अगर हम आज से पांच सौ वर्ष पहले की किताबों की तरफ नजर डालें, तो एक सुकूनभरी बात दिखाई देती है। उस समय जो भी ग्रंथ, धार्मिक पुस्तकें, साहित्य, इतिहास, दार्शनिक रचनाएं या वैज्ञानिक खोज पर आधारित पुस्तकें लिखी गईं, वे आज भी किसी न किसी पुस्तकालय, आश्रम, संग्रहालय या निजी संग्रह में प्रकाशित या छपे हुए रूप में उपलब्ध हैं।
कागज पर छपी इन किताबों का यह स्थायित्व हमें यह भरोसा देता है कि ज्ञान की धारा बिना रुके पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहेगी। मगर जब हम आज के इंटरनेट युग को देखते हैं, तो तस्वीर कुछ उलट दिखाई देती है। आज लाखों नहीं, करोड़ों पन्नों के बराबर सामग्री केवल इंटरनेट पर मौजूद है। ऐसे तमाम लेख, शोधपत्र, ई-बुक, ब्लाग, पत्रिकाएं और किताबें हैं, जिनका कोई प्रिंट संस्करण नहीं है।
वे केवल एक ‘फाइल’ के रूप में ‘सर्वर’ पर टंगी हुई हैं। अगर किसी दिन साइबर अपराध, हैकिंग, तकनीकी हादसे या डिजिटल व्यवस्था के ध्वस्त होने या फिर किसी वेबसाइट के संचालक द्वारा ही किसी कारण से उसे हटा लेने जैसी किसी अप्रत्याशित घटना ने इन फाइलों को निगल लिया, तो क्या हम उन किताबों से सदा के लिए वंचित हो जाएंगे?
यह प्रश्न सिर्फ तकनीकी नहीं, सांस्कृतिक, शैक्षिक और सभ्यतागत भी है। मानव सभ्यता हमेशा से अपने ज्ञान-भंडार पर टिकी रही है। आज जिस भी शास्त्र, ग्रंथ, उपनिषद, काव्य-संग्रह, महाकाव्य या वैज्ञानिक शोध का हम हवाला देते हैं, वे सब कभी न कभी हाथ से लिखे गए पन्नों या छपी हुई किताबों के रूप में संरक्षित किए गए थे। समय के थपेड़ों, युद्धों, आक्रमणों और प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद, इनका कुछ न कुछ हिस्सा बचा रहा और उसी से नई पीढ़ियों ने आगे का रास्ता बनाया।
झूठा भरोसा
इंटरनेट के आने के बाद हमने यह मान लिया कि अब तो सब कुछ सुरक्षित है। बादलों में टंगी ‘क्लाउड स्टोरेज’ ने हमें एक झूठा भरोसा दे दिया कि अब किसी चीज के खोने का डर नहीं। पर सच यह है कि डिजिटल डेटा जितना सुविधाजनक है, उतना ही नाजुक भी है। एक ‘वायरस’, एक रैनसमवेयर या एक वैश्विक स्तर का साइबर हमला, बिजली या सैटेलाइट व्यवस्था में किसी बड़े व्यवधान या फिर कुछ बड़ी तकनीकी कंपनियों के व्यावसायिक निर्णय, इन सबमें से कोई भी एक घटना हमारी डिजिटल विरासत को खतरे में डाल सकती है। यहां एक और विडंबना है। पांच सौ साल पहले की किताबें न तो किसी ‘पासवर्ड’ की मोहताज थीं, न किसी साफ्टवेयर अद्यतन की।
बस अलमारी से निकाला और पढ़ लिया, लेकिन आज की ई-किताबे किसी खास स्वरूप में बंद हैं, किसी कंपनी के ‘सर्वर’ पर पड़ी हैं, किसी ‘एप’ पर निर्भर हैं, या किसी ‘भुगतान पर आधारित ग्राहकी’ के पीछे कैद हैं। कल अगर वह कंपनी बंद हो जाए, एप चलना बंद कर दे, या ग्राहकी का स्वरूप बदल जाए, तो उसी क्षण हमारे हाथ से कितनी ही डिजिटल किताबें गुम हो सकती हैं।
सुरक्षा का सवाल
यह सच है कि कई प्रतिष्ठित पुस्तकालय, विश्वविद्यालय और संस्थान ‘डिजिटल आर्काइव’ बना रहे हैं। ‘डिजिटल पुस्तकालय’ की अवधारणा अपने आप में सराहनीय है। प्रश्न यह है कि क्या इन डिजिटल भंडारों की उतनी ही सुरक्षा और दीर्घायु सुनिश्चित की गई है, जितनी कागज पर छपी पुस्तकों की स्वाभाविक दीर्घायु होती है! एक पुरानी किताब पर धूल जम सकती है, पन्ने पीले पड़ सकते हैं, किनारे फट सकते हैं, लेकिन जब तक उसका मूल ढांचा बचा है, तब तक उसमें दर्ज ज्ञान जीवित रहता है। जबकि एक ‘करप्ट’ यानी खराब हो गई फाइल, एक खराब ‘हार्ड डिस्क’ या मिट गया सर्वर, ज्ञान को एक झटके में शून्य में बदल सकता है।
सवाल यह भी उठता है कि ज्ञान का असली घर कहां है- कागज पर, स्क्रीन पर, या मनुष्य की चेतना में? मान लिया जाए कि किसी स्वतंत्र लेखक ने एक महत्त्वपूर्ण शोध-ग्रंथ केवल ई-बुक के रूप में प्रकाशित किया, जिसे हममें से हजारों लोगों ने अपने मोबाइल या लैपटाप पर डाउनलोड कर रखा है। अब अगर किसी बड़े साइबर हमले में इंटरनेट सेवा व्यापक स्तर पर ठप हो जाए, या यंत्रों का डेटा नष्ट हो जाए, तो उस लेखक की सारी मेहनत इतिहास से गायब हो सकती है।
सहयात्री बनाएं
इस संदर्भ में एक और चिंता यह है कि डिजिटल सामग्री को बदलना और छेड़छाड़ करना कागज की किताबों की तुलना में कहीं आसान है। किसी वेबसाइट की सामग्री बिना निशान छोड़े सुधारी, बदली या गायब की जा सकती है। ऐसे में अगर किसी शक्ति-संपन्न संस्था ने इतिहास, साहित्य या विचारधारा को अपने अनुरूप ढालने का निश्चय कर लिया, तो डिजिटल सामग्री उसका सबसे आसान शिकार बनेगी। जबकि मुद्रित किताबों को पूरी तरह बदल देना उतना सरल नहीं होता। तो क्या इंटरनेट युग में किताबों का हश्र विनाश या विस्मृति है?
अगर हम सचेत नागरिक, जागरूक पाठक, जिम्मेदार लेखक और दूरदर्शी नीति-निर्माता बनें, तो इंटरनेट युग ज्ञान-संरक्षण का ‘सुनहरा युग’ भी बन सकता है। बस सामान्य पाठक भी केवल ‘सेव’ और ‘डाउनलोड’ पर भरोसा न करे, बेहद महत्त्वपूर्ण पुस्तकों को कागजी रूप में घर या स्थानीय पुस्तकालय में उपलब्ध रखने की संस्कृति को समर्थन दे।
किताबें सिर्फ कागज या स्क्रीन नहीं होतीं, वे मानवीय स्मृति और संवेदना की वाहक होती हैं। इंटरनेट की सुविधा के इस युग में स्थायित्व की चिंता भूल जाना, आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा। पांच सौ वर्ष पहले लिखी गई किताबें आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रही हैं। इंटरनेट युग में किताबों का हश्र कैसा होगा, यह तकनीक नहीं, हमारी सामूहिक समझ और प्राथमिकताएं तय करेंगी।
अगर हम केवल तात्कालिक सुविधा के पीछे भागेंगे, तो कल ज्ञान का आकाश हमारे हाथ से फिसल सकता है, लेकिन अगर हम सजग रहते हुए प्रिंट और डिजिटल दोनों को सहयात्री बनाकर चलें, तो यह युग आने वाली पीढ़ियों के लिए अभूतपूर्व ज्ञान समृद्धि की विरासत छोड़ सकता है।
