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पुस्तक समीक्षा: उदय एक भारतीय जेम्स बांड का

लेखक और वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारद्वाज के सद्य प्रकाशित उपन्यास ‘मेरे बाद…’ के नायक अभिमन्यु का जलवा तो जेम्‍स बांड जैसा ही है, लेक‍िन उसके तौर-तरीके बांड से जुदा हैं।

Book Review, Mukesh Bharadwaj
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारद्वाज के हाल ही में प्रकाशित उपन्यास 'मेरे बाद' का आवरण पेज।

भारतीय जेम्स बांड का जन्म हो गया है। आप बेशक ‘007 जेम्स बांड’ के प्रशंसक रहे हों जो तेज गाड़ियां चलाता है। अपनी पिस्तौल से दुश्मनों पर धड़ाधड़ गोलियां दागता है। एक के बाद एक सुंदर महिलाओं पर फिदा होता है। जाने कितनी लड़कियां उसकी दीवानी हैं। मगर हमारा भारतीय जेम्स बांड भी कोई कम नहीं। वह गोली की रफ्तार से अपना काम करता है। वह भी तेज गाड़ियां चलाता है, मगर किसी को टक्कर नहीं मारता। देखते ही देखते वह अपनी मंजिल पर पहुंच जाता है। सबसे बड़ी बात कि वह जेम्स की तरह धांय-धांय गोलियां नहीं मारता। वह अपने शब्द वाण से विरोधी पक्ष को परास्त करता है। वह कानून की बारीक जानकारियां भी रखता है।  

इस देसी जेम्स बांड की सबसे खास बात उसका ‘कोसोनोवा चार्म’ है। यानी वह एक के बाद एक कई महिलाओं पर फिदा होता है। लेकिन वह इटालियन प्लेब्वॉय भी नहीं हैं जो 120 महिलाओं के साथ हमबिस्तर होता हो। उसके लिए एक माया ही काफी है जिसके पहलू में वह हर रात गुजारना चाहता है। वह दिलफेंक है, फिर भी महिलाएं बुरा नहीं मानतीं। दुश्मन के खेमे की सुंदर युवती भी उसे गले लगाने या एक गहरा चुंबन देने से गुरेज नहीं करती। यही जादू है और यही जलवा है हमारे देसी बांड में। यही है उसका ‘कोसोनोवा चार्म’।

कौन है यह देसी जेम्स बांड? हम बात कर कर रहे हैं लेखक और वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारद्वाज के सद्य प्रकाशित और चर्चित उपन्यास ‘मेरे बाद…’  के प्रमुख पात्र अभिमन्यु की, जो नोएडा के सेक्टर 44 में 74 साल के बुजुर्गवार किशोर वशिष्ठ की आत्महत्या की गुत्थी सुलझाने निकला है। एक ऐसा युवा जासूस जो अपने तर्कों से पुलिस और कानून को इस बात के लिए मजबूर कर देता है कि बुजुर्ग ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि अंत समय में उसका इरादा बदल गया था। संभवत: किसी और ने जान ले ली।

इस गुत्थी को सलझाने में उसकी दोस्त और पुलिस अधिकारी सबीना सहर मदद जरूर करती है, मगर अभिमन्यु उपन्यास के अंतिम पन्ने तक पीछा करता है। कौन है वो कातिल? यह कौतुहल अंत तक बनी रहती है। लिहाजा पाठक एक के बाद एक अध्याय पढ़ता चला जाता है। ठीक वैसे ही जैसे जेम्स बांड की फिल्म सामने चल रही हो। जाहिर है यहां सुरा भी है और सुंदरियां भी।

कासानोवा चार्म का मालिक अभिमन्यु जरूरत से ज्यादा रसिक है। हर खूबसूरत लड़की उसे लुभाती है। चाहे वह पुलिस अफसर सबीना हो या उसके दफ्तर की सहयोगी कली। वैसे जरूरी नहीं कि हर जासूस के लिए स्त्रियां कमजोरी हों, लेकिन वह अभिमन्यु जैसा इंडियन जेम्स बांड हो तो यह निहायत जरूरी हो जाता है। अभिमन्यु ऐसा किरदार है जिससे विरोधी पक्ष की खूबसूरत बाला भी आलिंगनबद्ध होने के लिए आतुर है।

…मैं उसके सामने खड़ा हो गया। उसने पीछे हटने की कोशिश नहीं की। कुछ ही पलों में वो मेरी बांहों में थी और हमारे होठ एक-दूसरे के हो चुके थे। लेकिन पांच सेकंड से भी कम समय में उसने मुझे खुद से परे किया। मैं हांफ रहा था। वो हंसी। ‘बस हांफ गए। मुझे लग रहा था कि तुम्हारा स्टेमिना इतना ही होगा’ उसने तंज कसा। मैंने उस पर झपटने की कोशिश की। उसने मुझे बीच में ही रोक लिया। ‘बस करो बच्चे। दुनिया आज ही खत्म नहीं होने वाली है। यह इतना आसान नहीं जितना तुम समझ रहे हो।’ यह कह कर वह दरवाजे की ओर बढ़ गई। मैं पीछे। (पृष्ठ 168)

‘ऐसे ही चली जाओगी?’ मैंने व्यग्र होकर पूछा। ‘आज ऐसे ही। चिंता मत करो यहां तक पहुंचे हो।’ कह कर उसने मेरे होठों का भरपूर चुंबन लिया और फिर अलग होकर बोली, ‘तो फिर एक न एक दिन मंजिल पर पहुंच जाओगे।’ आमीन मैंने दोनों हाथ उठा कर दुआ की। (पृष्ठ 242)  

इरा नाम की यह पात्र उसका ही जाने-अनजाने इस्तेमाल कर रही थी, जिसका राजफाश बाद में होता है तो अभिमन्यु के लिए माथा पीटने के सिवाय कुछ नहीं रह जाता। हालांकि इरा थी ही ऐसी, जिसका चित्रण लेखक ने इस तरह किया है- जिंदगी के पैंतीस बरस पूरी कर चुकी थी। लेकिन वह खुद ही अपने 26 से एक दिन भी ऊपर न होने की शर्त लगा सकती थी। जिसे उसके परिवार का पता न हो उससे अगर कह दे कि बारह वर्ष और दस वर्ष के दो बच्चों की मां है तो वह ठौर आत्महत्या कर लेगा। … लेखक ने उसे एक यूनानी सुंदरी की तरह पेश किया है। उसकी आंखों के आगे लटकती घुंघराली लटों पर यह जासूस फिदा है। उस पर शायरी करने से भी वह नहीं चूकता।

अभिमन्यु जेम्स बांड की तरह तमाम विदेशी शराब का शौकीन है। वही नहींं, उपन्यास के कई पात्र बातों-बातों में शराब इस तरह पीते हैं जैसे हम घर-दफ्तर में चाय पीते हैं। यूं अभिमन्यु भी कम नहीं। वह भी खूब पीता है। मगर अच्छी बात ये है कि वह चाय का भी उतना ही बड़ा रसिया है। वह अकसर उसे चाय देने वाले के प्रति कृतज्ञ हो जाता है। यहां तक कि अपनी खास और बेहद खास दोस्त माया के साथ शराब और शबाब के कई दौर के बाद भी चाय उसे तलब लगती है। वह अभिसार की खुमारी भी कॉफी या चाय से ही उतारता है। एक प्रसंग यहां उल्लेखनीय है-

उसने उसी पोजीशन में रहते हुए हाथ बढ़ा कर गिलास उठाया। उसका एक बड़ा घूंट भरा और फिर वही गिलास मेरे मुंह को भी लगा दिया। जन्नत का नजारा हो गया था। मेरी बांह उसके जिस्म का पूरा चक्कर काट कर उसे अपने करीब ले आई। अचानक मैंने कहा, ‘एक-एक चाय हो जाए?’ ‘डैम यू अभि। यह तो मेरी सौतन ही हो गई है। जाओ बना लाओ। तुम मानोगे नहीं।’ उसने कहा।

जिंदगी में इश्क के अलावा मुझे कोई दूसरी अलामत थी तो वह चाय ही थी। गाढ़े दूध में तेज पत्ती और अदरक से महकती हाई कैलोरी चाय। पंजाबी में जिसे कहते हैं, ‘दूध पत्ती ठोक के, मिट्ठा हत्थ रोक के।’ तो अंजाम-ए-इश्क यानी बिस्तर की बात चाय के बिना कैसे पूरी हो सकती थी!

हमारे जाम अभी बाकी थे। रात के डेढ़ बजे चाय का मतलब था कि यह दौर सुबह चार बजे तक खिंचेगा। जब तक मैं चाय लेकर आया, माया नींद के झोंके में थी। वह पीठ के बल लेटी हुई थी। माया उम्र में मुझसे बड़ी थी। एक पति और एक आशिक को पहले झेल चुकी थी। लेकिन कुदरत की उस पर ऐसी मेहरबानी थी कि वह खूबसूरती से मालामाल थी। सच में क्या कहर थी! ऐसे लग रहा था जैसे दूधिया संगमरमर की कोई प्रतिमा उलटी पड़ी हो!

लेखक मुकेश भारद्वाज का उपन्यास ‘मेरे बाद…’ के अभिमन्यु से मिलने के बाद जेम्स बांड को रिटायर हो जाना चाहिए। वहीं शरलॉक होम्स और हरक्यूल पायरोट को अपनी पेंशन की जुगाड़ में लग जाना चहिए। और व्योमकेश बख्शी भी जैसे-तैसे अपना गुजारा कर ही लेंगे। 

खाकी वर्दी के नीचे उसकी कमीनगी को उघाड़ रहे पंजाब के इस नौजवान जासूस का शर्तिया एलान है कि यह बूढ़े हो गए नायकों की विदाई का समय है। चाय की चुस्कियों के साथ या एकाध पेग मारते हुए हमें भी यह मान लेना चाहिए कि हिंदी साहित्य को एक नया जासूस मिल गया है। 

अभिमन्यु का सरल हास्य बोध, उसकी सहजता और बेबाकी के पाठक कायल न हों, ऐसा हो नहीं सकता। वह हर किसी से तपाक से मिलता है। लड़कियों को फ्लर्ट करता है, कई बार यह उसके पेशे का हिस्सा होता है, तो कई बार वह जानबूझ कर ऐसा करता है। वह आदत से मजबूर जो ठहरा। मगर है दिल का साफ।

उपन्यास  मेरे बाद… वस्तुत: अपराध साहित्य है। जी, इसे मैं साहित्य कहूंगा क्योंकि जीवन के सत्य को उद्घाटित करना ही साहित्य का उद्देश्य है। बल्कि इसे मानवशास्त्र का हिस्सा भी माना जा सकता है। दूसरी ओर यह एक ऐसा ‘क्राइम फिक्शन’ जो आपको बेचैन कर देता है। 

यह एक फिल्म की तरह आपकी आंखों के सामने चलता रहता है। कुछ दृश्य स्मृतियों में दर्ज हो जाते हैं। कुछ संवाद याद रह जाते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह उपन्यास की भाषा शैली है। लेखक खुद एक संपादक हैं जो आम जन की भाषा को साथ लेकर चलने के पक्षधर हैं। यह उनके लेखन में दिखता है। छोटे-छोटे वाक्य। सहज-सरल शब्दों का प्रयोग। अलबत्ता पात्रों के अनुकूल अंग्रेजी वाक्यों का भी उन्होंने भरपूर प्रयोग किया है। वहीं उर्दू के शब्दों के साथ उनकी गंगा-जमुनी भाषा पाठकों का आद्योपांत रसास्वादन कराती रहती है। उसकी बोधगम्यता दूर तक ले जाती है। 

पाठक इस उपन्यास को धारा प्रवाह गति से पढ़ सकते हैं। कातिल को पकड़ने के लिए आप उसके साथ अंत समय तक पीछा कर सकते हैं। अभिमन्यु के साथ आपका दिमाग भी दौड़ता रहता है-कातिल है कौन?

आखिर बुजुर्गवार किशोर वशिष्ठ का हत्यारा कौन है? बेटा प्रबोध, बेटी गुलमोहर या बहू इरा? या दामाद राहुल या कि बुजुर्ग की देखभाल करने वाली और उसकी हमबिस्तर रही रागिनी रहेजा? बुजुर्ग के बेड पर पड़े रूबिक्स क्यूब का क्या था राज। उसके रंग एकसार कैसे थे। यह कैसे संभव था कि मौत की घड़ी में भी वह अपने क्यूब को साल्व कर के मरा। 

बेहद ही रहस्य और रोमांच से भरा है यह मामला। आप यह जान कर हैरान हो जाएंगे। फिर कौन है कातिल, यह जानने के लिए आपको 272 पन्नों से होकर गुजरना होगा। इसे पढ़ कर पाठक इस उपन्यासकार को एक मील लंबा धन्यवाद जरूर देना चाहेंगे। और उनके अगले उपन्यास का इंतजार करेंगे।
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लेखक-मुकेश भारद्वाज
उपन्यास- मेरे बाद…
यश प्रकाशन
मूल्य- 299 रुपए

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