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किताबें मिलीं: ‘उसी के नाम’ , ‘हाशिए पर उगते सूरज’ और ‘अहिंसा श्रम-दर्शन’

गांधीजी की समस्त वैचारिकी का आधार अस्तित्व मात्र के प्रति एकत्व का विचार है, जिसमें मम तथा ममेतर/ स्व और पर के बीच प्रेमपूर्ण और सृजनात्मक संबंध बनाना शामिल है।

Author May 27, 2018 4:46 AM
किताबें मिलीं: ‘उसी के नाम’ , ‘हाशिए पर उगते सूरज’ और ‘अहिंसा श्रम-दर्शन’

उसी के नाम

इस संग्रह की किसी भी गजल को एक लय या धारा में विभक्त नहीं किया जा सकता। अद्भुत विविधता है। उन्होंने जहां सामाजिक संस्कारों और अपने परिवेश के विविध चित्रों को शब्दों में उकेरा है वहीं प्रेम की उद्दात्त भावनाओं को नया रंग दिया है। इस सफर में उन्होंने व्यवस्था के नकारात्मक और सकारात्मक पहलुओं को भी पूरी गंभीरता से छुआ है। मानवीय संवेदना के जितने भी रूप हो सकते हैं, वे संग्रह में परिलक्षित होते हैं। जैसा कि उन्होंने अपने प्राक्कथन में कहा है कि विचारों और अभिव्यक्ति को साकार रूप देने को वे अपना दूसरा जन्म मानते हैं। इस दूसरे जन्म का धीरे-धीरे विस्तार होना और उसके माध्यम से गजल को एक नई पहचान देना निश्चित रूप से आलोक यादव की एक बड़ी उपलब्धि है।

‘उसी के नाम’ 2012 से 2015 के बीच लिखी गई गजलों का संग्रह भर नहीं है, बल्कि आलोक यादव की वैचारिक विस्तार का प्रमाण भी है। नौकरी की व्यस्तताओं और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अपनी रचनात्मकता और संवेदनशीलता को मरने नहीं दिया। इस संग्रह में ‘हमें दी ये किसने सदा धीरे धीरे’, ‘जवां हो रह है फजा धीरे धीरे’, ‘चले आओ जाने-अदा धीरे धीरे’ जैसी गजलों में प्रेम की विविध अनुभूतियां है। इन गजलों में प्रेम की टीस देने वाली यादों, प्रेमिका के सौंदर्य चित्रण, प्रेम की पवित्रता, यानी प्रेम के समग्र रूपों का अद्भुत चित्रण है। रिश्तों को भी गजलों के माध्यम से आलोक ने एक नया आयाम दिया है : ‘हमने होठों पे तबस्सुम को सजाए रक्खा/ दिल का हर जख्म इसी तरह छुपाए रक्खा/ बेखता होकर भी मांगी है मुआफी हमने/ अपने रिश्तों को इसी तरह बचाए रक्खा।’

संग्रह की गजलों में सामाजिक सरोकार भी हैं। लड़कियों की भ्रूण हत्या के विरोध में आलोक की एक टिप्पणी है- ‘बेटी जो घर में जनम ले तो गजल होती है/ दाई बांहों में रख दे तो गजल होती है/ नन्हे हाथों से पकड़ती है वो उंगली मेरी/ साथ मेरे जो चल दे तो गजल होती है।’

उसी के नाम : आलोक यादव; लोकभारती प्रकाशन, पहली मंजिल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद; 300 रुपए।

हाशिए पर उगते सूरज

इन रचनाओं से गुजरना एक सुखद एहसास है। ये मनुष्यता को सहेजने वाली उद्दात्त रचनाएं हैं, जो सहज ही दिल और आत्मा की गहराइयों में उतरती चली जाती हैं। इन दिनों जब हर तरफ लालसाओं की अंधी दौड़ चल रही है, कंधे से कंधा मिला कर नहीं, बल्कि छीलते हुए लोग, ज्यादा से ज्यादा बटोर लेने, समेट लेने की घमासान में शामिल हैं, तब दीप्ति इन सबसे अलग बड़े यत्नपूर्वक जीवन मूल्यों की संपदा सहेजने में लगी हैं और इसके लिए कहीं दूर न जाकर, वे आसपास के चरित्रों, घटनाओं और स्थितियों के बीच से जीवन सत्व के ‘मोती’ चुन कर उन्हें स्वांत: सुखाय शब्दों में पिरोती हैं। ये मोती कभी ‘लगन’ कहानी के पावस-केतकी के निस्वार्थ स्वकार्य की धवल आभा बिखेरते होते हैं, तो कभी अपनी क्यारी के फूलों को देवत्व प्रदान करने वाले ‘दोस्त’ कहानी के माली गुलाब सिंह के पास, या फिर ‘जीवट’ वाले बुधवीर की आंखों से झरते आंसुओं में या ‘अनबूझ रिश्ते’ के हरिया काका की ममता में, तो कभी ‘फरिश्ता’ के भोले मनस मधुकर के हाव-भाव और कर्तव्यनिष्ठता में, तो कभी दीन-दुखियों के मसीहा और फक्कड़ ‘तोषी’ के त्यागमय स्वभाव में दमकते दिखाई देते हैं। जीवन के शिवत्व और सुंदर को अपने अंदर समाहित करने वाले इन सामान्य चरित्रों में दीप्ति जीवन की सार्थकता पाती हैं। ऐसे दूसरों के लिए जिए जाने वाले जीवन के बड़े मार्मिक और जीवंत चित्र दीप्ति ने खींचे हैं।

घनी संवेदना और सुंदर भावों से भरपूर, लेखिका की कहानियां सहज ही दिल की गहराइयों में स्पर्श करती हैं यानी कुछ भी सप्रयास या कृत्रिम नहीं है इन रचनाओ में। सब कुछ सहज, निर्बाध, सुंदर और स्वाभाविक। विधाओं की सीमाओं से थोड़ी घूंट लेते हुए ये रचनाएं कहानी, संस्मरण और रेखाचित्रों का सम्मिश्रित रूप हैं। लेकिन शायद यही कारण है कि ये रचनाएं न कहीं अपने लक्ष्य से भटकी हैं, न ही उनका उद्देश्य ही बाधित हुआ है।

हाशिए पर उगते हुए सूरज : दीप्ति गुप्ता; अमन प्रकाशन, 104 ए/ 80 सी, रामबाग, कानपुर; 250 रुपए।

अहिंसा श्रम-दर्शन

गांधीजी की समस्त वैचारिकी का आधार अस्तित्व मात्र के प्रति एकत्व का विचार है, जिसमें मम तथा ममेतर/ स्व और पर के बीच प्रेमपूर्ण और सृजनात्मक संबंध बनाना शामिल है। इसलिए वे इसी आधार पर ऐसी मानवीय सभ्यता के लिए प्रयासरत थे, जो व्यवहार में इस लक्ष्य की प्राप्ति को संभव बना सके। शरीर-श्रम की अवधारणा में इसी संभावना को देखते हुए वे इसे नवीन समाज का आधार बनाते हैं। शरीर-श्रम का अर्थ ही है- अन्य का स्वीकार और उसकी गरिमा का सम्मान (एक शब्द में कहें तो समानुभूति) इसी बिंदु पर शरीर-श्रम भी सांस्कृतिक मूल्य हो जाता है और अहिंसक लक्ष्य की प्राप्ति का साधन भी।

उनके लिए श्रम-समस्या किसी एकांत या समाज के आर्थिक क्षेत्र से संबंधित अकेली समस्या नहीं है, बल्कि वह समस्त मानव जीवन के उद्देश्य और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया की भी समस्या है। श्रम-समस्या का समाधान औद्योगिक शांति, अहिंसक संघर्ष तो तात्कालिक रूप से अपन महत्त्व रखता ही है (और हर व्यवस्था को इसे प्राप्त करना भी चाहिए) बल्कि वह इस समस्या का स्थायी समाधान समस्त मानवीय आचरण और संस्थाओं को सत्यपूर्ण और अहिंसक बना कर करना चाहते हैं।

वे अपने समस्त विचारों में शरीर-श्रम को महत्ता प्रदान करते हुए उसे सामाजिक-आर्थिक-शैक्षिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का माध्यम बनाते हैं। उनके शरीर-श्रम के सिद्धांत की सबसे बड़ी विशेषता और महत्त्वपूर्ण देन है कि इसने श्रम को एक वर्ग-विशेष के चौखटे से बाहर निकाल कर आम समाज में दैनंदिन जीवन का अंग और विमर्श का विषय बना दिया। उनके अनुसार श्रमशील व्यक्तित्व और समाज ही समृद्धशील, शांतिपूर्ण और आनंददायक बन सकता है। पूंजीवाद की प्रौद्योगिकी का मूल निहितार्थ ही मानव-श्रम प्रतिस्थापन है और साम्यवाद भी पूंजीवादी आधारों पर ही श्रम-समस्या को हल करने का विफल प्रयास करता है। गांधीजी पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों ही संरचनाओं को नकारते हैं और एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में इस समस्या को हल करते हैं।

अहिंसक श्रम-दर्शन : शंभू जोशी; वाग्देवी प्रकाशन, विनायक शिकर, पॉलिटेक्नीक कॉलेज के पास, बीकानेर; 600 रुपए।

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