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युवाओं को पारंगत करने के लिए कलाकारों का समागम

सत्रीय नृत्य सिर्फ नृत्य नहीं है, यह संपूर्ण जीवन शैली है और इसमें चौसठ कलाओं के अंश समाहित हैं। यह धर्म और भक्ति का मार्ग है। नृत्य में धर्म के मार्ग पर चल कर हम भक्ति के लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।

Author June 7, 2019 1:14 AM
गुरु घनाकांत बोरा ने अपनी प्रस्तुति का आरंभ किया।

शशिप्रभा तिवारी

इन दिनों स्पिक मैके का अंतरराष्ट्रीय समागम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में चल रहा है। इस समागम का उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ एम जगदीश कुमार, स्पिक मैके संस्थापक डॉ किरण सेठ, समागम की अध्यक्ष ऊषा रविचंदर ने किया। इस अवसर पर हुए समारोह में सत्रीय नृत्य गुरु घनाकांत बोरा मुक्तियार ने पेश किया। साथ ही, विदुषी ए कन्याकुमारी ने वायलिन वादन पेश किया।

समय की पाबंदी के कारण गुरु घनाकांत बोरा ने अपनी प्रस्तुति का आरंभ शंकर देव रचित कीर्तन घोष की एक रचना से किया। इसमें विष्णु के दस अवतारों का वर्णन था। गुरु घनाकांत ने हस्तकों, अभिनय और भंगिमाओं के जरिए कृष्ण के वासुदेव, देवकीनंदन, गोपाल, कुमार, गोविंद रूपों को दर्शाया। प्रस्तुति काफी सुगठित और मनोरम थी। सत्रीय नृत्य के बारे में गुरु धनाकांत बोरा ने बताया कि सत्र में प्रशिक्षण के दौरान गुरु कड़े अनुशासन में शिष्यों को रखते हैं। वहां सुबह चार बजे से ही प्रार्थना, खोल वादन और नृत्य सिखाना शुरू हो जाता है।

सत्रीय नृत्य सिर्फ नृत्य नहीं है, यह संपूर्ण जीवन शैली है और इसमें चौसठ कलाओं के अंश समाहित हैं। यह धर्म और भक्ति का मार्ग है। नृत्य में धर्म के मार्ग पर चल कर हम भक्ति के लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। अपने इष्ट के प्रति जब हम पूर्ण समर्पित होते हैं तभी हमारे नृत्य में भावना यानी पवित्रता एवं चमक पैदा होती है। गुरु घनाकांत बोरा के इन्हीं भावों को शिष्या अन्वेषा मोहंता ने भी पेश किया। अन्वेषा ने सत्रीय के नाट्य व अभिनय पक्ष को अपनी प्रस्तुति में उभारा। उन्होंने मथुरा विजय नृत्य रचना पेश की। यह राग गौरी और कई तालों में निबद्ध थी। इसमें नृत्यांगना अन्वेषा ने कृष्ण के जीवन से जुड़े कई प्रसंग-कुब्जा, असुर मल के साथ युद्ध, गोवर्धन लीला व कंस वध को चित्रित किया।

स्पिक मैके के संस्थापक डॉ किरण सेठ ने कहा कि हमारा मुख्य उद्देश्य आज के युवाओं को भारतीय सांस्कृतिक, परंपरा और उसके मूल से परिचित कराना है। ताकि, युवा अपनी संस्कृति के गरिमापूर्ण सौंदर्य और समृद्ध कलाओं की वैभवशाली महिमा को सिर्फ जाने ही नहीं, बल्कि उसे आत्मसात भी करे। यह सच है कि आज के युवा कलाकारों में वह चिंतन-मनन और साधना नहीं है, जो शास्त्रीय संगीत के लिए जरूरी है। पुरानी पीढ़ी के लोगों में यह गुण था।

सातवां समागम आठ जून तक चलेगा। इस दौरान कई नृत्य गुरु जैसे-सरोजा वैद्यनाथन, जयराम व वनश्री राव, घनाकांत बोरा, भारती शिवाजी, रागिनी चंद्रशेखर, कविता द्विवेदी, रानी खानम, गीतांजलि लाल व मुन्ना शुक्ल ने शास्त्रीय नृत्य की विभिन्न शैलियों के तकनीकी पक्ष से छात्र-छात्राओं को परिचित करा रहे हैं। देश भर के विभिन्न स्कूल-कॉलेज के करीब 1500 विद्यार्थी इस सांस्कृतिक पहल के साक्षी बन रहे हैं।

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