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18 वां भारंगम : प्रथम चरण : बर्बरता और मानवीय संवेदनाओं का सूक्ष्म रेखांकन है ‘डियर चिल्ड्रन, सिंसियरली’

‘डियर चिल्ड्रन, सिंसियरली’ की नाटककार व निर्देशक हैं रुवान्थी दे चिकेरा। उनका यह नाटक तीन चरणों में मानवीय बर्बरता और संवेदनाओं का सूक्ष्म रेखांकन दर्शकों के सामने प्रस्तुत करता है।

Author नई दिल्ली | February 14, 2016 11:31 PM
bharangam festival 2016, NSD, bharangam festival, Delhiनाटक एंटिगनी का एक दृश्य।

भारंगम के प्रथम चरण के नाटकों में जिन नाटकों का उल्लेख किया जा सकता है वे हैं – रामायण (रंगश्री लिटिल बैले ट्रूप, भोपाल की प्रस्तुति), एंटिगनी (स्वपन संधान, कोलकाता की प्रस्तुति), जानकी परिणय (मैथिली लोक रंग, मधुबनी, बिहार की प्रस्तुति), कबीर (शिल्पकार, मुंबई की प्रस्तुति), डियर चिल्ड्रन, सिंसियरली (स्टेज थिएटर ग्रुप, श्रीलंका), मशीरिका (रवांडा की प्रस्तुति), धुलिया ओझा (उत्सा असोम, तिनसुकिया की प्रस्तुति), मेरा वो मतलब नहीं था (एक्टर प्रिपेयर्स प्रोडक्शंस, मुंबई की प्रस्तुति), इला (द पैचवर्क एन्साम्बल, मुंबई की प्रस्तुति) और डियर फादर (आंगीकम, मुंबई की प्रस्तुति)। पर इन सबमें दो नाटकों का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है. पहला ‘डियर चिल्ड्रन, सिंसियरली’ और दूसरा ‘एंटीगनी’। ये दोनों नाटक हर लिहाज से बेहतरीन थे, चाहे हम निर्देशन की बात करें, संगीत-नृत्य की बात करें, वेशभूषा की बात करें, क्राफ्ट और डिजाइन की बात करें या फिर मानवीय संवेदनाओं को उकेरने और समकालीनता से उसके जुड़ाव की बात करें।

‘डियर चिल्ड्रन, सिंसियरली’ की नाटककार व निर्देशक हैं रुवान्थी दे चिकेरा। उनका यह नाटक तीन चरणों में मानवीय बर्बरता और संवेदनाओं का सूक्ष्म रेखांकन दर्शकों के सामने प्रस्तुत करता है। पहला चरण ‘सेवन डिकेड्स डीप’ 1930 से 90 के दशकों के दौरान दो देशों में घटी विशिष्ट घटनाओं पर आधारित है। दूसरा चरण ‘लव, सेक्स एंड मैरिज’ अनिवार्यत: एक सूक्ष्म अंतर्दृष्टि है कि किस तरह हमारे वरिष्ठों ने जीवन के इन पहलुओं का अवलोकन किया और इनका अनुभव किया। तीसरा चरण ‘अपसाइड डाउन लैंड’ रवांडा और श्रीलंका की सबसे बड़ी समानता नृशंसता और आतंकवाद के कलंकित काल की मंचीय व्याख्या प्रस्तुत करता है। रवांडा ने 100 दिनों का जनसंहार देखा है और श्रीलंका ने जेवीपी के रक्तपात और 1983 के दंगे। ‘अपसाइड डाउन लैंड’ वो भूमि है जहां लूटपाट और बर्बरता आम जीवन के तरीके हैं।

यह पूरा नाटक संवादों, साक्षात्कारों, शोध और बहसों पर आधारित है। निर्देशक और अभिनेताओं ने मिलकर बर्बरता और नृशंसता का जो चित्रण किया है वह न सिर्फ काबिले तारीफ़ है बल्कि हृदय विदारक और रोंगटे खड़े कर देने वाला है। विशेषकर वह दृश्य जिसमें यह दिखाया गया है कि विरोधी पक्ष की स्त्रियों का बलात्कार करने के लिए दूसरे पक्ष के पुरुषों की एक लंबी कतार खड़ी रहती थी और वे बारी-बारी से एक महिला का बलात्कार करते थे। इतना दारुण दृश्य है यह कि बरबस आंखों से आंसू बह निकालते हैं।

निर्देशक का इस नाटक के बारे में कहना है- 1990 के दशक का जगत, आज के जगत से अलग संसारों का है। हमारे बुजुर्गों का संबंध एक ऐसे युग से रहा जिसके मूल्यों और अनुभवों ने उस दुनिया का निर्माण किया जो हमारी आज की दुनिया है। वे जातीय संघर्षों, जनसंहार की दहशत के बीच जीए – उन्होंने विवाह, यौनाचार और प्रेम के कानून गढ़े, जिनमें हम आज भी बंधे हुए हैं। अपने समाज को फूट, अन्याय, हिंसा, बगावत, विद्वेष के हाथों, उन्होंने औंधे मुंह गिरते देखा। उनमें से कुछ ने बदलाव की सीमाओं को परे धकेला, दूसरों ने इसका प्रतिरोध किया, बाकी इससे दूरी बनाए निर्लिप्त खड़े रहे। आठ दशक इस जगत के, परिवर्तन के, अनुभव के, खोने और कुछ पाने के, क्या सीखा उन्होंने, किस बात का अफसोस है उन्हें, क्या कहना चाहते हैं हमसे, इससे पहले कि वे विदा हों – इन्हीं बातों का सूक्ष्म विश्लेषण और उनकी व्याख्या करता है यह नाटक।

नाटक की कोरियोग्राफी और नृत्य-संरचना कमाल की थी जिसे स्टेज थिएटर ग्रुप, श्रीलंका और माकेरेरे विश्वविद्यालय, कपाला के नृत्य और संगीत के विद्यार्थियों ने कुशलता से अंजाम दिया था। आदिम और जनजातीय संगीतात्मक धुनों और वाद्ययंत्रों के कुशल प्रयोग से उस समय की नृशंसता और बर्बरता को मंच पर कुशलता से उकेरा गया था। जयमपति गुरगे की प्रकाश परिकल्पना और पेमांथी फेर्नेंडो के ध्वनि संचालन ने इस नृत्य आधारित प्रस्तुति को और प्रभावशाली बना दिया था। सभी अभिनेताओं और नर्तक-नर्तकियों के बीच अद्भुत समन्वय था।

दूसरा उल्लेखनीय नाटक रहा निर्देशक कौशिक सेन का बांग्ला नाटक ‘एंटिगनी’। कौशिक ने इसे समकालीन संदर्भों में कमाल के क्राफ्ट और डिजाइन के साथ प्रस्तुत किया और पूरे विश्व में सत्ता हथियाने की जो भूख है, उसे अपने नाटक के माध्यम से रेखांकित किया। नाटक इजराइल सहित उन तमाम देशों की स्थिति को स्पष्ट करता है जो इस सत्ता लोलुपता के शिकार हुए हैं। अपने निर्देशकीय में भी कौशिक कहते हैं कि ‘एंटिगनी’ नाटक पर काम करते हुए सैकड़ों बार मैंने सोचा कि क्यों हजारों साल पुराना नाटक आज भी प्रासंगिक लगता है? क्या इसका कारण नाटक की साहित्यिक गुणवत्ता है या फिर लेखक की बौद्धिकता जो अनागत को भी देख लेती है? ज्ञान, जिसने इस बात को परख लिया कि सदियों और दशकों के उपरांत भी घृणा का खत्म न होना तय है और सत्ता हथियाने की भूख मनुष्य को हमेशा अंधकार की तरफ ही ले जाएगी। अंधकार जो रात से भी ज्यादा स्याह होगा। एंटिगनी की भूमिका में रेशमी सेन ने शानदार अभिनय किया है। (मंजरी श्रीवास्तव)

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