‘प्रिय शरद जी, नमस्कार! आपके घर का पता प्राप्त करने में मुझे ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। कई दिनों के मंथन के बाद आपको पत्र लिखने की हिम्मत कर पाई हूं। एक दिन माल रोड पर घूमते हुए एक दुकान से आपकी लिखी किताब खरीदी थी। किताब के आवरण-पृष्ठ पर पीछे आपका ईमेल लिखा हुआ था। मैं ईमेल करके औपचारिकता नहीं करना चाहती थी, इसलिए पत्र लिखा है। कई दफा आपके लिखे-कहे को पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ चुकी हूं। लेकिन किताब पहली बार हाथ यहीं से लगी। इन दिनों यही किताब पढ़ रही हूं। कभी चमोली आने का अवसर मिले तो याद कीजिएगा। गढ़वाल घुमाने की जिम्मेदारी मेरी। नैनीताल और अल्मोड़ा से ज्यादा बुरांश यहां खिलते हैं। उम्मीद करती हूं कि बुरांश आपको यहां अवश्य खींच लाएगा। बड़े उत्साह के साथ आपका इंतजार रहेगा।’
पत्र में कुछ नितांत निजी बातें भी थीं, जिनका जिक्र करना मैं यहां कतई उचित नहीं समझता। यह बताना लाजिम है कि पत्र के अंत में ईमेल, फोन नंबर, उसके घर का पता लिखा था। साथ ही लिखा था-नेगी गढ़वाली। मिलने की उत्सुकता का ताप दोनों ओर बना रहे, इसलिए मैंने फोन करने की जल्दबाजी कभी नहीं दिखाई। लेकिन, उसका पत्र मिलने का एक संक्षिप्त ईमेल मैंने उसे भेज दिया था।
गढ़वाली शब्द से तो मैं समझ चुका था कि यह वहां के पहाड़ी लोगों के लिए एक सम्मानजनक शब्द है जो उनके नाम के साथ लगता है। लेकिन, नेगी उसका नाम है या कुलनामयह अभी तक तय नहीं था। यदि उसका कुलनामनेगी है, तो फिर उसने मुझे भेजे पत्र में अपने नाम का जिक्र क्यों नहीं किया! उसका जब पत्र मिला, तब से यह तय कर रखा था कि चमोली अवश्य जाऊंगा। सोचा, जब भी जाऊंगा, वह मार्च-अप्रैल का महीना ही होगा। अब आप सोच रहे होंगे कि मार्च-अप्रैल में चमोली में ऐसा क्या खास होता है..! उसने जो पत्र भेजा था उसमें बुरांश अपनी छटा बिखेर रहा था। तब से मेरी आंखों में वही सुर्ख लाल रंग चटक रहा था। और ‘नेगी गढ़वाली’ शब्द कानों में गूंजता रहा।
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इधर विलंब के बावजूद इस पत्र ने तीन साल पहले की गई कुमाऊं यात्रा की यादों को ताजा कर दिया। लेकिन तब गढ़वाल जाने का अवसर नहीं मिला। नैनीताल से अल्मोड़ा होते हुए लौट आया था। दो दिन नैनीताल और दो दिन अल्मोड़ा ठहरा था। नैनीताल से अल्मोड़ा जाते हुए रास्ते में आसमान को छूते देवदार के वृक्ष, पहाड़ों पर बर्फ से आच्छादित दूर तक फैली रजत चोटियां, प्राचीन ऐतिहासिक मंदिरों का वैभव और बीच-बीच में कहीं-कहीं बुरांश अपने विहंगम दृश्यों के साथ यात्रा में मेरे लेखन को प्रभावित कर रहे थे।
सोचते-विचारते, शब्द गढ़ते यह यात्रा दो साल में ही अपने मुकम्मल रूप में बुरांश में बदल गई। दिल्ली में बैठे एक प्रकाशक ने इसे अनुबंध के साथ हाथों-हाथ लिया था। यात्रा की यात्रा और कथा की कथा। आपको जैसा ठीक लगे, समझ लें। बहरहाल, लिखा तो उपन्यास ही गया था। गढ़वाली ने इसमें क्या देखा, समझा! यह तो वही बता पाएगी।
वैसे रचनाओं पर कई प्रतिक्रियाएं मिलती रही हैं, लेकिन इस तरह का पत्र पहली बार मिला था। अपनी रचनाओं के साथ मैं अक्सर अपनी सुंदर फोटो प्रकाशन हेतु भेजता रहा हूं। किताबों के आवरण-पृष्ठ पर भी सुंदर फोटो चस्पा होती रही है। पर मुझे नहीं लगता कि गढ़वाली फोटो से प्रभावित हुई होगी! उसे अवश्य बुरांश ने प्रभावित किया होगा।
‘फ्लैशबैक’ कुछ इस तरह है। नैनीताल के तल्लीताल बस स्टैंड से शाम को पांच बजे यूटीसी की लग्जरी वाल्वो बस से अल्मोड़ा के लिए निकला था। तंग और सर्पिलाकार सड़क के समानांतर चलती नदी और खूबसूरत हरे-भरे पहाड़ यात्रा के रोमांच को दोगुना कर रहे थे। अभी बारिश के दिन नहीं थे। मौसम साफ था। बस मुझे धारानौला बस स्टैंड उतारकर हल्द्वानी के लिए निकल गई। अब मैं घोड़े की काठी जैसी आकृति वाले शहर अल्मोड़ा में था। यहां पत्थर से बने लाला बाजार में होटल हिमाद्री में ठहरा था। स्वागत-केंद्रपर पैंट-शर्ट पहने सुंदर कद-काठी वाली लड़की बैठी थी। यही कोई अट्ठाईस के करीब रही होगी। शर्ट की जेब पर उसकी नेमप्लेट झूल रही थी-निहारिका नेगी। मैंने उससे कहा, ‘मैं दो दिन यहीं ठहरा हूं। यहां के पर्यटन स्थलों का भ्रमण करना है। कोई गाइड मिल सकता है?’
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‘कल रविवार को मेरी छुट्टी रहती है। अगर आपको दिक्कत न हो, तो मैं आपको यहां घुमा सकती हूं।’ ‘ठीक है, सुबह नाश्ते के बाद मैं आपको तैयार मिलता हूं।’ अगले दिन सुबह वह मुझे सबसे पहले नंदादेवी मंदिर लेकर गई। पहले दिन उसने मुझे कई सारे दर्शनीय स्थानों का भ्रमण करवाया। पहले दिन की आत्मीयता ने उसे दूसरे दिन भी होटल से अवकाश लेने पर मजबूर किया। सिमटोला पार्क में देवदार और चीड़ के वृक्षों की छाया में सुकून तलाशते वह बुरांश के फूल तोड़ लाई। मैंने उन्हें अपने बैग में रख दिया। कभी वह बुरांश के औषधीय गुण बताती रही, तो कभी राह चलते ‘अल्मोड़े का वसंत’ कविता के सहारे पंत को याद करती रही।
वापसी में वह मुझे अपनी स्कूटी से बस स्टैंड तक छोड़ने आई। न तो उसने फोन नंबर मांगा, न मैंने दिया। उसने बस इतना ही पूछा, ‘क्या करते हैं आप?’ मैंने कहा, ‘लेखक हूं।’ ‘कभी कुछ लिखें, तो मेरे बारे में भी लिखिएगा।’ उसने कहा था।
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मैं मन ही मन मुस्कुराने लगा। तुम्हें क्या पता कि मैं मेरे दिमाग की चिप में बहुत कुछ लिख चुका हूं। शायद कभी ‘बुरांश’ की शक्ल में तुम्हारे सामने भी आए…। इधर बस ने हार्न बजाई। दिल्ली के लिए रवानगी की घोषणा बस कर रही थी। मैंने जेब से एक लिफाफा निकाला और उसकी ओर बढ़ा दिया।
‘बहुत शुक्रिया! फिर मिलेंगे।’ कहते हुए मैं बस में बैठ गया।
खिड़की से मैंने देखा, उसके चेहरे पर मुस्कान थी। लेकिन, आंखें नम थीं। शायद वह कुछ कहना चाह रही थी। बस अपने सफर पर निकल पड़ी। मैंने हाथ ऊपर किया और आंखों से ओझल होते, उसे देखता रहा।
प्रिय पाठको! जो कुछ मैंने कहा, इससे ज्यादा बुरांश में कैद है। सोचता हूं, कहीं निहारिका ही तो गढ़वाली नहीं है..! यही सोचकर, मार्च में चमोली जाने का टिकट बुक करवा देता हूं।
