उनके बहु-विशेषज्ञता अस्पताल को बने पांच साल हो गए थे। इस बीच अस्पताल की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी। डॉ. मीरा जो एक स्त्री-रोग विशेषज्ञ थी, ने अपने व्यवसायी पति नीरज की मदद से इस अस्पताल का निर्माण करवाया था। अच्छा इलाज, हर तरह की सुविधाओं और काबिल डाक्टरों के अलावा वहां का माहौल ऐसा था कि मरीजों के प्रति पूरी संवेदना बरती जाती थी। अस्पताल के पांच वर्ष पूरे होने पर एक खास कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर सारे कर्मचारियों को डा. मीरा और उनके पति ने सम्मानित किया था। रात के खाने के बाद ही उन दोनों को फुर्सत मिल पाई।

मीरा घर लौट आई और नीरज कुछ काम से बंगलुरु के लिए रवाना हो गया। बिस्तर पर लेटी वह समारोह के बारे में सोचने लगी, फिर अचानक पुरानी बातें उनके मन-मस्तिष्क पर दस्तक देने लगी। इस समय वह नीरज को याद कर रही थी। नीरज ही तो है जिसने उनकी जिंदगी के हर पृष्ठ पर हिम्मत और कामयाबी की इबारत लिखी है। वही तो है जिसकी वजह से वह फिर से जी उठी थीं और आज एक सफल डाक्टर बन पाई है।

उन दिनों वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास करने के बाद इस बात की प्रतीक्षा कर रही थी कि उन्हें किस मेडिकल कालेज में दाखिला मिलेगा। पापा के लिए जो एक स्कूल में अध्यापक थे, मेडिकल की पढ़ाई का खर्चा उठाना संभव नहीं था। घर की आर्थिक स्थिति से अवगत होने के बावजूद उन्होंने पापा को बहुत मनाने की कोशिश की। पर उन्होंने कहा कि वह विज्ञान लेकर अपनी पढ़ाई पूरी कर ले, डाक्टरी पढ़ना जरूरी नहीं है।

उस समय वह अपने सपनों को टूटते देख इतनी निराश हो गई कि आत्महत्या करने का निश्चय किया। नदी में कूदने के विचार से वह दोपहर को पुल पर जा पहुंची। उस समय न तो ज्यादा लोग थे और न ही वाहन आ-जा रहे थे। वह पुल की दीवार पर चढ़ कर कूदने ही वाली थी कि किसी ने उन्हें पीछे खींच लिया। वह बुरी तरह से कांप रही थी। एक युवक ने उन्हें थामा हुआ था, कोमलता और दृढ़ता से।

‘कोई गारंटी थोड़े ही है कि छलांग लगाओगी और मर ही जाओगी। हो सकता है बच जाओ। लोग तो तुम्हारे मरने के बाद भी बातें बनाएंगे ही, पर बच गई तो खुद को जवाब देना ज्यादा कठिन हो जाएगा। मुझे नहीं पता कि किस वजह से तुम ऐसा कदम उठा रही हो, पर कहलाओगी तो तुम कायर ही।’ उस युवक ने कहा था। एक अनजान युवक से डांट खाकर सचमुच तब बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई थी।

‘इतना बड़ा कदम उठाने का अवश्य ही कोई बड़ा कारण होगा, लेकिन मैं जानना नहीं चाहता। लेकिन मैं तुम्हें तुम्हारे घर अवश्य पहुंचाने जाऊंगा। इस समय तुम्हारी मानसिक स्थिति ऐसी नहीं कि तुम्हें अकेला छोड़ा जाए। हो सकता है पुल से पांव ही फिसल जाए तुम्हारा। तुम्हें बचाने के लिए इतनी मेहनत की है तो घर सही-सलामत छोड़कर आना मेरा दायित्व बनता है।’ इस बार वह मुस्कराते हुए बोला था। वह उस समय वहीं से गुजर रहा था, जब उसने उसे छलांग लगाते देखा था। वह उसे अपनी कार में, जो पुल पर ही खड़ी थी, घर छोड़ आया था।

मां और पापा को जब पता चला कि वह क्या करने वाली थी तो वह हतप्रभ रह गए। युवक को उन्होंने बार-बार धन्यवाद कहा। उसका नाम नीरज था और उसके पिता का एक अस्पताल था। ‘मैं पढ़ना चाहता था, पर न जाने क्यों मन लगा नहीं पाया। मेरे पापा ने कभी डांटा नहीं इस बात के लिए, हालांकि वे चाहते थे कि मैं आइएएस अफसर बनूं। लेकिन उन्होंने मुझे इस बात से हमेशा बचाकर रखा कि इस वजह से मेरे मन में किसी तरह का पछतावा न आए। तभी तो मेरे मन में कभी आत्महत्या करने का ख्याल नहीं आया। आज मैं उनके साथ ही अस्पताल संभालता हूं। उसने बताया तो वह यह सुन आश्चर्यचकित रह गई थी।

वह नीरज से बहुत प्रभावित हुई थी। अच्छा लगा था वह उसे। एकदम सीधा-सादा सा दिखने वाले नीरज की आंखों में एक दृढ़ता थी और चेहरे पर मासूमियत। ऐसा इंसान किसी को धोखा नहीं दे सकता। वह कहना चाहती थी कि क्या वह उसका दोस्त बनना पसंद करेगा, पर वह तो उस समय बोलने की स्थिति में थी ही नहीं। उस अनजान युवक से आंखें भी नहीं मिला पा रही थी। न जाने क्या सोच रहा होगा कि कैसी कायर लड़की है।

अब नियति मीरा के लिए नए द्वार खोल रही थी। घर जाकर नीरज ने जब यह बात अपने पिता को बताई तो उन्होंने न जाने क्या सोचकर मीरा के पापा से मिलने की इच्छा जाहिर की। ‘मैं आपकी बेटी की पूरी मेडिकल शिक्षा के लिए आर्थिक मदद करना चाहता हूं। धन की वजह से किसी की शिक्षा नहीं रुकनी चाहिए, ऐसा मेरा मानना है।’ ‘आपकी सोच का मैं सम्मान करता हूं। पर ऐसा कैसे हो सकता है? मैं आपसे पैसे नहीं ले सकता। अपनी बेटी को पढ़ाना मेरा दायित्व है।’ पापा ने सकुचाते हुए कहा था। ‘ठीक है तो मैं इसे अपनी बेटी बना लेता हूं। नीरज की जीवन संगिनी बनना पसंद करोगी बेटा?’ उन्होंने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा था।

वह पापा को देखने लगी थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि जिंदगी कैसे खेल, खेल रही है। नीरज से शादी, उसके जैसा साथी पाना कौन नहीं चाहेगा? पर पापा ने कहा, ‘यह कैसे संभव है? मानता हूं कि नीरज बहुत अच्छा इंसान है और मैं उम्र भर उसका शुक्रगुजार रहूंगा, लेकिन उसने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी है और मीरा डाक्टर बन जाएगी पांच साल में। ये मेल क्या इन दोनों को खुश रख पाएगा? हो सकता है भविष्य में नीरज के मन में हीन भावना आ जाए और वह मीरा की तरक्की को बर्दाश्त न कर पाए।’

आखिरकार फैसला उन दोनों पर छोड़ दिया गया। वे मिलने लगे। एक-दूसरे का साथ, बातें, यहां तक कि सपने भी एकाकार होने लगे। इन मुलाकातों ने एक-दूसरे को समझने में मदद की। प्यार सहज ही बहुत सारी उलझनों को सुलझा देता है, तब उन्हें एहसास हुआ था। जिंदगी अच्छी लगने लगी थी। वह डाक्टर नहीं बन पाई तो भी अब नीरज के साथ खुशी-खुशी जिंदगी गुजारने का ख्याल उसे सहलाने लगा था।

‘तुम दोनों शादी करना चाहते हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं, पर शादी पांच साल बाद होगी। मीरा की पढ़ाई का खर्च मैं स्वयं उठाऊंगा।’ पापा की खुद्दारी का उन्होंने मान रखा और नीरज ने कहा वह उनका इंतजार करेगा। नीरज का साथ पाकर फिर कुछ भी मुश्किल नहीं रहा था उनके लिए। उसके बाद दोनों ने इस अस्पताल की नींव रखी। जो पैसे नहीं दे सकते, उनका यहां मुफ्त इलाज किया जाता है।

अचानक बेल बजी। मीरा बीती बातों से चौंक कर वर्तमान में आ गई। नीरज था। ‘मन नहीं किया आज तुम्हें छोड़कर जाने का। इसलिए बंगलुरु की अपनी यात्रा स्थगित कर दी।’ नीरज ने उनके गालों को चूमते हुए कहा। मीरा मुस्करा दी। बिना कहे ही उसकी हर कामना पूरी जो होती रही है।