भगवद गीता हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। यह महाकाव्य महाभारत का एक हिस्सा है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। गीता का उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में युद्धक्षेत्र में दिया था। जब अर्जुन अपने ही सगे-संबंधियों और गुरुओं के खिलाफ युद्ध करने को लेकर भ्रम और मोह में पड़ गए थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें धर्म, कर्म और जीवन के वास्तविक उद्देश्य का बोध कराया। गीता मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठा और ईमानदारी से करना सिखाती है, लेकिन कर्म के फल की चिंता किए बिना ही। यह सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि जीवन प्रबंधन और आत्मिक विकास का मार्गदर्शक मानी जाती है। गीता के उपदेश व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने, मानसिक संतुलन बनाए रखने और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देते हैं।
भगवद गीता: लाइट ऑफ डिवाइन विजडम
वृंदावन के प्रसिद्ध भागवत कथावाचक, आध्यात्मिक वक्ता और वैष्णव आचार्य पुंडरीक गोस्वामी ने एक किताब लिखी है, जिसका नाम ‘भगवद गीता: लाइट ऑफ डिवाइन विजडम’ है। इस किताब को उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान दूसरे चरण के लॉकडाउन में लिखा था। इस दौरान उन्होंने 18 दिनों तक भगवद गीता के अठारह अध्यायों को ध्यान से पढ़ा, जिसके बाद उन्हें एक विशेष व्याख्या प्राप्त हुई और इसी को उन्होंने अपनी इस किताब में साझा किया है।
आचार्य पुंडरीक गोस्वामी का कहना है कि, ईश्वर का एक रूप ‘ब्रह्मनाद’ है, यानी दिव्य ध्वनि। जब शब्द आत्मा की गहराइयों से निकलते हैं, तो वे शाश्वत (अमर) हो जाते हैं। श्री व्याज देव ने वेदों को लिखित रूप दिया, जो पहले मौखिक रूप से सुनाए जाते थे। उन्होंने श्री कृष्ण के दिव्य और अमर वचनों को भी आध्यात्मिक ग्रंथों में शामिल किया।
बाहर नहीं भीतर से समझना जरूरी
पुंडरीक गोस्वामी कहते हैं कि “जब बाहर जाना संभव न हो, तो भीतर जाना सबसे अच्छा है।” लोग खुशी, शांति और संतोष को बाहरी चीजों में खोजते हैं, जबकि समाधान हमारे शरीर के भीतर है। जब आप गहराई से भीतर की ओर जाते हैं तो आपको सारे सवालों के जवाब मिलने लगते हैं। आत्ममंथन के जरिए व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य को बेहतर ढंग से समझ सकता है और सही निर्णय ले सकता है। योग में इसके बारे में विस्तार से बताया गया है कि, किस तरह भीतर से खुद को समझा जा सकता है। योग और मेडिटेशन के जरिए यह सारी चीजें संभव हो सकती हैं।
पुंडरीक गोस्वामी ने भगवद गीता के प्रत्येक अध्याय के गहरे रहस्यों को समझा और इस पवित्र ग्रंथ का एक अनोखा, व्यावहारिक और सरल विश्लेषण किया है, जो आपके थके हुए और परेशान मन को राहत दे सकता है। भगवद गीता आपके हर एक सवालों का जवाब है। आप कितनी भी परेशानी और कठिन परिस्थिति में क्यों न हों, हर प्रश्नों का सरल तरीके से जवाब गीता में पा सकते हैं। जिस तरह भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को हर कठिन परिस्थिति और कौरवों की विशाल सेना से जीत दिलाई उसी तरह गीता भी आपको हर एक परिस्थिति से बाहर निकालने में मदद कर सकती है।
इस ग्रंथ को पढ़ने से पहले गीता ध्यानम् के इस श्लोक के माध्यम से यह जानते हैं कि इसे समझना कितना जरूरी है। बिना समझे आप फिर से उसी जगह पर खड़े होंगे जहां से आपने शुरूआत की थी। आइए जानते हैं:
सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता, दुग्धं गीतामृतं महत्॥
अर्थ: सभी उपनिषद गाय के समान हैं, उन्हें दुहने वाले नंद के पुत्र श्री कृष्ण हैं। अर्जुन उस गाय का बछड़ा है, और गीता का अमृत रूपी दूध है। बुद्धिमान और भाग्यशाली लोग उस ज्ञानरूपी दूध का पान करते हैं।
संगति और सत्य
जीवन में संगति का सबसे बड़ा असर होता है। संगति ही आपको आगे ले जाती या फिर पीछे की ओर धकेलती है। दरअसल, महाभारत युद्ध से पहले, अर्जुन और कौरवों के राजकुमार दुर्योधन, दोनों ही श्री कृष्ण के पास गए। वहां उनके सामने एक विकल्प था, एक ओर स्वयं भगवान (सत्य) और दूसरी ओर उनकी माया (सेना/शक्ति) दुर्योधन, माया के आकर्षण में आकर, श्री कृष्ण की सेना को चुनता है। वहीं, अर्जुन सत्य को पहचानकर स्वयं श्रीकृष्ण को चुनते हैं। सत्य के प्रति प्रेम ही मनुष्य को सत्संग (अच्छी संगति) की ओर ले जाता है। इसपर गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है कि ‘बिनु सत्संग विवेक न होई’ अर्थात, सत्संग के बिना सही समझ (विवेक) नहीं आती। हमारे विचार उसी संगति से बनते हैं, जिसमें हम रहते हैं। इसलिए सही संगति हमेशा सत्य की ओर ले जाती है और बुरी संगति में आप आकर्षण की ओर आकर्षित होते हैं।
मन और समझ क्या है
हम अक्सर श्रीकृष्ण और अर्जुन को रथ पर बैठे हुए चित्र में देखते हैं। पुंडरीक गोस्वामी इसपर लिखते हैं कि, यह रथ हमारे शरीर या भौतिक संसार का प्रतीक है। इस चित्र में श्रीकृष्ण हमारी अंतरात्मा (विवेक/चेतना) का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि अर्जुन मन का प्रतीक हैं। कई लोग ‘विवेक’ को ‘मन’ के समान मानते हैं, लेकिन दोनों में अंतर है। मन वह स्थान है जहां विचार उत्पन्न होते हैं, जबकि विवेक सही और गलत का निर्णय करता है। हम सभी मन के साथ जन्म लेते हैं, लेकिन विवेक समय के साथ विकसित होता है। गीता हमें सिखाती है कि किसी भी स्थिति में प्रतिक्रिया देने से पहले उसे समझना कितना जरूरी है। इसमें बताया गया है कि, मन किस तरह हमारी अंतरात्मा (विवेक) को प्रभावित करने की कोशिश करता है। अर्जुन अपने मन के प्रभाव में आकर जब भ्रम में फंस जाते हैं, तो श्रीकृष्ण उन्हें इसके बारे में गहराई से बताते हैं।
पुंडरीक गोस्वामी कहते हैं कि, “मन हमें भ्रमित करता है, लेकिन हमारी अंतरात्मा हमें सत्य की ओर ले जा सकती है।”
गीता एक उपहार
पांडवों और कौरवों के बीच का युद्ध वास्तव में हमारे अंदर चल रहे नैतिक (सही) और अनैतिक (गलत) के संघर्ष का प्रतीक है। जब मन और अंतरात्मा आपस में टकराते हैं, तो निराशा और दुख पैदा होते हैं। गीता एक ऐसा उपहार है जो परेशान और थके हुए मन को संभालने और समृद्ध बनाने में मदद करता है। पुंडरीक गोस्वामी लिखते हैं कि, श्रीकृष्ण हमें चेतावनी देते हैं कि जितना अधिक हम इंद्रियों के सुखों में डूबते हैं, उतना ही हम उनमें फंसते चले जाते हैं। इन विरोधाभासी इच्छाओं और ताकतों को संतुलित करना ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है। जिस तरह अर्जुन ने खुद को श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित कर दिया इसी तरह, यदि हम भी अपने उलझे हुए विचारों को अपने विवेक (अंतरात्मा) के हवाले कर दें, तो हम इस भ्रम से बाहर निकल सकते हैं। हमारे कर्म या तो मन द्वारा नियंत्रित होते हैं या विवेक द्वारा।
मन और अंतरात्मा को समझाना क्यों जरूरी
अगर आप अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं, तो अपने मन को इस तरह प्रशिक्षित करें कि वह आपके खिलाफ काम न करे। गहराई से सोचने के लिए द्वारा आप मन और विवेक के बीच अंतर समझ सकते हैं। मन कल्पनाओं में उलझता है, जबकि विवेक वास्तविकता में स्थिर रहता है। मन चालाक होता है और हमें भ्रमित करता है, लेकिन विवेक हमें सत्य और सही मार्ग की ओर ले जाता है।
मन और विवेक/बुद्धि में अंतर
- मन
- कल्पनाओं में उलझता है
- चालाकी करता है
- ध्यान भटकाता है
- गलत दिशा में ले जाता है
- विनाश की ओर ले जाता है
- कमजोर बनाता है
- तुरंत सुख चाहता है
- अंत में दुख होते है
- विवेक/बुद्धि
- वास्तविकता में रहता है
- मार्गदर्शन करता है
- ध्यान केंद्रित रखता है
- सही दिशा दिखाता है
- निर्माण (विकास) करता है
- मजबूत बनाता है
- शुरुआत में कठिन लगता है
- अंत में सुख देता है
अंधा मन और ढका विवेक मिलकर दुष्टों को जन्म देते हैं
अयोग्य कोई नहीं होता, केवल अभ्यास की कमी होती है। पुंडरीक गोस्वामी लिखते हैं कि, आज की दुनिया में सकारात्मक सोच बहुत जरूरी है, क्योंकि अधिकतर लोग अंधे धृतराष्ट्र की तरह जीवन जीते हैं- जो सत्य को देख नहीं पाए या देखना नहीं चाहते थे। धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे, लेकिन उनकी पत्नी गांधारी ने खुद अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। अंधा मन और ढका हुआ विवेक मिलकर ऐसे दुष्टों को जन्म देते हैं जो दुनिया को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं।
गीता को समझने से पहले खुद की स्थिति को समझना जरूरी है। अपने तर्क और विचारों को एक तरफ रखकर, ध्यान से पढ़ना होगा, तभी आप इस अद्भुत ग्रंथ की गहराई को महसूस कर पाएंगे।
अहंकार और डर हमें भ्रमित करते हैं, जबकि समर्पण और सही समझ हमें सही रास्ता दिखाते हैं। हमारा भौतिक शरीर, जिसे अर्जुन के रथ के रूप में दर्शाया गया है, वह आत्मा का साधन है। पुंडरीक गोस्वामी लिखते हैं कि अर्जुन और श्रीकृष्ण के बीच संवाद वास्तव में आत्मा और अंतरात्मा (विवेक) के बीच यानी आत्मा और परमात्मा के बीच बातचीत है।
दुखों पर विजय कैसे पाएं
गीता में भगवान कृष्ण के उपदेश सही सोच, तर्क और समझ का मार्ग है। अर्जुन इसलिए बच जाते हैं क्योंकि, उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को चुना- अर्थात उनके मन ने सही समझ और विवेक को अपनाया। गीता में भगवान कृष्ण के उपदेशों के अनुसार जब तक विवेक मजबूत नहीं होता, तब तक दुख पर विजय नहीं पाई जा सकती। पुंडरीक गोस्वामी कहते हैं कि असल में, यह दुख भी एक प्रकार का प्रसाद (आशीर्वाद) है। क्योंकि यह हमें भगवान की ओर ले जाता है। मुख्य विचार तभी शुद्ध और पवित्र होंगे, जब आपका मन स्वस्थ होगा। अगर आप स्वस्थ मन चाहते हैं, तो उसे अपने विवेक के सहारे नियंत्रित करें। सरल शब्दों में समझे तो, जब मन भावनाओं में बह जाता है, तो वह सत्य नहीं देख पाता। लेकिन विवेक का सहारा लेने से सही रास्ता मिलता है।
यह संसार प्रकृति और ईश्वर का अद्भुत मेल है। प्रकृति स्वयं को पुनः संतुलित करती है, लेकिन आज उसका शोषण बहुत बढ़ गया है। युद्ध, पीड़ा और दुख ने मानवता को घेर लिया है। श्रीमद भागवत कहता है कि मनुष्य, एक श्रेष्ठ योनि होने के कारण, इस दुनिया की सुंदरता का आनंद ले सकता है। लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं:
“मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्”
अर्थात: जो मुझे प्राप्त कर लेता है, उसे इस दुख और नश्वर संसार में फिर जन्म नहीं लेना पड़ता।
गुरु का महत्व
- गुरु का महत्व क्या है इस श्लोक से समझते हैं “अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजन शलाकया”
- इसका अर्थ हुआ कि अज्ञान अंधकार है और गुरु वह है जो इस अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से दूर करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह संसार वास्तव में दुखों से भरा है। लेकिन यदि गुरु की कृपा से ज्ञान का दीपक जल जाए, तो मनुष्य सही तरीके से देख और समझ सकता है और सही निर्णय ले सकता है।
सच्चा ज्ञानी कौन
“समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः॥”
अर्थ:
जो व्यक्ति शत्रु और मित्र में समान भाव रखा है, मान-अपमान में एक जैसा रहता है, सर्दी-गर्मी, सुख-दुख में संतुलित रहता है और बुरी संगति से दूर रहता है। वही स्थिर बुद्धि वाला है। सरल शब्दों में बात करें तो- ये दुनिया हमेशा बदलती रहती है और इसमें सुख-दुख, लाभ-हानि जैसे दो पहलू होते हैं। जो व्यक्ति हर परिस्थिति में संतुलित रहता है, वही सच्चा ज्ञानी होता है।
चेतना बौद्धिक स्तर में कब में प्रवेश करती है
भौतिक स्तर पर हमें लाभ या हानि का समान करना पड़ता है। शारीरिक स्तर पर सुख और दुख मिलते हैं। मानसिक या भावनात्मक स्तर पर खुशी और उदासी की भावनाएं उत्पन्न होती हैं। बौद्धिक स्तर पर हम सम्मान और अपमान का अनुभव करते हैं। ये दो पहलू इस दुनिया में हमेशा बने रहते हैं। हमारी चेतना की यात्रा बाहर से अंदर की ओर होती है- स्थूल (बाहरी) से सूक्ष्म (अंदरूनी) की ओर। मानसिक स्तर पर पहुंचने पर भौतिक और शारीरिक चिंताएं कम होने लगती हैं और भावनाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं। लेकिन जब हम भावनाओं के उतार-चढ़ाव से ऊपर उठ जाते हैं, तब हमारी चेतना बौद्धिक स्तर में प्रवेश करती है।
सही परिवर्तन अंदर से शुरू होता है
हमें दुनिया को बदलने के बजाय खुद को बदलना सीखना चाहिए। मन का द्वंद्व प्यार को भी नफरत में बदल देता है। गीता हमें स्वीकार करने का महत्व सिखाती है और यह अध्याय संसार के वास्तविक स्वरूप को समझाता है। ये दुनिया बदलती रहती है उसे बदलने की कोशिश करने के बजाए समझने और स्वीकार करने की कोशिश करना चाहिए और असली शांति अंदर से आती है।
“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो, न शोषयति मारुतः॥”
अर्थ: आत्मा को न तो कोई हथियार काट सकता है, न आग जला सकती है, न पानी भिगो सकता है और नहीं हवा सुखा सकती है।
इन पांच स्तरों से होकर जीवन आगे बढ़ता है
हम जीवन में भौतिक, शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक स्तरों से होकर आगे बढ़ते हैं। वास्तव में हम कुछ खोते नहीं, बल्कि ऊपर उठते हैं। त्याग का मतलब छोड़ना नहीं होता, बल्कि उससे ऊपर उठना है। हम शरीर या मन नहीं, बल्कि अमर आत्मा हैं। जीवन का लक्ष्य है अपने आप को पहचानना और धीरे-धीरे ऊंचे आध्यात्मिक स्तर तक पहुंचना। एक संन्यासी दुनिया के साथ अपने संबंधों को सीमित करके और अपनी आध्यात्मिक साधना को बढ़ाकर एकांत को अपनाता है। इसे ही त्याग कहा जाता है। जब हम विकास के पांचवे स्तर (आध्यात्मिक स्तर) तक पहुंच जाते हैं, तो दुनिया हमें प्रभावित करना बंद कर देती है। शरीर, मन और बुद्धि जहां सांसारिक सुखों की ओर आकर्षित होते हैं, तो वहीं आत्मा उनसे अछूती रहती है। आत्मा एक दर्शक की तरह काम करती है। जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसका शरीर, मन और बुद्धि यहीं रह जाते हैं, लेकिन आत्मा अलग हो जाती है और अपने साथ पिछले जन्मों के सूक्ष्म संस्कार लेकर आगे बढ़ती है। गीता में एक श्लोक है “वासांसि जीर्णानि यथा विहाय”, अर्थात: जैसे मनुष्य पुराने कपड़े छोड़कर नए पहनता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है। गीता हमें हमारी असली पहचान समझाती है।
किसे पढ़ना चाहिए
वैसे तो जीवन में एक बार भगवद गीता हर किसी को पढ़ना चाहिए। अध्यात्म के मार्ग पर चलकर जीवन किस तरह जीना है अगर इसकी खोज में हैं तो बेशक आपको यह किताब पढ़नी चाहिए। अगर आप तमाम परेशानियों में उलझे हुए हैं, तो आपको गीता सही मार्ग पर ले जा सकती है। गीता हमें सिखाती है कि, जीवन में आई हर कठिनाई को सरल तरीके से कैसे हल करें। आज के आधुनिक युग में भागती हुई जिंदगी में थोड़ा ब्रेक लगाएं और एक बार भगवद गीता को जरूर पढ़ें। आपको अपने मूल्यों, जीवन का मतलब, धर्म, अधर्म, कर्म से लेकर अहंकार और तमाम उन भौतिक चीजों के बारे में पता चलेगा जिनका कोई मोल ही नहीं है। आपको अंत में असल जीवन का मतलब समझ आएगा।
अंत में
भगवद गीता हमें अपने भीतर शांति, प्रेम और संतोष पैदा करना सिखाती है। यही हमारे अंदर का स्वर्ग है। गीता हमें सिखाती है कि, मोह, क्रोध, लालच या अहंकार से ऊपर उठकर शरीर, मन और बुद्धि का सही उपयोग करके अपनी चेतना को आत्मा की ओर ले जाना चाहिए। हमें पक्षपात छोड़कर निष्पक्ष और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। अपने कर्म करें, लेकिन अहंकार न रखें। यही सच्चा ज्ञान है। गीता पढ़ने या सुनने से कोई भगवान नहीं बन जाता, बल्कि भगवान के प्रति समर्पित और उनके निकट हो जाते हैं। गीता का मुख्य उद्देश्य अहंकार, मोह और पक्षपात छोड़कर आत्मा को पहचाना है।
किताब का नाम: भगवद गीता: लाइट ऑफ डिवाइन विजडम
लेखक: पुंडरीक गोस्वामी
प्रकाशन: वेस्टलैंड बुक्स
मूल्य: 399 रुपए
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