नीरज पटेल जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्याल के हिंदी विभाग में एक शोधार्थी हैं। उन्होंने डॉ. संतोष पटेल द्वारा लिखी गई किताब ‘बेड़ियों को तोड़ने की सजा’ की समीक्षा की है। आइए उनके नजरिए से देखते हैं यह किताब किस बारे में हैं और समाज के किन-किन पहलुओं को उजागर करती है।
डॉ. संतोष पटेल मूलतः एक संवेदनशील कवि हैं जो दिल्ली स्थित एक विश्वविद्यालय में सहायक रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत हैं। यह विरोधाभास ही उनकी कविता की ताकत है- एक ओर सत्ता-तंत्र के भीतर बैठा व्यक्ति, दूसरी ओर उसी तंत्र के छल-छद्म को बेनकाब करने वाला कवि। लड़ाई जारी है, नो क्लीन चिट, कारक के चिह्न और अमीबा जैसे संग्रहों की यात्रा के बाद यह नया संग्रह “बेड़ियों को तोड़ने की सजा” उनकी काव्य-चेतना का एक परिपक्व और तीक्ष्ण पड़ाव है।
संग्रह का शीर्षक ही अपने आप में एक राजनीतिक वक्तव्य है। जो बेड़ियां तोड़े, उसे सजा मिले- यह विडंबना सदियों पुरानी है। शीर्षक कविता में कवि लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक जीवन के बहाने उस पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता है जो सामाजिक न्याय के हर प्रयास को षड्यंत्र से कुचलती आई है: “सामाजिक न्याय की बात / मंडल की सौगात / लागू हुआ बराबर अवसर का फरमान / आग लगी तुम्हारे राजकुमार के दिमाग में” और फिर उसी कविता में एक गहरी आश्वस्ति भी है: “बेशक गेहूं को मारने की जाती रही हैं कोशिशें / पर बीज कभी नहीं मरते” यह पंक्तियां केवल एक नेता की कहानी नहीं कहतीं- यह उस पूरे वंचित समाज की जीवटता का रूपक हैं जो दबाया जाता रहा, कुचला जाता रहा, फिर भी उगता रहा।
इस संग्रह की आत्मा जाति-विमर्श में बसती है। संतोष पटेल जाति को एक अमूर्त सामाजिक समस्या की तरह नहीं देखते- वे उसे उसकी क्रूर, रोज़मर्रा की वास्तविकता में पकड़ते हैं। जेल में जाति कविता में वे दिखाते हैं कि समता का दावा करने वाली न्याय-व्यवस्था भी जाति से मुक्त नहीं है: “कैदी की जाति के
मुताबिक / मिलता है उसे काम और आवास / कुछ जातियों को मिलती है सुविधा खास” फिर कैसा भेद? कविता में वे अश्वघोष और सरहपा की परंपरा को याद करते हुए वर्ण-श्रेष्ठता के पूरे ढांचे को ध्वस्त करते हैं। कटहल के पेड़ का रूपक- जिसमें जड़, तना और डाली सब पर एक जैसे फल लगते हैं- इतना सहज और इतना मारक है कि पाठक रुककर सोचने पर विवश हो जाता है। महाराजा की जाति में वे उस राजनीतिक खेल को उघाड़ते हैं जिसमें किसी को सत्ता का मोहरा बनाया जाता है, और जब वह अपनी पहचान का दावा करने लगता है, तो उसी की जाति उसके खिलाफ हथियार बन जाती है।
स्त्री स्वर और हाशिये का कवि संग्रह की सबसे सूक्ष्म और व्यंग्यात्मक कविताओं में एक है। यहां कवि उन साहित्यकारों का मुखौटा उठाता है जो वंचितों की पीड़ा को अपने ड्राइंग रूम में बैठकर “साहित्यिक कच्चा माल” की तरह इस्तेमाल करते हैं। परबतिया और शिवरनिया और चोकट की कहानियां सुनकर मालकिन “महानगर में साहित्य में स्त्री स्वर” बन जाती हैं और मालिक “वंचितों के कवि और हाशिये की आवाज़।” यह व्यंग्य निर्मम है और बिल्कुल सटीक। और तय कर लेते दोष किसका है कविता में यौन हिंसा के प्रति समाज की चयनात्मक संवेदनशीलता पर कवि की कलम सबसे धारदार हो जाती है: “फिर जाति से अपने आप तय कर लिया जाता है / कि किसका दोष है।” इन दो पंक्तियों में एक पूरी सामाजिक सच्चाई समा जाती है।
संतोष पटेल जहां एक ओर भोजपुरी को संविधान की सातवीं अनुसूची में मान्यता दिलाने के लिए संघर्षरत हैं, वहीं उनका यह संग्रह भाषाई वर्चस्व के सवाल को केंद्र में लाता है। नहीं चाहिए विश्वभाषा में वे किसी एक भाषा के वैश्विक आधिपत्य को सीधे नकारते हैं। भाषा के हत्यारे में वे उन लोगों को बेनकाब करते हैं जो मैकाले को गरियाते हुए खुद मैकाले की मानसिकता ओढ़े घूमते हैं। बड़े कवि जरूरी कवि नहीं होते साहित्यिक प्रतिष्ठान पर एक सीधा प्रहार है। वे कहते हैं कि बड़े कवि अकादमी, लिटफेस्ट और पुरस्कारों के गलियारों में तो मिलते हैं, लेकिन- “बड़े कवि होते हैं / जनता के मुद्दों से कोसों दूर, / बहुत दूर।”
संतोष पटेल की कविताओं में रूपक बहुत सहज और देशज हैं- वे किसी बौद्धिक प्रयोगशाला में नहीं बने, बल्कि जीवन की मिट्टी से उगे हैं। मरे तिलचट्टे से चिटियों का प्रेम में अंध-अनुयायिता का जो चित्र है, वह कहीं न कहीं आज की राजनीतिक भीड़ का सटीक प्रतिबिंब है। केचुएं कविता में रीढ़विहीन बुद्धिजीवियों पर चोट है: “पकड़ ली रेंगने की आदत / ताकि सहूलियत से चाटते रहे तलवे” बिपरजॉय में एक चक्रवात के रूपक के ज़रिये कवि दशकों के राजनीतिक दमन और उससे उठने वाले प्रतिरोध को बड़ी कुशलता से चित्रित करते हैं।
इस समूचे राजनीतिक आवेग के बीच मां और जमीन की खुशबू जैसी कविताएं एक मानवीय ठहराव देती हैं। महानगर की भागदौड़ में गांव की याद- कुआं, पोखरा, पकड़ी के पेड़- यह सब केवल नास्टैल्जिया नहीं, बल्कि उस मूल से जुड़े रहने का आग्रह है जहां से कवि की चेतना निर्मित हुई। कुल मिलाकर कह सकते है डॉ. संतोष पटेल का ‘बेड़ियों को तोड़ने की सजा’ एक ऐसा संग्रह है जो असुविधाजनक सवाल पूछता है- सत्ता से, साहित्य से, समाज से और कभी-कभी खुद से भी। संतोष पटेल की कविता में नारेबाजी नहीं है, पर प्रतिबद्धता है। भाषा सरल है, पर विचार तीखे हैं। जो पाठक केवल सौंदर्यशास्त्र की तलाश में आएगा, वह शायद असहज हो जाए। लेकिन जो पाठक अपने समय को समझना चाहता है- उसकी विडंबनाओं को, उसके झूठों को, उसकी संभावनाओं को- उसके लिए यह संग्रह एक ज़रूरी पाठ है।
किताब का नाम: बेड़ियों को तोड़ने की सजा
मूल्य: 260 रुपये
लेखक: डॉ. संतोष पटेल
प्रकाशक: कौटिल्य बुक्स
पुस्तक समीक्षा: श्रीकृष्ण के उपदेशों से पाठकों को परिचित कराता है पुंडरीक गोस्वामी द्वारा किया भगवद गीता का इंग्लिश अनुवाद
अगर आप अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं, तो अपने मन को इस तरह प्रशिक्षित करें कि वह आपके खिलाफ काम न करे। गहराई से सोचने के लिए द्वारा आप मन और विवेक के बीच अंतर समझ सकते हैं। मन कल्पनाओं में उलझता है, जबकि विवेक वास्तविकता में स्थिर रहता है। मन चालाक होता है और हमें… यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी किताब समीक्षा
