दक्षिण एशिया की सुंदर पर्वतीय घाटियों में से एक है स्वात घाटी। ऊंचे पहाड़, हरी-भरी वादियों, नदियों और झीलों के कारण इसे पूर्व के स्विटजरलैंड का भी खिताब दिया गया है। अपने अद्वितीय भूगोल के कारण स्वात घाटी गांधार सभ्यता का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनी। बौद्ध स्तूपों और पुरातात्विक अवशेषों के कारण यह इलाका एक ऐतिहासिक पूंजी है।
कुदरती खूबसूरती के साथ यह क्षेत्र प्राचीन बौद्ध, सूफी और पश्तून लोक परंपराओं के लिए भी प्रसिद्ध है। बौद्ध परंपरा वाली अपलाल नाग-राजा की कथा स्वात घाटी के साथ कई अन्य इलाकों में अलग-अलग तरीके से सुनाई जाती है।
कहा जाता है कि बहुत समय पहले स्वात घाटी के ऊपरी भाग में एक विशाल नाग रहता था। कहीं-कहीं पर इस नाग को जल-ड्रैगन के रूप में भी दिखाया जाता रहा है। नाग का नाम अपलाल था। मान्यता थी कि अपलाल अपनी शक्ति से जलस्रोतों और वर्षा पर नियंत्रण रखता था। स्थानीय लोग उसका सम्मान तो करते थे, लेकिन उसकी इस शक्ति से भयभीत भी रहते थे। आम लोग अपलाल को खुश रखने के कई जतन करते थे।
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उसे अन्न और फल भेंट किए जाते थे, ताकि उसकी कृपादृष्टि से समय पर बारिश हो और लहलहाती फसल उगे। धीरे-धीरे लोगों ने अपलाल को भेंट चढ़ानी कम कर दी। अपनी उपेक्षा से अपलाल क्रोधित हो गया। उसने घाटी में भयंकर तूफान, बाढ़ और विनाशकारी वर्षा करवानी शुरू कर दी। लोगों की फसलें नष्ट हो गईं। लोग इस संकट को खत्म करने के उपाय खोजने लगे।
अपलाल के क्रोध ने स्वात घाटी के अस्तित्व पर संकट ला दिया। जनता के कष्ट की सूचना गौतम बुद्ध तक पहुंची। उन्होंने तय किया कि वे अपलाल का सामना कर उसके हिंसक रूप को शांत करवाएंगे। बुद्ध स्वात घाटी पहुंचे। उन्होंने अपलाल को समझाया कि क्रोध और प्रतिशोध से किसी का कल्याण नहीं होता है। बुद्ध की करुणा और उपदेश से अपलाल को अपनी गलती का अहसास हो गया। उसने गौतम बुद्ध को वचन दिया कि अब वह घाटी को नष्ट नहीं करेगा। जो अपलाल घाटी के विनाश पर तुला हुआ था, अब वही वहां का रक्षक बन गया।
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आज के दौर में यह कथा उस वक्त के इतिहास की याद दिलाती है जब स्वात क्षेत्र बौद्ध संस्कृति का महत्त्वपूर्ण केंद्र था। इतिहासकारों का मत है कि यह कहानी पुराने जल-देवताओं की मान्यताओं और बाद में आए बौद्ध प्रभावों का संगम है। पर्यावरण संकट के इस दौर में इन कथाओं की उपयोगिता और बढ़ जाती है।
हमारा इतिहास, हमारी लोक-संस्कृति बताती है कि इस धरती पर हर सभ्य सभ्यता के लोग प्रकृति पूजक रहे हैं। नदी-जल-वर्षा हमारे अस्तित्व के मूल में हैं। पर्यावरणविदों का मानना रहा है कि बौद्ध परंपरा प्रकृति के ज्यादा निकट है। हिंसा और करुणा के उपदेश मनुष्य को प्रकृति के निकट ले जाते हैं। मनुष्य जितना अहिंसक होगा, वह प्रकृति को उतना ही कम नुकसान पहुंचाएगा।
