सीमा पर युद्ध की आग धधक रही थी। गोलियों की आवाज, विस्फोटों का शोर और चारों ओर फैला भय-सब कुछ जैसे जीवन को निगल जाने पर आमादा था। उसी अफरा-तफरी में एक छोटा-सा लड़का, जिसकी उम्र मुश्किल से आठ-नौ साल रही होगी, अपने परिवार से बिछुड़ गया। उसका नाम नीरव था। उस दिन की आखिरी याद उसके मन में धुंधली सी रह गई-मां का कांपता हाथ, पिता की आवाज, ‘भागो आरव…पीछे मत देखना’, फिर एक तेज धमाका। जब होश आया, तो वह एक अजनबी जगह पर था, बिल्कुल अकेला।
शुरुआत में वह बहुत रोया, हर चेहरे में अपने माता-पिता को खोजा। लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आ गया कि अब उसे खुद ही अपना रास्ता बनाना होगा। भूख ने उसे सिखाया कि आंसू पेट नहीं भरते। एक दिन वह शहर के एक छोटे-से होटल के बाहर खड़ा था। मालिक ने उसे देखा और पूछा, ‘काम करेगा?’ नीरव ने बिना कुछ सोचे सिर हिला दिया।
बस, यहीं से उसके संघर्ष की शुरुआत हुई। वह दिन भर बर्तन धोता, फर्श साफ करता और रात को थक कर कोने में सो जाता। हाथों की कोमलता कब कठोरता में बदल गई, उसे पता ही नहीं चला। लेकिन, उसके अंदर एक जिद थी-कुछ बनने की, कुछ कर दिखाने की। होटल के पास ही एक रात्रि विद्यालय था। एक दिन उसने हिम्मत करके वहां दाखिला ले लिया। दिन में काम, रात में पढ़ाई-यही उसकी दिनचर्या बन गई। थकान उसके शरीर को तोड़ देती, लेकिन उसका हौसला नहीं। काम के दौरान जो थोड़ा बहुत समय खाली मिलता, उसकी किताब उसके हाथ में ही रहती थी। उसके लिए पढ़ाई एक जुनून बन चुकी थी। किताबों में ही वह अपनी किस्मत देखता था।
वक्त बहुत तेजी से गुजरा। बर्तन धोने वाला वही लड़का अब होटल में काम करने लगा था। लोगों को खाना परोसते हुए वह उनकी बातों से दुनिया को समझने लगा। बचपन से लेकर अब तक वह एक बात रोज सोचता, ‘क्या मेरे माता-पिता भी मुझे ढूंढ रहे होंगे?’ यह सवाल उसके दिल में चुभता रहता, लेकिन उसने इस चुभन को अपनी ताकत बना लिया।
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रात्रि स्कूल से उसने अच्छे अंक हासिल किए और फिर कालेज में दाखिला लिया। कालेज की पढ़ाई के साथ-साथ उसने और मेहनत की। उसकी आंखों में अब एक सपना साफ दिखने लगा था-प्रशासनिक सेवा में जाने का। कई वर्षों की कठिन तपस्या के बाद, वह दिन भी आया जब नीरव ने सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। उसकी मेहनत रंग लाई, वह एक आइएएस अधिकारी बन गया। जब उसने पहली बार अपने नाम के साथ ‘आइएएस’ लिखा देखा, तो उसकी आंखें भर आईं। उसे लगा, जैसे वह अपने माता-पिता से कह रहा हो-देखो, मैंने हार नहीं मानी। समय बीतता गया। अब वह एक जिले का कलक्टर था। वह अपने काम में ईमानदारी और संवेदनशीलता के लिए जाना जाता था।
कार्यालय में आने वाले हर वृद्ध व्यक्ति में अपने पिता को खोजता था। एक दिन उसके कार्यालय में एक बूढ़ा आदमी आया। उसके कपड़े मैले, जगह-जगह से फटे हुए थे, फटे कपड़ों में से कई जगह जख्म साफ दिखाई दे रहे थे। आंखों में बेचैनी थी। वह बार-बार एक ही बात कह रहा था, ‘साहब, मेरा बेटा खो गया है’ उसे ढूंढ दीजिए।’
कार्यालय के कर्मचारियों ने उसे पहचान लिया। एक कर्मचारी ने हल्की हंसी के साथ कहा, ‘सर, ये बुजुर्ग पगला गया है। पिछले बीस वर्षों से हर महीने यहां आता है और अपने बेटे को ढूंढने की फरियाद करता है। भला इतने सालों में कोई बिछुड़ा हुआ भी मिल सकता है?’
नीरव ने उस बुजुर्ग की ओर देखा। उसकी आंखों में दर्द था, लेकिन साथ ही एक अटूट उम्मीद भी।
‘उसे अंदर भेजिए।’ नीरव ने शांत स्वर में कहा।
बूढ़ा आदमी कांपते कदमों से अंदर आया।
‘साहब…मेरा बेटा युद्ध में बिछुड़ गया था। उसका नाम नीरव है। जब खोया था, तब आठ-नौ साल का था।’
यह सुनते ही नीरव का दिल जोर से धड़कने लगा। जैसे किसी ने उसके अतीत के दरवाजे खोल दिए हों।
‘आपका नाम?’ आरव ने धीमे स्वर में पूछा।
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‘मेरा नाम रघुवीर है’।
यह नाम सुनते ही आरव की आंखों में आंसू आ गए। यही तो उसके पिता का नाम था।
कुछ क्षणों के लिए कमरा बिल्कुल शांत हो गया।
आरव अपनी कुर्सी से उठा, धीरे-धीरे उस बूढ़े के पास गया और कांपती आवाज में बोला-
‘बाबा…क्या आप मुझे पहचानते हैं?’
बूढ़े ने उसे ध्यान से देखा। उसकी आंखें धुंधली हो चुकी थीं, लेकिन दिल अब भी अपने बेटे की पहचान जानता था।
‘न…नहीं…लेकिन…तुम्हारी आवाज’।
नीरव ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया,
‘मैं ही आपका नीरव हूं बाबा।’
जैसे ही ये शब्द उसके कानों में पड़े, बूढ़ा आदमी एक पल के लिए जड़ हो गया। फिर उसकी अांखों से अश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी।
‘मेरा…मेरा बेटा…।’
वह नीरव से लिपट गया। दोनों फूट-फूटकर रोने लगे। वह रोना केवल खुशी का नहीं था, बल्कि उन बीस वर्षों की पीड़ा, अकेलेपन और इंतजार का था।
कार्यालय के सभी कर्मचारी यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। जिसे वे पागल समझते थे, वह तो एक पिता था-जिसकी उम्मीद ने समय को भी हरा दिया था।
कुछ दिनों बाद नीरव ने जल्दी ही अपनी मां को भी खोज निकाला, जो एक आश्रय गृह में रह रही थीं। परिवार फिर से एक हो गया। युद्ध में वे बिछड़ गए थे, लेकिन उनके प्रेम और विश्वास ने उन्हें फिर से मिला दिया। बिछड़ने के बाद से दोनों ने एक दिन के लिए भी अपनी उम्मीद नहीं छोड़ी थी। पिता और पुत्र दोनों को यकीन था कि एक न एक दिन वे जरूर मिलेंगे। उस दिन नीरव ने अपने कार्यालय के बाहर खड़े होकर आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा, ‘संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा हो, अगर उम्मीद जिंदा हो, तो हर बिछड़ा हुआ उजाला एक दिन जरूर लौट आता है।’
