाठशाला या प्रयोगशाला कह सकते हैं। ‘सरस्वती’ का नाम सुनते ही हमारे जेहन में पहला नाम महावीर प्रसाद द्विवेदी का आता है, जिनके संपादन में इस पत्रिका ने हिंदी साहित्य के पठन-पाठन को नया विस्तार दिया।
द्विवेदी के हाथों में हिंदी की यह प्रयोगशाला सौंपने वाले थे चिंतामणि घोष। चिंतामणि घोष मूल रूप से बंगाली थे। उनका जन्म उन्नीसवीं सदी के मध्य में हुआ था। घोष की समझ थी कि भारत जैसे देश में साहित्य और विचारों के प्रसार के लिए उच्च गुणवत्ता वाले संस्थान जरूरी हैं।
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अपनी इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने प्रयागराज में इंडियन प्रेस की स्थापना की। इंडियन प्रेस ने बेहतरीन छपाई, आकर्षक साज-सज्जा और सतर्क संपादन की परंपरा स्थापित की। इन तैयारियों के बाद घोष ने 1900 में हिंदी मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ की शुरुआत की।
‘सरस्वती’ ने हिंदी साहित्य में अपना मुकाम तब पाया, जब घोष ने महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें इसका संपादक बनाया। घोष में प्रतिभाओं को पहचानने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने अनेक लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित करने के साथ हिंदी लेखन को आर्थिक आधार देने की कोशिश की।
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महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, रामचंद्र शुक्ल और अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जैसे हिंदी के विद्वानों की कलम को घोष के प्रेस की स्याही ने खूब छापा।
घोष का मानना था कि भारतीय भाषाओं के विकास के लिए मजबूत प्रकाशन संस्थाओं की आवश्यकता है। हिंदी साहित्य के इतिहास में आज भी इस बात का उल्लेख किया जाता है कि हिंदी नवजागरण की कहानी का नायक एक बंगाली है, जिसने लेखकों को पाठकों तक पहुंचाया।
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सुबह के सत्र में शब्द तलवार बन जाते थे और रात के अंधेरे में वही शब्द पुल। हिंदी साहित्य सम्मेलन की यही सबसे अनोखी पहचान रही है – जहां भाषा पर तीखी बहसें भी हुईं और उसी भाषा ने दिलों को जोड़े रखने का काम भी किया। बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों का वह समय था, जब भारत अंग्रेजी हुकूमत के अधीन था और भाषा का सवाल केवल अभिव्यक्ति का नहीं, बल्कि पहचान और प्रतिरोध का भी था। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
