यमुना के किनारे प्रयागराज से कुछ दूर एक ऐसी जगह है, जिसे आज भीटा के नाम से जाना जाता है। यहां कोई भव्य इमारत नहीं है, न किसी पुराने राजमहल के खंडहर दूर से दिखाई देते हैं। लेकिन इसी साधारण-सी जमीन के नीचे कभी एक ऐसा नगर बसा था, जिसकी गलियों में लोग आते-जाते थे, घरों में चूल्हे जलते थे, कारीगर चीजें बनाते थे, व्यापारी लेन-देन करते थे और मुहरों से सामान और संदेशों की पहचान होती थी।

सदियां बीतीं तो नगर मिट्टी में दब गया। उससे भी ज्यादा अजीब बात यह हुई कि उसका असली नाम भी इतिहास की पकड़ से छूट गया। आज भीटा के नाम से पहचानी जाने वाली इस जगह की प्राचीन पहचान को लेकर पुरातत्वविदों के बीच भी पूरी निश्चितता नहीं है।

खुदाई ने खोला नगर का नक्शा

भीटा की कहानी इसलिए भी असाधारण है क्योंकि भारतीय पुरातत्व के इतिहास में इसकी खुदाई को एक खास मोड़ माना गया। पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक जॉन मार्शल ने 1909-10 के अपने विवरण में लिखा कि भीटा में की गई खुदाई प्राचीन भारतीय नगर के अवशेषों को व्यवस्थित रूप से समझने की दिशा में एक नई शुरुआत थी। जिस समय यह खुदाई हुई, तब तक भारत में अनेक प्राचीन स्थलों की पहचान तो हो चुकी थी, लेकिन किसी प्राचीन नगर के घरों, गलियों और रोजमर्रा के जीवन को इतनी बारीकी से देखने का अवसर बहुत कम मिला था।

भीटा की तरफ पुरातत्व की नजर हालांकि पहली बार 1909 में नहीं गई थी। जनरल अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1872 में यहां के प्राचीन अवशेषों का उल्लेख किया था। उन्होंने भीटा को जैन परंपरा में उल्लिखित एक पुराने नगर से जोड़ने की कोशिश की थी। बाद में मार्शल को यहां मिले अभिलेखों और मुहरों के आधार पर लगा कि इस नगर का संबंध विच्छि या विच्छिग्राम नाम से हो सकता है। लेकिन यह पहचान अंतिम नहीं है। यही वह जगह है जहां भीटा की कहानी दूसरे प्राचीन नगरों से अलग हो जाती है – यहां खंडहर मौजूद हैं, नगर का जीवन दिखाई देता है, लेकिन उसका निश्चित प्राचीन नाम अब भी एक सवाल है।

खुदाई ने जिस नगर को सामने रखा, वह किसी छोटे गांव जैसी बसावट नहीं थी। पुरातात्त्विक अध्ययनों में भीटा को एक संगठित, सुरक्षित और व्यापारिक गतिविधियों वाले नगर के रूप में देखा गया है। यहां नगर की सुरक्षा के लिए परकोटे और बुर्जों के अवशेष मिले। खुदाई में सड़कें सामने आईं, जिनमें हाई स्ट्रीट और बैस्टियन स्ट्रीट जैसे रास्तों की पहचान की गई। घर सड़कों के आसपास व्यवस्थित थे और कुछ भवनों में आंगन के चारों ओर कमरे बने थे। कुओं और ईंट से बने जल-निकास की व्यवस्था के प्रमाण भी मिले। यानी आज से दो हजार साल से भी अधिक पहले यहां रहने वाले लोग सिर्फ मकान बनाकर नहीं रहते थे; उन्होंने अपने रहने, आने-जाने और पानी की जरूरतों के लिए एक व्यवस्थित नगरीय ढांचा तैयार किया था।

मुहरों में दर्ज था कारोबार का संसार

भीटा की सबसे रोचक चीजों में से एक हैं यहां मिली मुहरें और मुहरों की मिट्टी की छापें। ब्रिटिश लाइब्रेरी के अभिलेख में 1909-10 की खुदाई से जुड़ी तस्वीरों में अधिकारियों, गिल्डों और निजी व्यक्तियों की टेराकोटा सीलिंग दर्ज हैं। इसका अर्थ केवल इतना नहीं है कि यहां लोग मुहरों का इस्तेमाल करते थे। इन मुहरों ने उस नगर के प्रशासन, व्यापार और सामाजिक जीवन की एक झलक भी बचा ली।

इन मुहरों में ऐसे संकेत मिलते हैं जो अधिकारियों, धार्मिक संस्थाओं, व्यापारिक समूहों और निजी व्यक्तियों से जुड़े थे। कुछ मुहरों पर ‘निगम’ या गिल्ड से संबंधित संकेत मिले हैं। यही कारण है कि भीटा को केवल खेती पर निर्भर बस्ती मानना कठिन है। यहां वस्तुओं का उत्पादन, उनका लेन-देन और संगठित व्यापारिक गतिविधियां रही होंगी। कुछ अध्ययनों में भीटा से मिले सामान और मुहरों के आधार पर इसे शुरुआती ऐतिहासिक काल के व्यापारिक नगरों की महत्वपूर्ण कड़ी माना गया है।

फिर सवाल उठता है कि इस नगर में रहने वाले लोग आखिर करते क्या थे?

मिट्टी से इसका भी कुछ जवाब मिलता है। खुदाई से मिले मृद्भांड, टेराकोटा की आकृतियां, आभूषणों के अवशेष, पत्थर की वस्तुएं, लोहे के औजार और दूसरी चीजें बताते हैं कि यहां जीवन कई तरह के कामों से जुड़ा था। टेराकोटा की मूर्तियों और सिरों से उस समय की कला और लोगों के पहनावे-सजावट की झलक मिलती है। अलग-अलग प्रकार के मनकों की मौजूदगी भी इस बात की ओर संकेत करती है कि सौंदर्य और आभूषण यहां के जीवन का हिस्सा थे। ब्रिटिश लाइब्रेरी के अभिलेख में खुदाई से मिली टेराकोटा आकृतियों, मुहरों, मृद्भांडों, पत्थर के औजारों और अन्य वस्तुओं की अनेक तस्वीरें सुरक्षित हैं।

भीटा की कहानी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष इसकी धार्मिक विविधता है। खुदाई में मिले अवशेषों और मुहरों से ब्राह्मण परंपराओं से जुड़े प्रमाण सामने आए हैं। शिव से संबंधित प्रतीकों और धार्मिक संस्थाओं की मुहरों के साथ विष्णु से जुड़े संकेत भी मिले हैं। कुछ बौद्ध अवशेष भी इस व्यापक सांस्कृतिक संपर्क की ओर इशारा करते हैं। इससे यह तस्वीर बनती है कि यह नगर किसी एक धार्मिक पहचान में बंद नहीं था, बल्कि उस समय की बदलती और परस्पर जुड़ी धार्मिक-सांस्कृतिक दुनिया का हिस्सा था।

प्रयागराज के ‘संगम तीरे’ स्तंभ में अन्य फीचर लेखों को पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक

भीटा की प्राचीनता को समझने में बाद की खुदाई भी महत्वपूर्ण है। 1996-97 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने यहां छोटे स्तर पर फिर खुदाई की। इसका उद्देश्य विशेष रूप से उस सांस्कृतिक स्तर को समझना था जो उत्तरी काली चमकीली मृद्भांड परंपरा यानी Northern Black Polished Ware (NBPW) से पहले का था। रिपोर्ट में सबसे शुरुआती स्तर पर लगभग 20 सेंटीमीटर की परत में ब्लैक-स्लिप्ड वेयर का उल्लेख है, जिसे लगभग आठवीं-सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व का माना गया। इसके ऊपर लगभग 1.75 मीटर की परत में NBPW से जुड़ा सांस्कृतिक क्रम मिला, जिसे सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व के आरंभ से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक का माना गया।

इसका मतलब यह है कि भीटा की कहानी सिर्फ कुषाण या गुप्त काल की नहीं है। इसके नीचे उससे भी पुरानी बसावट की परतें मौजूद हैं। यही परतें बताती हैं कि यमुना के इस किनारे पर नगर-जीवन अचानक पैदा नहीं हुआ था। यहां बसावट, व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों का विकास लंबे समय में हुआ।

और यहीं से भीटा का रिश्ता आसपास के बड़े प्राचीन नगरों से जुड़ता है। एक तरफ यमुना के किनारे कौशाम्बी जैसी विशाल नगरी थी, दूसरी ओर गंगा-यमुना के संगम के पास प्रयाग और झूंसी का पुराना भूगोल था। इन सबके बीच भीटा एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण पड़ाव रहा होगा। आधुनिक नक्शे में यह जगह भले ही किसी बड़े नगर का हिस्सा दिखाई दे, लेकिन पुरातत्व की नजर से देखें तो यहां कभी स्वतंत्र नगरीय जीवन के प्रमाण मौजूद थे। UNESCO की सिल्क रोड से संबंधित सामग्री भी भीटा को प्रारंभिक ऐतिहासिक काल के उन स्थलों में रखती है जहां खुदाई से नगर के स्वरूप और उसके व्यापारिक जीवन को समझने में मदद मिली।

लेकिन इस कहानी में सबसे ज्यादा बेचैन करने वाला सवाल फिर भी वही है – उस नगर का नाम क्या था?

कनिंघम ने एक पहचान प्रस्तावित की थी। बाद में मार्शल ने यहां मिले अभिलेखों के आधार पर विच्छि या विच्छिग्राम की संभावना जताई। लेकिन इतिहास ने अभी तक इस संभावना को अंतिम मुहर नहीं दी है। यानी जिस नगर की गलियां, घर, कुएं, मुहरें और कारीगरों की बनाई चीजें मिट्टी के भीतर से सामने आ गईं, उसका अपना नाम आज भी निश्चित रूप से हमारे सामने नहीं है।

शायद यही भीटा का सबसे बड़ा रहस्य है।

इतिहास ने यहां के नगर की इमारतों को पूरी तरह नहीं बचाया, लोगों के नाम भी बहुत कम बचे और नगर की पहचान भी धुंधली हो गई। लेकिन मिट्टी ने वह सब बचा लिया जिसे लिखित इतिहास बचा नहीं सका – किस रास्ते से लोग चलते थे, किस तरह के घरों में रहते थे, किस चीज का व्यापार करते थे, किन वस्तुओं पर मुहर लगाते थे, कौन से औजार इस्तेमाल करते थे और किन धार्मिक प्रतीकों को मानते थे।

भीटा इसलिए सिर्फ खंडहर नहीं है। वह उस समय की एक ऐसी मिट्टी में बंद नागरिक डायरी है, जिसके ज्यादातर पन्ने अब भी पढ़े जा सकते हैं – बस उस डायरी के पहले पन्ने पर लिखा नगर का नाम अब तक साफ नहीं हुआ है।

यमुना के किनारे आज भीटा एक आधुनिक भूगोल का हिस्सा है। लेकिन उसके नीचे एक ऐसा नगर अब भी मौजूद है, जिसने अपने नाम को भले ही खो दिया हो, अपनी कहानी नहीं खोई। पुरातत्व ने उस कहानी के कुछ पन्ने खोल दिए हैं। बाकी पन्ने शायद अभी भी उसी मिट्टी के नीचे हैं।

यह भी पढ़ें: मिट्टी के नीचे सोया शहर और उसे जगाने वाला इलाहाबाद विश्वविद्यालय का इतिहासकार | संगम तीरे

इतिहास कभी-कभी बहुत शांत होता है। वह न कोई आवाज करता है, न किसी को पुकारता है। सदियां गुजर जाती हैं। उसके ऊपर खेत बन जाते हैं। लोग घर बना लेते हैं। रास्ते निकल आते हैं। बच्चे खेलते हैं। बैलगाड़ियां गुजरती हैं। फिर भी इतिहास वहीं पड़ा रहता है – बिल्कुल चुप। कौशाम्बी भी सदियों तक ऐसी ही खामोशी में रहा। प्रयागराज से पश्चिम की ओर बढ़िए। यमुना का मैदान धीरे-धीरे खुलता है। कहीं ऊंचे-नीचे टीले दिखाई देते हैं। पहली नजर में वे किसी साधारण भूभाग का हिस्सा लगते हैं। लेकिन इतिहासकार की नजर सामान्य नहीं होती। वह मिट्टी के रंग में भी समय की परतें पढ़ लेती है। पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक