हम जो भी खाते हैं या जो भी सोचते हैं वह हमारे शरीर का हिस्सा है। मान लीजिए की आपने एक बर्गर खाया, लेकिन आपके शरीर के अंदर इसका क्या प्रभाव होगा यह आपको नहीं पता है। हालांकि, आप इतना जरूर जानते हैं कि यह शरीर के अंदर गया है तो अब ये शरीर का हिस्सा हो गया है। अब शरीर को जो भी जरूरत की चीजें हैं वह इस बर्गर से अपने अंदर अवशोषित कर लेगा। लेकिन जो जरूरत की चीजें नहीं होंगी, वह शरीर में ही कहीं न कहीं इकट्ठा हो जाएंगी, जिसे हम चर्बी के रूप में जानते हैं। आयुर्वेद में ऐसी चीजें को अम्लीय कहा गया है, अम्ल खाद्य पदार्थ शरीर के लिए जहर के समान होते हैं। यानी आप जो भी चीजें खाते हैं वह आपके शरीर का हिस्सा हो जाती हैं और शरीर अपने जरूरत के अनुसार उनमें से पोषक तत्वों को अवशोषित कर लेता है। लेकिन जो चीजें आपके शरीर के अनुसार अनुकूल नहीं हैं, उनका क्या प्रभाव होगा। असली बात यहीं से शुरू होती है, इस किताब में यही बताया गया है कि आपके शरीर को किन चीजों की जरूरत है। चाहे वह पेट के लिए हो या फिर दिमाग के लिए।
ऊपर वाले पैराग्राफ में तो आपने पेट के बारे में जाना अब मस्तिष्क की बात कर लेते हैं। जिस तरह शरीर को पोषक तत्वों की जरूरत होती है वैसे ही मस्तिष्क को अच्छे विचारों की जरूरत होती है और अच्छे विचारों का भी संबंध अच्छे खान-पान से जुड़ा हुआ है। आप इसे यूं समझें कि आपका मस्तिष्क एक खुला मैदान है, इसमें आप जो भी चीजें भरेंगे बदले में आपको वही चीजें मिलेंगी। अच्छा और बुरा क्या है, इस बारे में आपको अच्छे से पता है। अगर आप अच्छा सोचेंगे तो दिमाग तंदुरुस्त रहेगा और बुरा सोचेंगे तो वह अस्वस्थ होगा। यह सबसे सरल तरीका है समझाने का, फिर भी हम आपके आगे बताएंगे कि कैसे शरीर और मस्तिष्क दूषित होता है और इसे कैसे बचाया जाए।
इस किताब के लेखक ओम स्वामी हैं, जो एक आध्यात्मिक गुरु, संन्यासी और लेखक हैं। संन्यास लेने से पहले वे एक सफल बिजनेसमैन थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी सारी संपत्ति का त्याग करते हुए अध्यात्म के राह को चुना।
सनातन धर्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि हमारे पास योग और आयुर्वेद है, जिसमें स्वास्थ्य जीवन का पूरा कला समाहित है। आज हम आप जिन भौतिक जीवन की सुख-सुविधाओं में मशगूल हो गए हैं, असल वह जीवन नहीं है। लगभग हर व्यक्ति आज किसी न किसी रोग से ग्रसित है। इसका सबसे बड़ा कारण खान-पान और लाइफस्टाइल है। आइए जानते हैं किस तरह खान-पान, विचार और लाइफस्टाइल हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं।
शरीर का प्रकृति से जुड़ाव क्यों जरूरी है
इस किताब का मूल सिद्धांत खुद को पहचाना है। हम जो भी खाते हैं या जो भी सोचते हैं, वह हमारे शरीर का हिस्सा हो जाता है। किताब के लेखक ओम स्वामी बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही अस्थमा की समस्या थी। उनके पिता खूब भाग-दौड़ किए लेकिन हल उन्हें एक आयुर्वेदिक डॉक्टर ने बताया। आयुर्वेदिक डॉक्टर ने उन्हें एक लिस्ट दी जिसमें लिखा था कि किन चीजों के खाने से उन्हें परहेज करना है। वह जब भी उसके विपरीत गए उन्हें परेशानी हुई। लेकिन जब उन्होंने भौतिक जीवन का त्याग कर संन्यास का रास्ता अपनाया तो वह हिमाचल के घने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में गए, जहां उन्होंने करीब 9 महीने या इससे अधिक दिन तक ध्यान किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि उनकी अस्थमा की समस्या खत्म हो गई। वह बताते हैं कि हमारा शरीर प्रकृति के पांच तत्वों से ही बना है, जब हम इसे प्रकृति से मिला देते हैं तो यह उनके साथ मेलजोल करने लग जाती है और तमाम शारीरिक समस्याओं से छुटकारा मिलने लगता है। आज के आधुनिक युग में लोग प्रकृति से काफी दूर हैं। न तो साफ हवा में सांस ले रहे हैं, न ही साफ पानी पी रहे हैं और न ही स्वस्थ भोजन कर रहे हैं। जिस चीज से यह ब्राह्मंण बना है उसी से हमारा शरीर है। इसलिए प्रकृति के साथ शरीर का तालमेल बैठाना जरूरी है। जब आप खुद को प्रकृति के साथ जोड़ेंगे तो इसका अनुभव खुद करेंगे और यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।
पांच तत्व और सात धातु
हमारा शरीर पांच महान तत्व और सात धातु से बना है। पांच तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। सात धातु रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शक्र हैं। इनका संतुलन जितना बेहतर होगा आप उतने ही स्वस्थ होंगे। जितने भी रोग हैं या फिर विकार हैं ये सब इन्हीं के बिगड़ने पर होते हैं। इसलिए इतना संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। हमारे पूर्वजों को इसकी जानकारी बेहतर तरीके थी, इसलिए वह खान-पान, शारीरिक गतिविधि और मौसम का विशेष ध्यान रखते थे, जिसके चलते वह लंबे समय तक एक स्वस्थ और बेहतर जीवन जीते थे।
तीन शारीरिक दोष
आयुर्वेद सबसे अधिक जोर तीन शारीरिक दोषों पर देता है, जो- वात, पित्त और कफ हैं। आयुर्वेद कहता है कि अगर इन्हें संतुलित रखा जाए तो मनुष्य गंभीर से गंभीर बीमारियों से दूर रह सकता है। अगर यह तीनों दोष संतुलित रहते हैं तो न तो आप मौसम बदलने के दौरान बीमार होंगे और न ही कोई गंभीर बीमारी आपको छू पाएगी। लेकिन इसके यह जानना जरूरी है कि आपके शरीर में इन तीन दोषों में से किसका प्रभाव सबसे अधिक है। इसके लिए आप अपने खान-पान, समस्याओं और गतिविधियों के जरिए काफी हद तक पहचान कर सकते हैं।
भोजन
ओम स्वामी अपनी किताब में लिखते हैं कि हम वही हैं, जो हम खाते हैं। यह बिल्कुल सच है। आप जो भी खाते हैं वह आपके शरीर में मिल जाता है। पेट उन्हें पचाता है और उसके बाद उसमें से पोषक तत्वों को तोड़ने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जो शरीर के अलग-अलग अंगों में जा मिलते हैं। इसलिए पौष्टिक भोजन करना बेहद जरूरी है। इस किताब में भोजन के तीन प्रकार तय किए हैं- सात्विक, राजसिक और तामसिक। आपका भोजन जितना सात्विक होगा उतना ही शरीर के स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा। जितना राजसिक और तामसिक होगा उतना ही शरीर के लिए कष्टदायक होगा। यही बात आयुर्वेद भी कहता है।
असली दवा भोजन कैसे
अगर किसी को सिरदर्द, पेट दर्द या अन्य कोई समस्या होती है तो वह दवा खा लेता है। लेकिन आयुर्वेद में इसे इलाज नहीं बल्कि लक्षण बताया गया है। किसी भी बीमारी का जड़ से इलाज करना जरूरी है। अगर आपको लगता है कि किसी बीमारी का इलाज दवा है, तो जरा ठहरिए। क्योंकि, असल में दवा आपका भोजन ही है। अगर आप अपने शरीर के अनुसार भोजन करते हैं तो दवा तक पहुंचने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। हमारे शरीर के अंदर 6 स्वाद और भोजन के चार चरण होते हैं। स्वस्थ रहने के लिए इन दोनों को समझना बेहद जरूरी है। जिस दिन आप इन्हें समझ जाएंगे, उस दिन आपको यह पता चलेगा कि किसी भी रोग का इलाज दवा नहीं बल्कि भोजन है।
खाने की समझ
मान लीजिए कि आपको ऑफिस के लिए लेट हो रहा है और आपने नाश्ता मिनटों में खत्म कर लिया। लंच के समय भी आप फटाफट भोजन करके वापस अपने काम पर लौट गए और रात का खाना भी मोबाइल, टीवी देखते हुए या फिर बात करते हुए खत्म करते हैं। लेकिन क्या आपको लगता है कि यह तरीका सही है। अगर आपको लगता है कि यह सही है तो आप सौ प्रतिशत गलत हैं। आपके असली स्वास्थ्य का राज आपके खाने के तरीके में छिपा हुआ है। इसे इस प्रकार समझें:
कुत्ता: जब आप कुत्ते को भोजन करते हुए देखेंगे तो वह बहुत जल्दबाजी में होता है, उसे डर होता है कि कहीं कोई उसका भोजन छीन न लें। वह सारी दिशाओं में देखते हुए फटाफट अपना भोजन खत्म कर देता है।
शेर: शिकार करने के बाद एक शेर बड़े चाव से अपने भोजन को खाता है। उसे किसी का डर नहीं होता है कि कोई उसका भोजन छीनेगा। वह आराम से स्वाद के साथ खाता है।
गाय: गाय को खाते वक्त ध्यान देंगे तो पाएंगे कि वह अपने भोजन को काफी धीरे खाती है।
इस किताब में इसी खाने की समझ के बारे में बताया गया है। ओम स्वामी के अनुसार हमारा शरीर जल्दी और देर से खाने के लिए नहीं बना है। मनुष्य को अपने भोजन को शेर की तरह आराम से और चाव से खाना चाहिए। दरअसल, जब हम स्वाद के साथ अच्छी भावना से भोजन करते हैं तो यह हमारे शरीर के साथ एक अलग ही सकारात्मक तालमेल बैठाती है। स्वस्थ शरीर के लिए आनंद के साथ बिना किसी हीनभाव के भोजन करना बेहद जरूरी है।
क्या खाएं
सबसे जरूरी बात यह है कि हम क्या खाएं। हममें से अधिकतर लोगों को यह पता ही नहीं होता है कि हम जो खा रहे हैं क्या वह हमारे शरीर के लिए सही है या उसका क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा। अगर हमें यह ज्ञात हो जाए कि हमारे शरीर को सबसे अधिक किस भोजन की जरूरत हो तो हम शायद आजीवन स्वस्थ रह सकते हैं। हमारे शरीर को जितना क्षारीय भोजन मिलेगा आप उतना स्वस्थ रहेंगे और जितना अम्लीय भोजन करेंगे उतनी बीमारियों से जूझते रहेंगे।
अधिकतर बीमारियों का जन्म पेट से होता है। इसके बाद बची बीमारियां का जड़ मस्तिष्क होता है। डर, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या और लालच ये सारे विकार हैं। आज का मनुष्य इन्हीं सारे विकारों से घिरा हुआ है। जितना जरूरी पेट के लिए अच्छे भोजन की जरूरत है उतना ही मस्तिष्क के लिए अच्छे विचारों की जरूरत है। आप जितना नकारात्मक चीजों के बारे में सोचेंगे उतना ही उलझते चले जाएं।
मन बेकाबू क्यों होता है
ओम स्वामी कहते हैं कि आज जो भी जीवन हम जी रहे हैं वह प्रकृति के द्वारा नहीं बल्कि उसे हमने खुद बनाया है। जितने भी विकास हुए हैं, उसे मानव जाति ने ही बनाया है। उनका कहना है कि अगर दफ्तर में किसी चीज को लेकर आपका दिमाग उलझता है तो हम सोचते हैं कि हमारे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है, अधिक सोचने पर हम उसमें उलझते चले जाते हैं। लेकिन इसे प्रकृति ने नहीं बल्कि हमने खुद बनाया है। इसलिए हमारे मस्तिष्क की भी एक सीमा है, उसे सिर्फ प्रकृति के अनुसार चलने की जानकारी है अन्य की नहीं है। जब मस्तिष्क में विकार पैदा होते हैं तो शरीर के अंदर कई सारी समस्याएं पैदा होती हैं। इससे बचने के सबसे बेहतर उपाय है सकारात्मक सोच और अच्छा आहार। जितना सकारात्मक सोच रखें और अच्छा भोजन करेंगे उतना ही मन और शरीर स्वस्थ होगा।
शरीर और मन को शुद्ध कैसे करें
हमारे पास अगर सबसे बड़ा कोई चमत्कार है तो वह है आयुर्वेद और योग। इन दोनों को अगर जीवन में अमल कर लिया जाए तो आजीवन एक स्वस्थ जीवन जीया जा सकता है। आयुर्वेद में बताया गया है कि आप अपने शरीर को किस तरह शुद्ध कर सकते हैं। इस किताब में शरीर को शुद्ध करने के कई तरीके बताए गए हैं, साथ ही मानसिक शुद्धि की भी गहन जानकारी साझा की गई है।
किसे पढ़ना चाहिए यह किताब
मेरे अनुसार तो इस पृथ्वी पर जितने भी मनुष्य सांस ले रहे हैं उन्हें अपने जीवन में एक बार इस किताब को जरूर पढ़ना चाहिए। आपको जीवन जीने की कला के बारे में पता चलेगा। यह जानकारी मिलेगी कि शरीर को कौन सा आहार देना है और कौन सा नहीं। मस्तिष्क को किस तरह स्वस्थ रखना है। शरीर को शुद्ध कैसे करें। शुरुआत में भले ही यह किताब आपको ऊबाऊ लगे लेकिन अंत तक आते-आते आप इतना जरूर सीख जाएंगे कि आपको क्या खाना है और कैसी सोच रखनी है। अब तक आपने जो भी खाया या सोचा उसे अपने शरीर से पूरी तरह खत्म कैसे करना है। क्योंकि इस किताब के अंत में आपको खुद को शुद्ध करने के चमत्कारिक तरीके के बारे में पता चलता है।
किताब का नाम: स्वास्थ्य सिद्धि
लेखक: ओम स्वामी
हिंदी अनुवाद: अनुश्रि सिन्हा
पब्लिकेशन: मंजुल
किताब का मूल्य: 299
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“जब बाहर जाना संभव न हो, तो भीतर जाना सबसे अच्छा है।” लोग खुशी, शांति और संतोष को बाहरी चीजों में खोजते हैं, जबकि समाधान हमारे शरीर के भीतर है। जब आप गहराई से भीतर की ओर जाते हैं तो आपको सारे सवालों के जवाब मिलने लगते हैं। आत्ममंथन के जरिए व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को बेहतर ढंग से समझ सकता है और सही निर्णय ले सकता है। यहां क्लिक कर पढ़ें किताब समीक्षा
