दूर से देखने पर दुनिया अक्सर उतनी ही साफ दिखाई देती है, जितनी किसी खिड़की से दिखता हुआ शहर। आपको नजर आएंगी कुछ रोशनियां, कुछ परछाइयां और कुछ अधूरी तस्वीरें। मीडिया का काम उसी दूरी को मिटाना होता है। उसका काम सिर्फ यह बताना नहीं है कि क्या हुआ, बल्कि उस घटना के पीछे छिपे सच तक पहुंचना, सवाल पूछना, आवाजों को सुनना और तस्वीर के उन हिस्सों को सामने लाना, जो अक्सर दिखाई नहीं देते। बयान से आगे जाकर तथ्य तलाशना, कमजोर की आवाज को जगह देना और समाज के सामने आईना रख देना। मीडिया का काम किसी के पक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि तथ्यों के पक्ष में खड़ा होना है। हालांकि, यह काम इतना भी आसान नहीं होता। जिस टीवी चैनल, वेबसाइट या अखबार पर आप कुछ पंक्तियों की एक छोटी सी खबर पढ़ते हैं, उसके पीछे कई घंटों की मेहनत, भागदौड़ और पड़ताल छिपी होती है। आपके शहर, राज्य या देश में क्या हो रहा है उसकी जानकारी रिपोर्टरों के जरिए ही आप तक पहुंचती है। जिन पक्तियों को पाठक कुछ ही सेकंड में पढ़कर आगे बढ़ जाता है, उन पंक्तियों तक पहुंचने के लिए रिपोर्टर को घंटों इंतजार करना पड़ता है, धूप-बारिश में घटनास्थल तक जाना पड़ता है, अनगिनत फोन करने पड़ते हैं, लोगों से सवाल पूछने पड़ते हैं और बयानों के बीच छिपे सच को तलाशना पड़ता है। यह कहानी भी ऐसे ही एक रिपोर्रट की है।
किताब का नाम है एन्काउंटर @ लक्ष्मणपुर टाइम्स, जिसके लेखक पत्रकार अवतंस चित्रांश हैं। यह किताब सच्ची घटना पर आधारित है, जिसकी कहानी लखनऊ शहर की सियासत और मीडिया के ताने-बाने पर आधारित है। इस कहानी के नायक परितोष शर्मा हैं, जो एक तेज-तर्रार क्राइम रिपोर्टिंग के महारथी हैं। सूबे में सुबह के वक्त हर किसी को इंतजार रहता है कि परितोष शर्मा ने आज क्या खबर लिखी है। परितोश शर्मा की क्राइम रिपोर्टिंग में जबरदस्त पकड़ होती है। अब जाहिर है क्राइम रिपोर्टर हैं तो पुलिस के साथ तालमेल तो रखना पड़ेगा। लेकिन पुलिसिया सिस्टम के बीच परितोष ने ऐसा तालमेल बिठा रखा है कि हर क्राइम की खबर सबसे पहले उन तक ही पहुंचती है। सिर्फ पुलिस नहीं बल्कि शहर के बड़े रसूखदार, नेता और छात्रों के बीच गहरी पकड़ होती है। लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में सक्रिय पत्रकार परितोष की जिंदगी में एक महिला रिपोर्टर की होती है, जिनका नाम है गीतांजली चौधरी। छात्रों, नेताओं, पुलिस और आम जनता की तरह गितंजली भी परितोष की रिपोर्टिंग की कायल होती हैं।
रिपोर्टर और पुलिस के बीच तालमेल
रिपोर्टर की पुलिस से और पुलिस से रिपोर्टर की तालमेल बनी रहती है। यह जनता के लिए जरूरी है, क्योंकि खबर पहुंचाने का काम पत्रकारों का है और क्राइम पर अपडेट देने का काम पुलिस का है, ऐसे में दोनों को साथ में तालमेल बिठाना जरूरी होता है। वहीं, एक रिपोर्टर के लिए सबसे जरूरी होता है नेटवर्किंग बनाना। जिसकी नेटवर्किंग जितनी बेहतर होगी खबरें उसके पास उतनी ही जल्दी और अच्छी पहुंचेगी और परितोष की जान-पहचान का दायरा काफी व्यापक था। लेकिन वह एक आदर्शवादी पत्रकार होते हैं, जिसे सिर्फ तत्थ और सच से मतलब होता है। परितोष को पत्रकारिता की महारत अपने गुरु और लक्ष्मणपुर टाइम्स न्यूज पेपर के संपादक अनामी प्रसाद से मिली। उनका सूत्र वाक्य है, ‘पत्रकार सवालों से फाड़ देता है, ताकत का हाल खुदा जाने’ और परितोष की सबसे बड़ी ताकत ही सवाल करना होता है। उनका यही सवाल लखनऊ के नए एसएसपी विक्रमजीत सिंह को विचलित कर देता है। लखनऊ के एक डबल मर्डर केस की जिम्मेदारी जिले के नए एसएसपी विक्रमजीत सिंह के हाथों में होती है और जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनकी मुलाकात परितोष से होती है। इस दौरान परितोष के सवालों की बौछार और एसएसपी विक्रमजीत सिंह के जवाबों का सिलसिला ईगो तक पहुंच जाता है।
कलम की असली ताकत
इसके बाद शुरू होती है कलम की असली ताकत और सिस्टम से तकरार के अंजाम की। पत्रकार की कलम जब चलती है तो अच्छे-अच्छों की हलक सूख जाती है। अपनी कलम के दम पर वह पूरे सिस्टम को हिला सकता है। इस कहानी में हुआ भी कुछ ऐसी ही। वह पूरे राज्य को हिला देता है। हाल यह होता है कि राज्य के गृह मंत्री तक पुलिस को फटकार लगाते हैं। लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए परितोष जो तिकड़म लगाते हैं, अंत में वही उनके गले की फांस बन जाती है। एक माफिया के शहर में होने की जानकारी लेने के लिए वह दूसरे माफिया का सहारा लेते हैं। इसमें एक व्यक्ति की मौत हो जाती है, इसके बाद परितोष की जिंदगी लगातार उलझती जाती है। परितोष अपनी कलम के दम पर एसएसपी से लेकर तेज-तर्रार इंस्पेक्टर प्रदीप सिंह तक का तबादला करवा देते हैं। लेकिन ये कड़ी जितनी दूर जाती दिखाई देती है, उतनी ही परितोष के करीब भी आती जाती है।
पत्रकार और छात्र नेता
परितोष लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र थे, लेकिन छात्र जीवन अब भी उनके अंदर से खत्म नहीं हुआ। लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में उनकी गहरी पकड़ होती है। कॉलेज के चुनाव में वह अपने दोस्त त्रिलोचन यादव को जीतता हुआ देखना चाहते हैं, जिसके लिए वह सारे दाव-पेंच चल देते हैं। इसी बीच उनकी टीम में सुशील नाम के माफिया की भी एंट्री होती है, जो उनके गले की फांस बन जाता है लेकिन उन्हें पता नहीं चलता। परितोष दफ्तर में एक पत्रकार होते हैं और ऑफिस के बाहर में उनकी एक अलग दुनिया है।
माफिया की कड़ी
सुशील भले ही माफिया था लेकिन परितोष के दिल में उसके लिए हमदर्दी होती है। वह परितोष को बिहार के एक बड़े माफिया से मिलवाने की बात करता है, जिसका हाथ उत्तर प्रदेश के कई अपराधों में लिप्त होता है और पुलिस को उसकी तलाश लंबे समय से होती है। उधर एसएसपी विक्रमजीत सिंह का ट्रांसफर यूपी के एसटीएफ में हो जाता है और उनकी टीम में अब प्रदीप सिंह भी शामिल हो जाते हैं। दोनों सुशील और राजू यादव नाम के माफिया पर नजर बनाए होते हैं। इस दौरान पता चलता है कि इनकी मुलाकात लखनऊ में बिहार के माफिया से होने वाली है, इसके बाद एनकाउंटर की स्क्रीप्ट लिखी जाती है। लेकिन इस एनकाउंटर में सूबे के तेज-तर्रार रिपोर्टर परितोष शर्मा की भी मौत हो जाती है।
एन्काउंटर @ लक्ष्मणपुर टाइम्स एक ऐसे रिपोर्टर की कहानी है जिसके इर्द-गिर्द न्यूजरूम, क्राइम पत्रकारिता, सत्ता, पुलिस और मीडिया की दुनिया आपस में टकराती हैं। यह कहानी सिर्फ एक पत्रकार के संघर्ष की नहीं, बल्कि खबर, सच और सत्ता के बीच लगातार खिंचती उस महीने रेखा की भी है, जिसे पार करने की कीमत कभी-कभी बहुत भारी पड़ती है।
लेखक: अवतंस चित्रांश
किताब का नाम: एन्काउंटर @ लक्ष्मणपुर टाइम्स
मूल्य: 399 रुपये
प्रकाशन: मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल
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