बात करीब तीन दशक पुरानी है। लगभग दस साल का अर्पण कक्षा छह में पढ़ता था। एक दिन बारिश के मौसम में वह स्कूल से घर लौट रहा था। रास्ते में ज्यादा लोग नहीं थे। कुछ बच्चे जरूर दिखाई दे रहे थे, लेकिन वे भी अपने-अपने घरों की ओर जल्दी-जल्दी बढ़ रहे थे।

रास्ते में एक जगह काफी कीचड़ था। अर्पण ने सोचा कि कीचड़ से होकर जाने के बजाय वह बगल से निकल जाएगा। उसे क्या पता था कि जिस रास्ते को वह आसान समझकर चुन रहा है, वही उसके लिए जिंदगी और मौत के बीच का रास्ता बनने वाला है।

बगल में एक तालाब था। बारिश के मौसम में उसमें घनी जलकुंभी फैली हुई थी। ऊपर से देखने पर पूरा तालाब किसी हरे-भरे मैदान जैसा दिखाई दे रहा था। अर्पण को भी वह पानी का तालाब नहीं, जमीन पर फैला कोई हरा मैदान ही लगा। उसने जैसे ही अपना पैर आगे बढ़ाया, अगले ही पल वह कमर तक पानी में धंस गया।

जितना छटपटाया, उतना ही धंसता गया

अचानक हुए इस हादसे से अर्पण घबरा गया। वह खुद को बाहर निकालने की कोशिश करने लगा, लेकिन जितना हाथ-पांव मारकर ऊपर आने की कोशिश करता, उतना ही नीचे धंसता चला जाता। वह रुआंसा हो गया। उसने इधर-उधर हाथ-पांव मारते हुए मदद के लिए आवाज भी लगाई, लेकिन वहां कोई नहीं था।

जिस कीचड़ वाले रास्ते से बचने के लिए उसने अन्य बच्चों का साथ छोड़कर इस तरफ आया था, वे कीचड़ से होकर आगे निकल चुके थे। अब वहां अर्पण अकेला था।

उसका पूरा स्कूल यूनिफॉर्म पानी और मिट्टी से बुरी तरह सन चुका था। उसका बैग भी पानी में डूब गया था और उसमें रखा सामान भी खराब हो रहा था। लेकिन उस समय उसे कपड़ों या बैग की चिंता नहीं थी। चिंता सिर्फ इस बात की थी कि वह किसी तरह उस दलदल जैसे पानी से बाहर निकल आए।

अर्पण लगातार कोशिश कर रहा था, लेकिन कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। तभी वहां एक भैंस आ गई। संयोग से वह तालाब के किनारे आकर बैठ गई। परेशान अर्पण को पता नहीं उस पल क्या सूझा। उसने थोड़ा खिसककर भैंस की लंबी पूंछ पकड़ ली।

अर्पण के पूंछ पकड़ते ही भैंस ने उसे छुड़ाने की कोशिश की। वह तेजी से उठी और भागने लगी। अर्पण ने भी पूंछ नहीं छोड़ी। भैंस जितनी तेजी से वहां से भागी, अर्पण भी उसी के साथ पानी से बाहर की ओर खिंचता चला गया। और आखिरकार वह बाहर निकल आया।

मुसीबत में सूझा एक अनोखा सहारा

शायद यही विपत्ति में धैर्य बनाए रखने का सबसे बड़ा अर्थ है। संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर इंसान घबराने के बजाय किसी रास्ते की तलाश करता रहे तो कहीं न कहीं से निकलने की उम्मीद बनी रहती है। अर्पण के सामने उस समय कोई बड़ा सहारा नहीं था। एक भैंस थी और उसकी पूंछ थी। उसने उसी को अपना सहारा बना लिया।

अगर उस समय अर्पण ने भैंस की पूंछ नहीं पकड़ी होती, तो न जाने उसके साथ क्या होता। यह भी संयोग ही था कि भैंस ने अपनी पूंछ छुड़ाने के लिए तेजी से वहां से दौड़ लगा दी और उसके साथ अर्पण भी पानी से बाहर निकल आया।

बाहर आने के बाद अर्पण ने पहले खुद को झाड़ा-पोंछा। फिर उसने अपने पानी से भीगे और मिट्टी से सने बैग को संभाला और घर की ओर चल पड़ा।

रास्ते में जो भी उसे देखता, हैरान रह जाता। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर यह बच्चा इस हालत में कैसे पहुंच गया। उसके पूरे कपड़े कीचड़ और पानी से सने थे और बैग के भीतर भी गंदा पानी पहुंच चुका था।

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जब अर्पण घर पहुंचा तो वह डरा हुआ था। मम्मी ने उसे इस हालत में देखा तो घबरा गईं और उससे पूछा कि आखिर हुआ क्या है। अर्पण ने कोई बहाना नहीं बनाया। उसने जो कुछ हुआ था, सब कुछ उसी तरह बता दिया।

मम्मी उसकी बात सुनती रहीं और उसके बाद उसकी हालत को देखती रहीं। उनकी आंखों के सामने अभी भी वही दृश्य था—करीब दस साल का उनका बच्चा, तालाब में धंसता हुआ, मदद के लिए अकेला हाथ-पांव मारता हुआ और फिर एक भैंस की पूंछ पकड़कर अपनी जान बचाता हुआ।

वह करुणा से भर गईं। बार-बार यही कहती रहीं कि इतना छोटा बच्चा आखिर बिना डरे भैंस की पूंछ पकड़कर कैसे निकल आया। उस दिन उन्हें अपने बच्चे पर सिर्फ ममता नहीं, गर्व भी हुआ।

उन्हें पहली बार यह अहसास हुआ कि जिसे वे अभी तक अपना छोटा-सा बच्चा समझती थीं, उसमें मुश्किल समय में खुद को संभालने और हालात से रास्ता निकालने की समझ भी आ चुकी थी।

अर्पण के लिए वह घटना शायद जिंदगी का एक डरावना हादसा थी, लेकिन उसकी मां के लिए वह उस दिन अपने बच्चे के भीतर छिपे साहस और धैर्य को पहचान लेने का क्षण बन गई।

कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां कोई रास्ता साफ दिखाई नहीं देता। ऐसे में जरूरी यह नहीं कि हमारे पास कितना बड़ा सहारा है। जरूरी यह है कि जो छोटा-सा सहारा सामने दिखाई दे, हम उसे पहचान पाएं और उसे पकड़ने का साहस जुटा पाएं।