रवि कुमार झा
साहित्य सदैव समाज को गहराई से प्रभावित करता रहा है। इस प्रभाव के मूल में ‘आख्यान’ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि यह विचारों और अनुभवों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में आख्यान की भूमिका और भी अधिक प्रभावशाली हो जाती है, जहां परंपरा, संस्कृति और जीवन-मूल्य कथाओं के माध्यम से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी संप्रेषित होते हैं। इसलिए, आख्यान को समझना वस्तुतः समाज की संवेदना, उसकी मानसिकता और उसके मूल स्वभाव को समझना है। इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है।
‘आख्यान और नयी कविता’ प्रो. दिलीप शाक्य द्वारा लिखित एक आलोचनात्मक कृति है। यह पुस्तक आख्यान,आख्यान की संरचना से होते हुए पुरानी कविता और ‘नयी कविता’ सहित ‘समकालीन कविता’ तक के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक यथार्थ का आख्यानपरक दृष्टि से विश्लेषण करती है।
इस कृति के लेखक प्रो. दिलीप शाक्य जी वर्तमान में जामिया मिलिया इस्लामिया के हिंदी विभाग में प्रोफेसर हैं। एक कवि, आलोचक और सिनेमा-विशेषज्ञ के रूप में उनकी गहरी संवेदनात्मक समझ इस पुस्तक के विषय के साथ पूरी तरह न्याय करती है।
पहला प्रश्न है कि आख्यान क्या है, लेखक इसके संदर्भ में भूमिका में ही बताते हैं “मोटे तौर पर आख्यान का संबंध कथा कहने की उस पद्धति से है जिसके माध्यम से वाचक युग-सत्य अथवा युग-यथार्थ का प्रायः एक व्यापक फलक पर अंकन करता है। पुरानी प्रबंध कविता में ऐसा महाकाव्य के माध्यम से किया जाता था क्योंकि प्राचीन समय में काव्य ही संप्रेषण का सबसे सशक्त माध्यम था, सो विभिन्न प्रकार के आख्यानों को काव्य अर्थात महाकाव्यों अथवा लोकगाथाओं की रूप-रचना में ढालकर प्रस्तुत किया जाता था। आधुनिक समय में पूंजीवाद के उदय और आधुनिकता के दबाव से आख्यान, महाकाव्यों और लोकगाथाओं से निकलकर, उपन्यास, कहानी और गद्य की अन्य नयी विधाओं में अभिव्यक्ति पाने लगा। अभी तक का आख्यान ‘कविता का आख्यान’ था और कविता ‘आख्यान की कविता’।” (पृष्ठ 7)”साहित्य के संदर्भ में आख्यान के दो रूप प्रचलित हैं- आख्यान का वाचिक रूप और आख्यान का लिखित रूप।” (पृष्ठ 7) लेखक अपनी बात को पांच मुख्य आलेखों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं, जो इस प्रकार हैं: आख्यान की संरचना, आख्यान और पुरानी कविता, आख्यान और ‘नयी कविता’, लम्बी कविताओं में आख्यान की संरचना, और कुछ कविताएं: एक आख्यानपरक विश्लेषण।
‘आख्यान की संरचना’ में लेखक संवेदना और शिल्प के स्तर पर आख्यान की आंतरिक बनावट पर बात करते हैं। “आख्यान साहित्य का अर्थ हम ऐसे साहित्य से ग्रहण करते हैं जिसमें वाचक, कथा और श्रोता, की उपस्थिति का प्रायः विचार किया जाता है। मसलन प्रबंधात्मक कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रावृतांत, आत्मकथा इत्यादि। इन सभी साहित्य रूपों में रचनाकार जीवन जगत की अनुभूत वास्तविकता का सत्यतर प्रस्तुतीकरण करता है।” (पृष्ठ 13)वहीं “आख्यान की आंतरिक बनावट महज एक शिल्पगत ढांचा नहीं है, बल्कि वह रचनाकार के अंतर्मन और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का एक जीवंत दस्तावेज है।” (पृष्ठ 13) संवेदना और शिल्प के स्तर पर किसी आख्यान की आंतरिक बनावट किस प्रकार की होगी यह बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें प्रस्तुत कथ्य का संबंध किस समाज व्यवस्था से है तथा वह श्रोताओं के किस समूह अथवा किस पाठक वर्ग को संबोधित है। यही नहीं रचनाकार के भीतरी जगत की बनावट का भी आख्यान की संरचना पर प्रभाव पड़ता है।” (पृष्ठ 13)
लेखक संस्कृत साहित्य में आख्यान के दो रूपों ‘कथा’ (काल्पनिक) और ‘आख्यायिका’ (ऐतिहासिक वृत्त पर आधारित)—के बीच के मूल अंतर और उनकी पद्धतियों को स्पष्ट करते हैं। “प्राचीन साहित्य में, आख्यान में कथा के उपयोग से संबंधित दो प्रकार की पद्धतियां प्रचलित रही हैं। पहले प्रकार की पद्धति में आख्यान की कथावस्तु कल्पना के आधार पर निर्मित होती है। संस्कृत साहित्य में ऐसे आख्यान को ‘कथा’ के नाम के नाम से अभिहित किया गया है। जबकि दूसरी पद्धति में आख्यान की कथावस्तु किसी ऐतिहासिक वृत्त पर आधारित होती है। संस्कृत साहित्य में ऐसे आख्यान को ‘आख्यायिका’ नाम दिया गया है।’ (पृष्ठ 14)
खास बात ये है कि “आख्यान वस्तुतः किसी काल विशेष में पहले से उपस्थित कथाओं का फिर फिर प्रस्तुतीकरण है। वे कथा कहने के वाचिक, लिखित, मुद्रित तथा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों द्वारा विभिन्न श्रोता-समूहों तक पहुंचती रही हैं।” (17)
वाचिक और लिखित परंपरा के आख्यान में ये अंतर है कि “आख्यान के वाचिक रूप का संबंध साहित्य की उस संस्कृति से है जिसमें कथाएं वाचिक परंपरा के माध्यम से विभिन्न वाचकों द्वारा विभिन्न श्रोता समूहों तक संप्रेषित की जाती हैं।” (पृष्ठ 17) जबकि “लिखित परंपरा में वाचक और श्रोता का संबंध लेखक और पाठक के संबंध में बदल जाता है। अर्थात वहां श्रुत परंपरा के श्रोता की सजीव और प्रत्यक्ष उपस्थिति का स्थान एक अनुमानित पाठक की अनुपस्थित्ति ले लेती है।” (पृष्ठ 17)
पुस्तक के दूसरे आलेख ‘आख्यान और पुरानी कविता’ में आदिकाल से लेकर भक्तिकाल तक आख्यानों (कथाओं) की विकास यात्रा और उनके स्वरूप का गहन विश्लेषण किया गया है। वस्तुतः आख्यान शब्द भारतीय वाग्मय से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। “आख्यान शब्द ‘आ’ उपसर्ग ‘ख्या’ मूलधातु एवं ‘अन्’ प्रत्यय से मिलकर बना है। ‘ख्या’ का वैदिक साहित्य में अर्थ है ‘देखना’। ‘आ’ उपसर्ग लगाने से यह आख्या हो जाएगा। आख्या का अर्थ है कहना। आख्या से ही आख्यान शब्द निर्मित हुआ है। आख्यान शब्द का प्रथम उल्लेख वैदिक साहित्य में प्राप्त होता है।” (पृष्ठ 24)
लेखक आख्यान के इतिहास को बताते हुए इसके दो वर्ग का जिक्र करते हैं।”विद्यानिवास मिश्र ने संस्कृत आचार्यों के हवाले से आख्यान के दो वर्ग माने हैं- कथा और आख्यायिका। कथा में कृतिकार कल्पना द्वारा कथानक की सृष्टि करता है, जबकि आख्यायिका इतिहास में घटित सत्य घटनाओं पर आधारित होती है। इस दृष्टि से बाणभट्ट की रचना कादंबरी एक कथा है तथा बाणभट्ट की ही दूसरी रचना हर्षचरित एक आख्यायिका।
इसी प्रकार ऐसे आख्यान जो छंदो में निबद्ध एवं गेय होते थे गाथा कहलाए। इन गाथाओं का कोई निर्धारित अंत नहीं होता, वे एक प्रकार से अनंत भावकथाएं होती हैं। गाथाएं प्रायः चारणों द्वारा गायी जाती थीं।” (पृष्ठ 25) लेखक आख्यान की दृष्टि से रामायण की महत्ता को मार्क करते हैं।”एक आख्यान-काव्य के रूप में रामायण का महत्व इस दृष्टि से भी है कि यह पहला ऐसा महाकाव्य है जिसने अपनी संरचना में काव्यात्मकता और कथात्मकता का सुंदर समायोजन किया है।” (पृष्ठ 29) लेखक लिखते हैं “आख्यान की दृष्टि से आदिकालीन काव्य की रूप-संरचना को समझना अत्यंत आवश्यक है। इस काल की कविता की चार धाराएं हैं। जैन काव्य, सिद्ध काव्य, नाथ काव्य, और रासो काव्य।” (पृष्ठ 31)
आदिकालीन जैन कवियों, जैसे स्वयंभू और पुष्पदंत ने राम और कृष्णकथा को विशुद्ध लौकिक रूप में अपनाया। इनमें भक्ति या दिव्यत्व का आग्रह नहीं था, बल्कि लोकजीवन और चरित्रों की प्रधानता थी।”आदिकाल के जैन कवियों की अधिकांश रचनाएं पुराणकालीन आख्यानों को आधार बनाकर रची गयी हैं। इनमें राम और कृष्ण की कथा पर आधारित रचनाओं का आख्यान की दृष्टि से ऐतिहासिक महत्व है। आदिकाल के अपभ्रंश काव्यों में रामकथा के दो रूप देखने को मिलते हैं। एक रूप विमलसूरि के ‘पउम चरिउ’ के अनुसार है और दूसरा गुणभद्र के ‘उत्तरपुराण’ के अनुसार। जैन कवियों ने इन दोनो ही परंपराओं को आधार बनाकर रामकथा से संबंद्ध ग्रंथों की रचना की। स्वयंभू ने विमल सूरि की परंपरा को अपनाया तो पुष्पदंत ने गुणभद्र की परंपरा का अनुसरण किया।” (पृष्ठ 32)
रासो और कथा-काव्यों में भी आख्यानों की दोहरी परंपरा मिलती है,एक ओर पृथ्वीराजरासो जैसे जटिल और वीरात्मक चरित काव्य हैं, तो दूसरी ओर बीसलदेवरासो जैसे गेय और संक्षिप्त काव्य। भक्तिकाल में वैष्णव कवियों ने अवतारवाद और लोक-संस्कृति के माध्यम से इन आख्यानों को नई ऊंचाइयां दीं। तुलसीदास ने मर्यादा और सूफी कवियों ने लोककथाओं के सहारे प्रबंध काव्यों का उत्कृष्ट निर्माण किया। कुल मिलाकर, आख्यान की यह यात्रा युगानुरूप सामाजिक मूल्यों और कलात्मक स्वरूपों के परिवर्तन को दर्शाती है। “समग्र रूप से देखें तो आदिकालीन काव्य का आख्यान पुराण, इतिहास और लोक की आधार भूमि पर निर्मित हुआ है।” (पृष्ठ 36)
तीसरा आलेख ‘आख्यान और ‘नयी कविता’ है। इसमें आख्यान और ‘नयी कविता’ के अंतर्संबंधों और विकास-यात्रा का अत्यंत गंभीर एवं तार्किक विश्लेषण किया गया है। लेखक ने हिंदी कविता में आख्यान के प्रयोग को द्विवेदी युग, छायावाद और नयी कविता के संदर्भों में विश्लेषित किया है।
द्विवेदी युग में प्रबंधात्मक और वाचिक परंपरा के आधार पर आख्यान का उपयोग होता था, जहां रचनाकार का निजी व्यक्तित्व गौण रहता था। छायावाद में प्रसाद ने इसे महाकाव्यात्मकता और दर्शन से जोड़ा, जबकि निराला ने ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसी लंबी कविताओं के माध्यम से इसमें आत्मपरकता और प्रगीतात्मक संरचना के तत्वों का अद्भुत समावेश किया। लेखक स्पष्ट शब्दों में कहते हैं “नयी कविता से पूर्व की आख्यानपरक कविता किसी न किसी रूप में छंद के अनुशासन को स्वीकार करती आयी है। ख़ुद निराला, जिन्होंने हिंदी कविता में ‘मुक्त छंद’ के प्रयोग का श्रीगणेश किया, ने अपनी अधिकतर आख्यानपरक कविताओं को छंद के अनुशासन में बांधकर प्रस्तुत किया।” (पृष्ठ 65)
नयी कविता में आख्यान ने एक नया आयाम प्राप्त किया, जहां पौराणिक कथाओं और प्रतीकों का उपयोग मात्र पुनरावृत्ति के लिए न होकर समकालीन मूल्य-संकट और जटिल यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए किया गया। ‘समय देवता’ और ‘अंधायुग’ जैसी लंबी कविताओं व काव्य-नाटकों के माध्यम से नयी कविता ने आख्यान को नाटकीय संरचना और केंद्रीय विचार से जोड़ा। साथ ही, इन कवियों ने छंदों व सांगीतिकता के बंधन को तोड़कर इसे ‘गाने की कला’ के स्थान पर ‘पढ़ने की कला’ और मुक्त छंद के रूप में प्रतिष्ठित किया।
लेखक की अत्यंत स्पष्ट, सुगठित एवं तार्किक दृष्टि को इस लेख के माध्यम से समझा जा सकता है। उन्होंने विभिन्न काव्यांदोलनों और रचनाओं (जैसे- ‘कामायनी’, ‘अंधेरे में’, ‘कनुप्रिया’) के उदाहरणों के माध्यम से नयी कविता की आख्यानपरक विशिष्टता को सफलतापूर्वक प्रमाणित किया है। उनका यह प्रयास हिंदी आलोचना की दृष्टि से बेहद सराहनीय और प्रासंगिक है।
लेखक आख्यान की विकास की यात्रा को स्पष्ट शब्दों में बताते हैं -“आधुनिक युग में उपन्यास के उदय ने कविता में आख्यान की महाकाव्यात्मक संभावनाओं को सोख लिया। जो इतिवृत्तामकता और वर्णनात्मकता अब तक प्रबंध कविता की संरचना का सबसे प्रधान और सशक्त आधार थी, उसे उपन्यास ने अपना लिया। उपन्यास चूंकि गद्य की सबसे सशक्त विधा के रूप में अपना महत्व स्थापित कर चुका था, अतः काव्य-रचना की पारंपरिक शैलियों और प्रणालियों के समक्ष नयी चुनौती उपस्थित हो गयी।” (पृष्ठ 51)
अगला लेख ‘लम्बी कविताओं में आख्यान की संरचना’ हिंदी कविता के विकासक्रम, विशेषकर छायावाद से नई कविता तक के प्रबंधात्मक ढांचे के बदलाव का एक गंभीर और विश्लेषणात्मक अध्ययन पेश करता है। लेखक के अनुसार, हिंदी में ‘लंबी कविता’ का उदय अचानक नहीं हुआ, बल्कि यह महाकाव्य के पारंपरिक रूपविधान के अपर्याप्त और अप्रासंगिक होने का परिणाम था, जिसकी अनिवार्य परिणति ‘कामायनी’ में दिखाई देती है। यह विधा द्विवेदी युगीन प्रबंधात्मकता के विरुद्ध छायावादी प्रगीत चेतना के विद्रोह से उपजी है। लेख में कविताओं को दो श्रेणियों में बांटा गया है: ‘लीनियर’ जिसमें ‘प्रलय की छाया’ और ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसे कालक्रम की रक्षा करने वाले काव्य हैं, और ‘फ्यूगल’ जिसमें मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ जैसी कविताएं हैं जो कालक्रम को चेतना-प्रवाह और फैंटेसी के माध्यम से खंडित करती हैं।
लेखक ने सुमित्रानंदन पंत की ‘परिवर्तन’ (1923) को कालक्रम की दृष्टि से हिंदी की पहली लंबी कविता माना है, किंतु इसे ‘आख्यानपरक’ नहीं कहा क्योंकि इसमें किसी निश्चित कथा या वृत्तांत का अभाव है। इसके विपरीत, जयशंकर प्रसाद की ‘प्रलय की छाया’ (1933) को पहली आख्यानपरक लंबी कविता का दर्जा दिया गया है। लेख में ‘राम की शक्तिपूजा’ की अद्वितीयता पर प्रकाश डालते हुए बताया गया है कि कैसे निराला ने राम के मिथकीय चरित्र को एक साधारण मनुष्य के संशय और यथार्थ की भूमि पर लाकर खड़ा किया। इसके साथ ही, अज्ञेय की ‘असाध्यवीणा’ की वर्तुलाकार संरचना और मुक्तिबोध की कविताओं में ‘ज्ञात से अज्ञात’ की ओर जाने वाली ‘खुले अंत’ की प्रक्रिया को भी गहराई से समझाया गया है।
यह लेख काव्य-नायक के चरित्र में आए मौलिक बदलाव को रेखांकित करता है। प्राचीन साहित्य के ‘धीरोदात्त’ नायक के स्थान पर आधुनिक लंबी कविता का नायक यथार्थ की ठोस जमीन पर खड़ा है। मुक्तिबोध तक आते-आते यह नायक कोई व्यक्ति विशेष न रहकर स्वाधीनता के बाद का ‘बेचैन, खंडित और जर्जर हिंदुस्तान’ बन जाता है। लेखक अपनी दूरदृष्टि से यह निष्कर्ष निकालते हैं कि आधुनिक भावबोध को समग्रता में व्यक्त करने के लिए कवियों ने पारंपरिक प्रबंधात्मक रूढ़ियों को तोड़कर ‘सर्जनात्मक तनाव’ और ‘नाटकीय विधान’ को अपनाना आवश्यक समझा। यह लेख लंबी कविता के शिल्प, मिथक और नायकत्व के अंतर्संबंधों को समझने के लिए एक ठोस वैचारिक आधार प्रदान करता है।
अंतिम लेख “कुछ कविताएं: एक आख्यानपरक विश्लेषण” है। हिंदी आलोचना और समकालीन कविता के अध्ययन के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण शोधपूर्ण आलेख है। आलोचक ने जिस सहजता, गहराई और विश्लेषणात्मक दृष्टि के साथ विभिन्न लंबी कविताओं का विवेचन किया है, वह वास्तव में सराहनीय है। यह आलेख न केवल नयी कविता के आख्यानों का मूल्यांकन करता है, बल्कि पाठक को कविता के भीतर छिपे सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक सरोकारों से भी गहराई से जोड़ता है।
इस लेख की सबसे बड़ी विशेषता इसकी तटस्थ, किंतु गहरी अंतर्दृष्टि वाली दृष्टि है। लेखक ने नरेश मेहता की ‘समय देवता’ से लेकर अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’, मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ और रघुवीर सहाय की ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ जैसी कालजयी रचनाओं का सूक्ष्म और आख्यानपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। नरेश मेहता की कविताओं में आशा और आस्था के बिंदुओं को रेखांकित करना हो या मुक्तिबोध की फैंटेसी और ‘खंडकथा’ के शिल्प को डिकोड करना हो, लेखक की वैचारिक स्पष्टता हर जगह झलकती है।
इसके अतिरिक्त, लेख में राजेश जोशी की कविता ‘चित्र में लड़की की उम्र’ और फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा के संस्मरण की तुलना करते हुए, प्रेरणा, प्रभाव और नकल के बीच का महीन अंतर बहुत ही तार्किक ढंग से उठाया गया है। यह विश्लेषण दिखाता है कि रचनाकार को अपने पूर्ववर्ती अनुभवों के प्रति कितना सजग और जिम्मेदार होना चाहिए।
भाषा-शैली की दृष्टि से भी यह आलेख अत्यंत प्रवाहमयी, समृद्ध और पाठक को बांधे रखने वाली है। इसमें साहित्यिक मुहावरों, जैसे ‘साहचर्य शिल्प’ और ‘लीनियर/फ्यूगल फॉर्म’, का सटीक प्रयोग किया गया है, जो आलोचना को जटिल बनाने के बजाय उसे अधिक बोधगम्य और रोचक बनाता है।
लेखक की आकर्षक और लालित्यपूर्ण भाषा का एक उदाहरण द्रष्टव्य है -“निर्मल वर्मा ने ऊपर मुक्तिबोध की कहानियों के आख्यान के जिस स्थिर और मूक चरित्र की बात की है वही उनकी कविता में आश्चर्यजनक गतिशीलता और आवेग के साथ उपस्थित होता है। निर्मल वर्मा ने कहानियों के आख्यान में जमी जिस बर्फ का जिक्र किया है वही कविता में बिजली के करंट की तरह दौड़ने लगती है। बिजली के करंट सा यह आवेग ही ‘अंधेरे में’ के आख्यान को विशिष्ट बनाता है।” (पृष्ठ 108)
किताब को पढ़कर पाठक सहज ही यह समझ पाता है कि साहित्य में आख्यान केवल कहानी कहने की एक शैली नहीं है, बल्कि यह वह आधारभूत धुरी है जिसके माध्यम से रचनाकार अपने युग के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक यथार्थ को एक व्यापक फलक पर अभिव्यक्त करता है। आख्यान की इसी केंद्रीय भूमिका के कारण इसे समझना साहित्य के किसी भी जिज्ञासु के लिए अनिवार्य हो जाता है।
प्रो. दिलीप शाक्य की यह पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आख्यान की आंतरिक संरचना से लेकर उसके ऐतिहासिक विकास और आधुनिक ‘नयी कविता’ में आए क्रांतिकारी बदलावों जैसे सभी सूक्ष्म आयामों पर गहराई से विचार करती है। यह कृति न केवल पारंपरिक प्रबंधात्मक ढांचों के टूटने की प्रक्रिया को स्पष्ट करती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे आज का आख्यान पुराने मिथकों और नायकत्व की छवियों को यथार्थ की ठोस जमीन पर नए सिरे से परिभाषित कर रहा है।
कुल मिलाकर, यह किताब समकालीन हिंदी कविता और उसके आख्यान-विधान को समझने का एक अत्यंत प्रामाणिक और सुंदर प्रयास है। यह किताब अत्यंत पठनीय है, साहित्य के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए एक उत्कृष्ट और मार्गदर्शक सामग्री है।
लेखक: दिलीप शाक्य
किताब: आख्यान और नयी कविता
प्रकाशक: Ember Glow गुड़गांव, हरियाणा – 122017
पृष्ठ: 130
मूल्य : 249 रुपये
यह भी पुस्तक समीक्षा पढ़ें
‘बंगाल में भाजपा’: वामपंथ के गढ़ में भगवा के उदय की कहानी बताने वाली किताब
