books review of three books - किताबें मिलीं: 'उंगलियों में परछाइयां', 'समाजवाद की समस्याएं' और 'मैं हूं बबली- एक लड़की' - Jansatta
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किताबें मिलीं: ‘उंगलियों में परछाइयां’, ‘समाजवाद की समस्याएं’ और ‘मैं हूं बबली- एक लड़की’

स्त्री और पुरुष के लिए बराबर बनाई गई दुनिया में, स्त्री के अपने हिस्से में आई असमानता को समानता में बदलने का प्रयास करने वाली बबली और डबली, स्त्री के अस्तित्व की विलक्षणता, उसके सौंदर्य से भरी हुई हैं।

Author June 10, 2018 4:22 AM
समय और कविता में परिवर्तन की गति इतनी तीव्र है कि उसकी शक्ल को ठीक-ठीक देख और पहचान पाना मुश्किल हो रहा है।

समय और कविता में परिवर्तन की गति इतनी तीव्र है कि उसकी शक्ल को ठीक-ठीक देख और पहचान पाना मुश्किल हो रहा है। कविता में इस बीच आए बदलाव अक्सर अदेखे और अनसुने रह गए हैं। संजीव कौशल एक ऐसे नए कवि हैं जिनकी कविता में सोचने और रचने की ऐसी ताजगी लक्ष्य की जा सकती है जो कविता पर हमारे भरोसे को बचाती और बढ़ाती है। इस कविता में विचलित करती एक ऐसी पुकार भी है जो आह्वान करती है कि विचार को पत्थरों की कैद से बाहर आकर एक नई दांडी-यात्रा शुरू करने का वक्त आ गया है। यह कविता उन स्पेस या अवकाशों की तलाश करना चाहती है जहां से जिंदगी की नई इबारत लिखी जा सके।

यह दृष्टि ही संजीव की कविता को जीवन के उन अलक्षित दृश्यों के पीछे छिपे-ढके सच को देखने की नजर देती है। शायद दुनिया में सबसे अधिक बाल श्रमिक हमारे ही देश में हैं। संजीव की कविता इस अमानवीय सच्चाई को कई-कई कोण से हमें देखने और विचलित करने की कोशिश करती है। अपने समय और आसपास के जीवन की विडंबनाओं को पकड़ने की यह कोशिश संजीव के पक्ष और पक्षधरता दोनों का साक्ष्य है। हमारे समय की भयानक सच्चाइयों से सामना करती और कहीं मनुष्य के भीतर की आज भी बची हुई उज्ज्वला से उम्मीद करती संजीव के ये कविताएं हमारी कविता की उम्मीद हैं।

उंगलियों में परछाइयां : संजीव कौशल; साहित्य अकादेमी, रवींद्र भवन, 35, फीरोजशाह मार्ग, नई दिल्ली; 150 रुपए।

समाजवाद की समस्याएं

पिछले कुछ सालों में समाजवाद की प्रासंगिकता को लेकर लगातार बहसें चलती रही हैं। पिछले दिनों मार्क्स को लेकर लंबी चर्चा चली। अधिकतर लोगों का मानना है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद समाजवाद खत्म हो गया। पर कुछ लोग अब भी समाजवाद को प्रासंगिक मानते हैं, उनके मुताबिक बदली स्थितियों के अनुसार समाजवाद के औजारों को बदलने की जरूरत है। अरुण माहेश्वरी का भी यही तर्क है। उनकी किताब ‘समाजवाद की समस्याएं’ समाजवाद, खासकर मार्कवाद की प्रासंगिकता को लेकर चल रही बहसों में एक अलग हस्तक्षेप है।

वे कहते हैं- ‘पिछले सालों में जो सामने आया है, उससे समाजवाद की अपराजेयता के बारे में कम्युनिस्टों की अब तक की तमाम अवधारणाएं ही गलत साबित नहीं हुई हैं, इसने उन सारी परिस्थितियों को गुणात्मक रूप में बदल दिया है, जिनमें एक न्यायपूर्ण और समतापूर्ण समाज के निर्माण की लड़ाई को आगे जारी रखना है। पुराने सोच और पुराने औजारों के साथ अब शायद एक कदम भी आगे बढ़ना मुमकिन नहीं है। वे सहयोगी नहीं, पांव की बेड़ियां हैं।’ यह किताब समाजवाद और खासकर कम्युनिस्ट आंदोलनों को नए सिरे से देखने, समझने के अवसर उपलब्ध कराती और समय के मुताबिक उनमें आवश्यक बदलावों की तरफ संकेत भी करती चलती है।

समाजवाद की समस्याएं : अरुण माहेश्वरी; अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स (प्रा.) लिमिटेड, 4697/3, 21-ए, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 200 रुपए।

मैं हूं बबली- एक लड़की

‘मैं हूं बबली- एक लड़की’ के किरदार, उनका परिवेश, उनके द्वंद्व-अंतर्द्वंद्व उनकी बातचीत, उनका जीवन के प्रति दृष्टिकोण, जीवन के लिए जिजीविषा, दृश्य-परिदृश्य सभी कुछ अपना-सा लगता है। रचनाकार की सबसे बड़ी कुशलता यह होती है कि वह अपने किरदारों को अपना बना दे, उनके द्वंद्व आपको अपने द्वंद्व प्रतीत होने लगें, उनकी सफलता पाठक को स्वयं की सफलता के आनंद से भर दे। बबिता कोमल में वह क्षमता है, जो अपने भावशिल्प से अन्य को अनन्य बना देती है। वह अपनी इस रचना ‘मैं हूं बबली- एक लड़की’ में व्यक्ति में विश्व को और विश्व में व्यक्ति को बहुत सहजता से उपस्थित करती हैं।

स्त्री और पुरुष के लिए बराबर बनाई गई दुनिया में, स्त्री के अपने हिस्से में आई असमानता को समानता में बदलने का प्रयास करने वाली बबली और डबली, स्त्री के अस्तित्व की विलक्षणता, उसके सौंदर्य से भरी हुई हैं। रेगिस्तान की रेतीली माटी में पली-बढ़ी बबली यौवन के द्वार पर आकर परिस्थितिवश असम की हरियाली वादियों में पहुंच जाती है। स्वयं को हर रंग में सजा लेने वाली बबली यहां की अलग भाषा और संस्कृति में भी रच-बस जाती है और प्रेम कर बैठती है। सोच-विचार कर किया गया बबली का प्रेम भी मंजिल प्राप्त नहीं कर पाता, यही बबली की जीत भी है और हार भी। आम लड़की के जीवन में आए झंझावातों को बबिता कोमल ने बड़े कौशल के साथ रचा है। इस सरस, सरल साहित्य सरिता का प्रवाह प्रखर ही नहीं, प्रभावशाली भी है।

मैं हूं बबली- एक लड़की : बबिता कोमल, कौटिल्य बुक्स, एफ-5, हरि सदन, 20, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 299 रुपए।

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