इन दिनों पश्चिम बंगाल के चुनाव चल रहे हैं और राजनीति के बदलते परिदृश्य को समझने के लिए यदि किसी एक राज्य को केंद्र में रखकर अध्ययन किया जाए, तो पश्चिम बंगाल एक अत्यंत महत्वपूर्ण केस स्टडी के रूप में सामने आता है। राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील रहे इस सूबे की सियासत में आए बदलावों और उन परिवर्तनकामी वर्षों में भी वामपंथी विचारधारा के मजबूत गढ़ में भाजपा जैसी दक्षिणपंथी पार्टी ने कैसे जड़ें जमाईं उसका बारीक विवरण देने वाली किताब है ‘बंगाल में भाजपा।’
बेशक, आजादी के बाद से ही पहले जनसंघ और फिर भाजपा ने बंगाल पर पैर जमाने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन यह कोशिश सियासी रूप से 2014 के बाद से अधिक स्पष्ट दिखती है। इससे पहले भाजपा बंगाल में आहिस्ता-आहिस्ता अपने वैचारिक पांव फैला रही थी। आखिर, महज 10 साल में एक विधायक से 77 विधायक तक पहुंचने की यात्रा हैरानकुन करने वाली है मगर इसके पीछे लम्बी सियासी साधना है।
पत्रकार मंजीत ठाकुर की पुस्तक ‘बंगाल में भाजपा’ इस राज्य में आजादी के पहले से ही पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, फिर भारतीय जनसंघ और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी के सिर्फ एक दल के रूप में नहीं बल्कि विचारधारा के रूप में जड़े जमाने और साथ ही, सूबे की जटिल राजनीतिक परिवर्तन को समझने का एक गंभीर और शोधपूर्ण प्रयास है।
यह पुस्तक केवल भाजपा के चुनावी प्रदर्शन का ब्यौरा नहीं देती, बल्कि उस व्यापक सामाजिक, ऐतिहासिक और वैचारिक प्रक्रिया को सामने लाती है, जिसके माध्यम से एक समय वामपंथ का अभेद्य किला माने जाने वाले बंगाल में भाजपा ने अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की।
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसका ऐतिहासिक दृष्टिकोण है। लेखक बंगाल की राजनीति को स्वतंत्रता के बाद से लेकर वर्तमान तक क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करते हैं। वामपंथी शासन के लंबे दौर, उसके पतन, तृणमूल कांग्रेस के उदय और फिर भाजपा के विस्तार इन सभी चरणों को लेखक ने विश्लेषणात्मक ढंग से जोड़ा है। दिलचस्प है कि किताब की आधारभूमि 1939 से शुरू होती है जब संघ के पितृपुरुष केशव बलिराम हेडगेवार कलकत्ता (अब कोलकाता) के मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे और साथ ही अनुशीलन समिति के सदस्य भी बन गये।
किताब में ठाकुर यह भी दिखाने की चेष्टा करते हैं कि आखिर देश के बंटवारे के बाद, जब बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक दंगे हुए थे, तब भी बंगाल में ‘हिंदुत्ववादी’ पार्टी भारतीय जनसंघ अपनी जड़ क्यों नहीं जमा पाई। भले ही, जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल में थे और देश के पहले संसदीय चुनाव में इस पार्टी ने ठीक-ठाक प्रदर्शन किया था, लेकिन उसके बाद उसके पांव बंगाल से क्यों उखड़ गए?
इसके साथ ही इस किताब में, इस राज्य में साठ के दशक के अराजक दौर, बार-बार लगने वाले राष्ट्रपित शासन और फिर उसके बाद वाममोर्चे की सरकार के दौर, नक्सलवाद आदि के उदय को छूते हुए इन घटनाओं के प्रति जनसंघ की टेक का विश्लेषण लेखक करते चलते हैं। इस किताब में इस बात का भी उल्लेख है कि बंगाल ही वह भूमि है जहां देश की पहली मॉब लिंचिग की घटना (बिजॉन सेतु हत्याकांड) हुई थी और साथ ही वह बसु की सरकार के समय सुंदर बन के मरीचझापी में हुए बड़े पैमाने के दलित संहार की घटना का भी व्यापक ब्योरा देते हैं।
मंजीत ठाकुर यह स्पष्ट करते हैं कि 2006 के बाद वामपंथ के कमजोर होने से जो राजनीतिक शून्य पैदा हुआ, उसी ने नए विकल्पों के लिए रास्ता बनाया। भाजपा ने इसी शून्य को पहचानकर अपनी रणनीति विकसित की और धीरे-धीरे राज्य की राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण विमर्श ‘राष्ट्रवाद बनाम बंगाली अस्मिता’ का है। लेखक बताते हैं कि भाजपा ने हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और राम मंदिर जैसे राष्ट्रीय मुद्दों को केंद्र में रखकर राजनीति की, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक गौरव को अपनी ताकत बनाया। यह द्वंद्व बंगाल की राजनीति को विशिष्ट बनाता है, और लेखक इसे सरल भाषा में पाठकों के सामने रखते हैं।
पत्रकारिता पृष्ठभूमि का प्रभाव पुस्तक में स्पष्ट दिखाई देता है। चुनावी आंकड़ों, जनाधार में बदलाव और सामाजिक समीकरणों को लेखक ने तथ्यात्मक आधार पर प्रस्तुत किया है। यह इसे केवल विचारधारात्मक लेखन से अलग बनाता है और पाठक को एक ठोस विश्लेषण प्रदान करता है। आंकड़ों की बात की जाए, तो इसमें आजादी के बाद भाजपा के लगभग नगण्य वोट शेयर वाले उम्मीदवारों को भी जिक्र है, जिसकी वजह से यह किताब संदर्भ के लिए अच्छी बन पड़ी है।
पुस्तक में जगह-जगह लेखक की ग्राउंड रिपोर्टिंग की झलक मिलती है। यह केवल सैद्धांतिक चर्चा नहीं, बल्कि जमीनी राजनीति को समझने की कोशिश है। विभिन्न राजनीतिक घटनाओं और परिस्थितियों का वर्णन पाठक को उस समय के माहौल में ले जाता है। आज जब भाजपा पूर्वी भारत में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है, तब यह पुस्तक और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यह न केवल अतीत को समझने में मदद करती है, बल्कि भविष्य की राजनीतिक दिशा का संकेत भी देती है।
बंगाल में भाजपा भारतीय राजनीति के परिवर्तनशील स्वरूप को समझने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह पुस्तक बताती है कि राजनीति केवल चुनावी आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों का परिणाम भी है। इस किताब में बंगाल में राजनीतिक दल-बदल, अमित शाह की बिछाई बिसात, ममता बनर्जी और भाजपा के सियासी गठजोड़, पंचायत चुनावों के आंकड़ों के बारीक विश्लेषण आदि के जडरिए भाजपा की चुनावी यात्रा का दस्तावेजीकरण करने की कोशिश है। खास तौर पर, 2019 लोकसभा चुनावों के दौरान तथा उसके बाद 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की जमीनी तैयारियों का भी जायजा है। मंजीत ठाकुर की यह किताब पत्रकारिता की गहराई और राजनीतिक विश्लेषण का संगम है, जो छात्रों, शोधकर्ताओं और राजनीति में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी है।
लेखक: मंजीत ठाकुर, प्रकाशक- पेंगुइन-स्वदेश, मूल्य- 299/-
