वह फरवरी का महीना था। पेड़ों की पत्तियों पर हल्की ठंड महसूस की जा रही थी। सुबह अभी पूरी तरह खुली भी नहीं थी। पेड़ों की पत्तियों पर ओस अटकी हुई थी। प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में रोज की तरह कुछ लोग टहल रहे थे। कोई अखबार लेकर बेंच पर बैठा था, कोई धीमे-धीमे कदमों से पगडंडी नाप रहा था। फिर अचानक गोलियों की आवाज गूंजी। एक नहीं, कई।

लोग भागने लगे। कुछ झाड़ियों के पीछे छिप गए। पार्क के बीचोंबीच एक आदमी पेड़ की ओट लेकर लगातार जवाबी फायरिंग कर रहा था। सामने अंग्रेज पुलिस थी। चारों तरफ से घेराबंदी। और बीच में अकेला वह युवक चंद्रशेखर आजाद।

आज जिस जगह को चंद्रशेखर आजाद पार्क कहा जाता है, वहां 27 फरवरी 1931 की सुबह सिर्फ एक मुठभेड़ नहीं हुई थी। वह ब्रिटिश राज और भारतीय क्रांतिकारी चेतना के बीच सीधी भिड़ंत थी।

“पंडितजी पार्क में हैं…”

उस समय प्रयागराज सिर्फ एक शहर नहीं था। वह राजनीतिक बेचैनी का अड्डा बन चुका था। एक तरफ आनंद भवन में कांग्रेस की रणनीतियां बन रही थीं, दूसरी तरफ गुप्त क्रांतिकारी संगठन अंग्रेजी राज की जड़ों पर चोट करने की तैयारी कर रहे थे। आजाद इन क्रांतिकारियों के सबसे बड़े चेहरों में थे। पुलिस रिकॉर्ड में वे “मोस्ट वांटेड” थे। उन पर इनाम घोषित था। लेकिन शहर में बहुत लोग उन्हें उनके असली नाम से नहीं, “पंडितजी” कहकर जानते थे।

उस सुबह भी वे अपने साथी सुखदेव राज से मिलने पार्क पहुंचे थे। बाद में कई ऐतिहासिक विवरणों और संस्मरणों में यह बात दर्ज हुई कि पुलिस को किसी मुखबिर से सूचना मिल चुकी थी। अंग्रेज अफसर नॉट-बावर की अगुवाई में पुलिस ने पार्क को घेर लिया। शायद आजाद समझ चुके थे कि अब निकलना आसान नहीं है।

पेड़ों के बीच शुरू हुई लड़ाई

मुठभेड़ कितनी देर चली, इसे लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। लेकिन एक बात लगभग सभी स्रोतों में समान है – आजाद ने अकेले पुलिस को लंबे समय तक रोके रखा। वह लगातार जगह बदलते रहे। कभी पेड़ की ओट, कभी बेंच के पीछे, कभी मिट्टी के छोटे उभार के सहारे। उनके पास गोलियां सीमित थीं। सामने रायफलें थीं।

सुखदेव राज के संस्मरणों के अनुसार, आजाद ने उन्हें वहां से निकल जाने को कहा। यह फैसला भावनात्मक नहीं, रणनीतिक था। वे जानते थे कि अगर दोनों पकड़े गए, तो संगठन को भारी नुकसान होगा। इसी बीच गोलियां चलती रहीं। पार्क, जो कुछ देर पहले तक सुबह की सैर का हिस्सा था, अब युद्धभूमि में बदल चुका था।

अंग्रेज सरकार को सबसे ज्यादा डर किससे था?

यह समझना जरूरी है कि अंग्रेज सिर्फ एक व्यक्ति को पकड़ने नहीं आए थे। वे एक विचार को खत्म करना चाहते थे। उस दौर में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के युवा क्रांतिकारी भारतीय युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे। भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद आज़ाद ही वह चेहरा थे, जो भूमिगत रहकर पूरे नेटवर्क को संभाल रहे थे।

ब्रिटिश सरकार के दस्तावेज़ बताते हैं कि पुलिस उन्हें जिंदा पकड़ना चाहती थी। उनसे जानकारी निकाली जा सकती थी। संगठन के बाकी लोगों तक पहुंचा जा सकता था। लेकिन अल्फ्रेड पार्क में चीजें अंग्रेजों की योजना के मुताबिक नहीं हुईं।

आखिरी गोली बची तो क्या किया?

आजाद की पिस्तौल में आखिर में सिर्फ एक गोली बची थी। यह घटना बाद में इतनी चर्चित हुई कि वह लगभग किंवदंती बन गई। लेकिन इसका आधार सिर्फ लोककथा नहीं है। कई स्वतंत्रता सेनानियों के संस्मरण, समकालीन विवरण और बाद की ऐतिहासिक किताबें इस बात का उल्लेख करती हैं कि उन्होंने आत्मसमर्पण करने के बजाय खुद को गोली मार ली।

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उन्होंने बचपन में अदालत में अपना नाम “आजाद”, पिता का नाम “स्वतंत्रता” और पता “जेलखाना” बताया था। अल्फ्रेड पार्क में उन्होंने उस पहचान को अंत तक निभाया। जब गोली चली, तो कुछ सेकंड के लिए पार्क में अजीब-सा सन्नाटा छा गया। जिस आदमी को अंग्रेज जिंदा पकड़ना चाहते थे, वह अब उनके सामने मृत पड़ा था – लेकिन पराजित नहीं।

फिर शहर में क्या हुआ?

आजाद की मौत की खबर आग की तरह फैली। प्रयागराज की गलियों, छात्रावासों और चौराहों पर सिर्फ उसी की चर्चा थी। लोग अल्फ्रेड पार्क की तरफ जाने लगे। अंग्रेज प्रशासन ने स्थिति संभालने की कोशिश की, क्योंकि उन्हें डर था कि यह घटना जनाक्रोश में बदल सकती है। उस समय के कई विवरण बताते हैं कि युवाओं के बीच आजाद की छवि और बड़ी हो गई। वह अब सिर्फ क्रांतिकारी नहीं रहे थे; वे प्रतिरोध के प्रतीक बन चुके थे।

स्थानीय लोगों के बीच लंबे समय तक उस पेड़ की चर्चा होती रही, जिसके पास मुठभेड़ हुई थी। लोग वहां जाकर मिट्टी तक उठाकर ले जाते थे। बाद में वह पेड़ नहीं रहा, लेकिन उसकी जगह कहानी बची रही।

आज उस जगह पर खड़े होकर क्या महसूस होता है?

अगर आप आज चंद्रशेखर आजाद पार्क जाएं, तो वहां बच्चों की आवाजें सुनाई देंगी, लोग टहलते मिलेंगे, कोई पेड़ के नीचे बैठा मिलेगा। पहली नजर में शायद कुछ असाधारण न लगे। लेकिन इतिहास हमेशा शोर करके नहीं दिखता। कभी-कभी वह एक साधारण-सी जगह में चुपचाप पड़ा रहता है।अल्फ्रेड पार्क की वह सुबह भी अब किसी फिल्म का दृश्य नहीं, बल्कि प्रयागराज की स्मृति का हिस्सा है। फर्क बस इतना है कि उस दिन यहां एक आदमी हारने नहीं आया था। वह सिर्फ यह तय करने आया था कि पकड़ा नहीं जाएगा।

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प्रयागराज की भीड़ में अगर आज अचानक घोड़ों की टाप सुनाई दे, तो लोग रुककर मोबाइल निकाल लेंगे, वीडियो बनाएंगे, रील बनाएंगे, और कुछ सेकंड में वह दृश्य शहर से निकलकर दुनिया तक पहुंच जाएगा। लेकिन एक समय था, जब यही टापें किसी रील का हिस्सा नहीं, बल्कि शहर की धड़कन हुआ करती थीं। और उन्हीं टापों के साथ कभी-कभी एक चेहरा भी गुजरता था – जवाहरलाल नेहरू – जो तब सिर्फ एक राष्ट्रीय नेता नहीं, अपने शहर का जाना-पहचाना आदमी था। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक