अथर्व की परीक्षाएं खत्म हो चुकी थीं। अब स्कूल में छुट्टियां चल रही थीं। इसलिए वह अपनी बुआ के घर आया हुआ था। बुआ के घर पर एक छोटा सा बगीचा था। उसमें आम, अमरूद, जामुन, अनार, नींबू, तुलसी, कनेर, गुलाब, गुड़हल के पेड़ थे। बुआ ने बगीचे को बहुत साफ-सुथरा रखा हुआ था। वे पेड़-पौधों पर बहुत ज्यादा मेहनत करती थीं, जिससे बगीचे में जाते ही वहां का नजारा देख कर किसी का भी मन खुश हो जाता था।
सातवीं कक्षा में पढ़ने वाला अथर्व उस बगीचे में जाकर अपना होमवर्क किया करता था। उसका घर एक अपार्टमेंट में था। वहां बालकनी में कुछ गमले लगे थे। इसलिए यह हरा-भरा सुंदर बगीचा उसका मन मोह लेता था। बुआ की अपने कामों में एक व्यस्त दिनचर्या रहती थी। मगर अथर्व की तो बगीचे में अलग ही सुबह, दोपहर, शाम हुआ करती थी।
अथर्व का स्कूल खुलने वाला था। उसके पास अब एक ही दिन का अवकाश और बचा था। इसलिए अपने घर लौटने के पहले हरे-भरे बगीचे में कुछ गुनगुनाता हुआ अथर्व सुबह से ही वहां बैठा हुआ था। इस बीच उसने हिंदी की कविता तथा सामाजिक विज्ञान का सबक भी दोहरा लिया था। उसे इतनी गंभीरतापूर्वक पढ़ाई करता देखकर दो गिलहरी उसे धौल-धप्पा देकर वापस आम के पेड़ पर चढ़ गई थीं। किट-किट के सुर अथर्व का मन भी संगीतमय कर रहे थे कि अचानक तितलियों का झुंड लहराता हुआ आया।
सुनहरी, भूरी, पीली, चटख बैंगनी, सफेद, चितकबरी और भी जाने कितनी सारी तितलियां कहीं से उड़ती हुई आईं और गुलाब के नरम फूलों पर मंडराने लगी। उन्हें देख कर लग रहा था कि वह उन गुलाबों से गपशप कर रही हैं। ‘काश! मैं इनकी भाषा समझ पाता तो कितना अच्छा होता!’ अथर्व मन ही मन सोचने लगा। इस समय तो यह प्यारा सा वातावरण अथर्व को इतना मनमोहक लग रहा था कि उसका मन बल्लियों उछल रहा था। आज उसे इतना आनंद आ रहा था, जितना पिछले जन्मदिन पर खिलौना रोबोट मिलने पर भी नहीं आया था। इन तितलियों की अठखेलियां देख-देखकर उसका चेहरा खुशी से दमक रहा था।
कौतुहलवश वह चुपचाप उनके पीछे-पीछे टहलने लगा। मगर तितलियां तो उससे अनजान अपनी ही मौज-मस्ती में खोई हुई थीं। शायद वह भांप गई थी कि अथर्व से कोई खतरा नहीं है, इसलिए वे उसके सिर के आसपास मंडराने लगीं। तभी कुछ कुत्ते बाहर सड़क पर जोर से भौंकने लगे। शायद, अपने शिकार बिल्ली पर उनकी नजर पड़ गई थी। यह रंग में भंग हो गया।
कोमल दिल की नन्ही सी तितलियां भौंकने की आवाज से घबरा गईं। उनके मंडराने की निरंतरता को टोक लग गई। किसी अनजाने खतरे से डरकर वे सभी अलग-अलग बिखर गईं। एकाध तो कहीं छिप भी गईं। यह देखकर अथर्व के सीने में जैसे कोई कांच सा चुभा। ‘ओह, तो, इसका मतलब अब ये तितलियां घबराकर चली जाएंगी।’ सोचकर, अचानक अथर्व का दिल टूटने सा लगा। कितना लुभावना मौसम था। अभी वह सारी तितलियों के रंग तक ठीक से, मन भरकर देख भी न पाया था। उसका मन हुआ कि पत्थर मारकर इन आवारा कुत्तों को कहीं दूर खदेड़ कर आ जाए। मगर उसकी शिक्षिका ने किसी भी जीव-जंतु को डराने, मारने, सताने के लिए मना किया था।
अथर्व का दिल धड़कने लगा। तितलियों की भाषा का एक भी शब्द उसे आता तो वह पूरी कोशिश करता, और उनको समझा देता-‘आप सब बेफिक्र रहिए। ये जमीन पर चलने वाले श्वान आपका बाल भी बांका नहीं कर सकते। आप तो नीले अंबर की परी हैं। बादलों की मित्र। आप पर तो आंच भी नहीं आएगी।’ मगर वह मन में ही कह पाया था। काश कि ये तितलियां उसके मन की भाषा पढ़ना जानती? वह आंखें मूंदकर प्रार्थना कर ही रहा था कि एक छोटा सा दूधिया रंग का बिल्ली का बच्चा वहां आ गया। छोटी सी कत्थई आंखें थीं उसकी। लग रहा था कि दर्जी ने दो गोल बटन टांक रखे हों।
वह शायद उन कुत्तों से बचता-बचाता, छिपता-छिपाता आ गया था। उसकी म्याऊं-म्याऊं की आवाज से अथर्व का दिल पिघल गया। उसने बिल्ली के बच्चे को गोद में लिया और उसे पुचकारते हुए कोई कविता गाने लगा। बिल्ली का बच्चा गरदन इस तरह हिला रहा था, मानो सब सुन रहा है और समझ भी रहा है। अथर्व एक पल के लिए तितलियों को भूल गया था।
तभी गिलहरी की आवाज आई। अथर्व ने गरदन ऊपर उठाकर इधर-उधर देखा। तितलियों का पूरा झुंड वहीं था। गिलहरियों के साथ उनके निराले ही खेल हो रहे थे। अथर्व का बुझता हुआ दिल एक बार फिर खुशी की फुहार में भीगने लगा। वह भीतर जाकर कटोरे में दूध ले आया। गिलहरियों के लिए बिस्कुट के चूरे ले आया। गिलहरियों की भी दावत हो गई थी। दूध पीकर वह नन्हा सा बिल्ली का बच्चा अब अथर्व की गोद में सो रहा था। तितलियां अभी तक वहीं थीं। अब तो अथर्व मन भरकर देख रहा था। सुनहरी, गुलाबी, पीली, चटख, बैंगनी, सफेद, चितकबरी और भी जाने कितनी सारी प्यारी तितलियां ही तितलियां।
