नागा नाम सुनते ही लोगों की जेहन में भस्म से लिपटे शरीर, जटाएं, हाथ में त्रिशूल या अन्य साधु-सामग्री और निर्वस्त्र की तस्वीर बनती है। लोग इसी को नागा साधुओं की सबसे बड़ी पहचान भी मानते हैं। सबसे अधिक चर्चा में नागा कुंभ में शाही स्नान के दौरान रहते हैं। जब नागा साधुओं की शाही स्नान के लिए सवारी निकलती है तो उस दौरान का नजारा देखने लायक होता है। यह दृश्य भारतीय धार्मिक संस्कृति की सबसे विशिष्ट छवियों में से एक बन चुका है। सनातन धर्म की साधु परंपरा में नागा साधु उन संन्यासियों को कहा जाता है, जिन्होंने सांसारिक मोह-माया, परिवार और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग कर तप और साधना का मार्ग अपनाया है। उनका जीवन सामान्य गृहस्थ जीवन से बिल्कुल अलग होता है। नागा साधु के पीछे त्याग, वैराग्य, तपस्या, गुरु-शिष्य परंपरा और अखाड़ों की एक लंबी धार्मिक परंपरा है। यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि सनातन धर्म की परंपरा में अगर असल में कोई धर्म रक्षक है, तो वह हैं नागा साधु हैं। साधारण से दिखने वाले इन नागा साधुओं के बारे में कई तरह की दिव्य शक्तियों और सिद्धियों की मान्यताएं प्रचलित हैं। जब-जब सनातन धर्म और प्रकृति को नागा साधुओं की जरूरत पड़ी है तब-तब ये पहाड़ की तरह डटे नजर आए। नागाओं की दिव्य शक्ति और सनातन धर्म के लिए उनके दिए योगदान के बारे में गहराई से विवरण ‘अक्षत गुप्ता’ की किताब “द नागा वॉरियर्स- बैटल ऑफ गोकुल खंड-2” में मिलता है।

सनातन धर्म को बचाने के लिए गोकुल की धरती पर एक ऐसा महायुद्ध लड़ा गया था जिसके बारे में बहुत ही कम लोगों को जानकारी है। यह युद्ध धर्म और अधर्म के बीच हुआ था। एक ओर सनातन धर्म की रक्षा करने वाले उसके रक्षक नागा साधु थे, तो दूसरी तरफ सनातन की परंपरा को इतिहास बनाने के लिए हजारों की संख्या में आसुरी अफगान सेना। नागा साधुओं की संख्या बहुत कम होती है। लेकिन इसके बाद भी वह अपनी बेहतरीन रणनीति, तप-बल से प्राप्त किए दिव्य ऊर्जाओं और पराक्रम से इस महायुद्ध को सनातन धर्म के पक्ष में मोड़ देते हैं। किताब पढ़ने पर ऐसा लगता है कि इस धर्म युद्ध में नागाओं के साथ प्रकृति ने भी अपनी आहूति दी थी।

धर्म की अधर्म के खिलाफ युद्ध

‘द नागा वॉरियर्स- बैटल ऑफ गोकुल खंड-2’ किताब में एक ऐसे युद्ध के बारे में जिक्र किया गया है, जिससे अभी तक काफी लोग अनजान थे। ये युद्ध धर्म का अधर्म के खिलाफ हुआ था। गोकुल में लड़ा गया यह युद्ध, एक ऐसे धर्म को बचाने के लिए लड़ा गया था, जिसके बिना संसार की कल्पना नहीं की जा सकती, जिसके बिना मानवता अपनी वह पवित्रता खो देती, जैसा कि ईश्वर ने इसे गढ़ा था और यह धर्म वर्तमान में है और अनादि-अनंत काल तक बना रहेगा… यानी सनातन धर्म। इस युद्ध को मुट्ठी भर साधु और साध्वियों की टोली ने अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के सेनापति सरदार खान की नेतृत्व वाली पूरा आसुरी सेना को लगभग नष्ट कर दिया था।

हजारों अफगानों को सिर्फ 111 नागाओं ने खत्म किया था

यह महायुद्ध गोकुल में साल 1757 के आसपास लड़ा गया था। गोकुल खतरे में था और उसे मिटाने के लिए अहमद शाह अब्दाली की एक बड़ी सेना सामने खड़ी थी। सबसे पहले गोकुल पहुंचने वाली अब्दाली की जो सेना थी, वह सेनापति सरदार खान की थी। सरदार खान की फौज में हजारों की संख्या में अफगानी थे, जो हिंदुओं के खून के प्यासे थे। इस महायुद्ध की शुरुआत में सिर्फ 111 नागा साधुओं ने मिलकर सरदार खान की हजारों की संख्या में फौज को परास्त किया था। इसमें सबसे अहम भूमिका सूरजगढ़ के राजा ध्यानेंद्र और उनके बेटे अजा ने निभाई थी। राजा ध्यानेंद्र भौतिक दुनिया का त्याग करते हुए और अपना राज-पाठ छोड़कर बेटे अजा के साथ नागा साधु बना गए थे, जिन्हें आध्यात्मिक नाम शंभूजी मिला। शंभूजी और अजा करीब 111 नागाओं (साध्वी और साधु दोनों शामिल थे) के साथ मिलकर हजारों की संख्या में सरदार खान की सेना को नष्ट कर दिया था। इसमें सरदार खान की मृत्यु भी हो गई थी। इस युद्ध के बाद अहमद शाह अब्दाली बौखला उठा था और उसने गोकुल को नष्ट करने का प्रण लिया। इसी के साथ उसने चारों दिशाओं से अपने सैनिकों को गोकुल पर हमला करने का आदेश जारी किया और साथ ही रास्ते में जो भी हिंदू महिला, पुरुष, बच्चा और मंदिर आएं उन्हें भी नष्ट करने का आदेश दिया। इसके बाद अफगान आतताइयों ने भारत की धरती पर गोकुल की तरफ आते वक्त कत्लेआम मचा दिया था।

हिमालय की रहस्यमयी दुनिया

इसकी खबर जब हिमालय में ध्यान लगाए बैठे नागाओं को मिलती है तो वह धर्म की रक्षा के लिए एकजुट होना शुरू हो जाते हैं। हिमालय तक नागाओं को खबर ध्रुव पहुंचाते हैं। लेकिन इन नागाओं तक पहुंचना ध्रुव का रास्ता इतना आसान नहीं होता है। जब किताब पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि हिमालय में नागाओं की एक अलग ही दुनिया है। वह शिव के परम भक्त हैं। उन्हें कई तरह की सिद्धियां प्राप्त हैं, नागा इन सिद्धियों को अपने योग तपबल के जरिए प्राप्त करते हैं। धर्म रक्षक के साथ अगर शिव के असली कोई उपासक हैं, तो वे नागा साधु ही हैं।

हिमालय में शिव के 10 अवतार: किताब में बताया गया है कि हिमालय में शिव के 10 अवतारों में से कई अवतार आज भी निवास करते हैं। यात्रा के दौरान ध्रुव को इनके कई अवतारों से मुलाकात होती है, जो दिखने में भयानक भी, सरल भी, सहज भी और शक्तिशाली भी होते हैं। इसके साथ ही इसमें अश्वत्थामा के जीवित रहने का भी जिक्र किया गया है।

हिम योद्धा: गेम ऑफ थ्रोन्स जिनसे देखी होगी उसमें बर्फ में रहने वाले बड़े कद वाले पुरुषों को लड़ते हुए दिखाया गया है, जिनकी लंबाई आम लोगों से कई गुना ज्यादा होती है। इस किताब के अनुसार 1757 में धर्म को बचाने के लिए लड़े गए गोकुल के इस महायुद्ध में कई हिम योद्धाओं ने अपनी आहूति दी थी, जिनकी लंबाई 12 फीट से लेकर 19 फीट से भी अधिक थी और ये बेहद बलशाली थे। इसके साथ ही कई किताबों में भी प्राचीन समय में विशाल मानवों के बारे में जिक्र मिलता है। इस युद्ध में इन हिम योद्धाओं ने अब्दाली की सेना में तबाही मचा दी थी।

नागाओं की शक्ति: किताब के अनुसार नागाओं में कई तरह की शक्तियां होती हैं। कोई परछाई कैद कर सकता है, तो कोई आग निकालने में माहिर होता है, कई नागा दिमाग को भी कंट्रोल कर सकते हैं। इसी तरह किताब में नागा साधुओं के अद्भुत शक्तियों के बारे में जिक्र किया गया है।

वो वीरांगनाएं जिन्हें इतिहास कभी भूल नहीं सकता

गोकुल के इस युद्ध में नागाओं के आने से पहले अफगान सेना का सामना उन भारतीय वीरांगनाओं से हुआ था, जिनकी नंगी तलवार और चंडी का रूप देखकर अब्दाली की सेना में खलबली मच गई थी। एक ओर अब्दाली की 10,000 से अधिक सैनिकों वाली विशाल सेना, 100 से अधिक तोपें और 1000 से अधिक घुड़सवार थे तो, दूसरी तरह दुर्गा के रूप में ये शक्ति महिलाएं। इन महिलाओं ने अब्दाली की आधी सेना को खत्म कर दिया था। हालांकि, अंत में अफगानों ने उनकी लाशों के साथ वह जघन्य अपराध किया, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ये वीरांगनाएं राजा ध्यानेंद्र (शंभूजी) की पत्नी और सूरजगढ़ की महारानी की सेना में शामिल थीं, जिन्हें देखकर ऐसा लगता था कि मां दुर्गा खुद चंडी का रूप धारण कर असुरों को खत्म करने के लिए आई हों।

1500 से अधिक अफगानों के सामने 1450 नागा साधु

गोकुल की जमीन पर धर्म को बचाने के लिए यह महायुद्ध सिर्फ 1450 नागाओं, कुछ हिंदू सैनिकों (300-400) और 15,000 से अधिक अफगानों के साथ लड़ा गया था। अब्दाली जब अपनी हजारों की संख्या में फौज के साथ गोकुल पहुंचता है, तो उस दौरान हरिपुर के सेनापति कृष्णा सिर्फ 40-50 सैनिकों के साथ उसका सामना कर रहे होते थे। लेकिन जैसे ही ‘हर हर महादेव और बम-बम भोले का उद्घोष करते हुए नागा साधु पहुंचते हैं, अब्दाली की फौज में सिरहन फैल जाता है। इस महायुद्ध में आपको पता चलेगा कि किस तरह कुछ नागा साधु इस महायुद्ध को अपने पक्ष में मोड़ देते हैं। किताब में इफ्रीत का भी जिक्र किया गया है, जिसे इस्लाम में शैतान कहा जाता है। युद्ध में इफ्रीत मुर्दा अफगानों को जिंदा कर देता है और अब्दाली के पास एक विशाल मुर्दा सेना तैयार हो जाती है, अब नागाओं का युद्ध उन मुर्दा लाशों के साथ होता है जिन्हें कभी मारा ही नहीं जा सकता था।

लेकिन कई नागाओं को तंत्र विद्या में भी महारथ हासिल होती है। किताब में कुछ ऐसी बातें बताई गई हैं, जिनकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। इस युद्ध में पेड़-पौधे, पक्षी और वनस्पति भी शामिल हुए थे। इस धर्म युद्ध में प्रकृति के हर जीव ने अपनी आहूति दी थी। अंत में बस इतना ही कि सनातन धर्म को बचाने के लिए गोकुल की धरती पर एक ऐसा युद्ध लड़ा गया

किताब में क्या है

इस किताब में आपको नागाओं के उन शक्तियों के बारे में पता चलेगा, जिससे आप अब तक अज्ञान थे। एक ऐसे धर्म युद्ध के बारे में पता चलेगा, जिसका इतिहास अब तक बहुत कम लोगों को पता था। भारत अदम्य साहसी वीरांगनाओं के बलिदान के बारे में पता चलेगा। आपको एक ऐसे इतिहास के बारे में पता चलेगा जिसमें नागाओं के साथ पूरी प्रकृति अफगान अताताइयों के साथ लड़ रही थी। मनुष्यों के साथ पेड़, पौधे, पक्षी, जानवर सबने अधर्म के युद्ध में अपने प्राणों की आहूति दी थी।

किसे पढ़नी चाहिए यह किताब

अगर आप नागा साधुओं के बारे में जानना चाहते हैं। वह कहां रहते हैं, किस तरह जीवन जीते हैं, कैसे तप-बल से उनके अंदर दिव्य ऊर्जा प्रवाहित होती है। किस तरह वह अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हैं? उन्हें सनातन धर्म का रक्षक क्यों कहा जाता है तो आपको यह किताब पढ़नी चाहिए। अगर आप ऐतिहासिक फिक्शन पसंद करते हैं, तो यह किताब आपके लिए बेहतरीन साबित हो सकती है। यह किताब ऐतिहासिक फिक्शन और पौराणिक रोमांच का जबरदस्त मेल है।

लेखक: अक्षत गुप्ता

किताब का नाम: द नागा वॉरियर्स- बैटल ऑफ गोकुल, खंड-2

किताब का मूल्य: 350 रुपये

पब्लिकेशन: मंजुल

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