घंटी के घनघनाते ही गणेशीलाल ने अपने कदम केबिन की ओर तेजी से बढ़ाए। रोहित सर ने फाइल पकड़ाते हुए मुक्ता मैडम को देने का आदेश दिया। फाइल की मोटाई बता रही थी कि यह काम तीन दिन में तो किसी हालत में नहीं हो सकता था। आदेश तीन दिन में ही खत्म करने का था। यह कैसी खुन्नस थी, जो रोहित सर मुक्ता मैडम को काम पर, काम दे कर निकाल रहे थे।
दरअसल, मुक्ता ने ‘इनबाक्स’ में उनके द्वारा भेजे गए फूलों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। एक रविवार रात दस बजे सर ने शराबनोशी कर के मुक्ता को होटल में बुलाया, मुक्ता ने बात सुनी और फोन काट दिया। यह बात मुक्ता किसी को कह नहीं पाई, और सर से कन्नी-सी काटने लगी। बताने का मतलब बवाल और सिर पर लेना था। आखिर रोहित उसके लाइन मैनेजर थे, और यहां काम करना उसकी मजबूरी थी।
जल्दी ही कोई हफ्ते भर में मुक्ता का दूसरी ब्रांच में ट्रांसफर हो गया। हो गया या कर दिया गया पता नहीं, लेकिन उसने राहत की सांस ली। उसकी जगह अब नई नियुक्ति नेहा की हुई। सर के साथ पहली मीटिंग हुई, काम समझा गया। सर ने फोन नंबर दिया और नेहा का नंबर अपने फोन में सुरक्षित कर लिया। सर की स्थिति कंपनी में मजबूत थी, यह बात नेहा उनके अपने बास से बात करने के तरीके से ही भांप रही थी।
इसलिए अपने और सहयोगियों से बात करते हुए वह अक्सर ही कहती थी कि रोहित सर के सिर पर तो भगवान का हाथ है। भगवान का हाथ मतलब? मतलब उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। वे अपने बास के खास आदमी हैं। उनकी गद्दी एकदम सिक्योर है। इसलिए सर बेफिक्र रहते थे। नए-नए सर बने थे, इसलिए उनका गुरूर आसमान से बात करता था। दिन में कई बार अब रोहित सर घंटी बजाते, गणेशीलाल दौड़कर आता, फिर नेहा मैडम को किसी न किसी काम के बहाने केबिन में बुलाया जाने लगा।
दो-तीन दिन के बाद नेहा को समझ आने लगा कि सर जिस काम के लिए उसे बार-बार केबिन में बुलाते हैं, वह इतने महत्त्व का तो है नहीं। उसे तो पता है कि इस काम को कैसे करना है फिर ये बार-बार बुलाकर काम समझाना, कितना काम हो गया? कितना काम बाकी है? कितने दिन में हो जाएगा? ऐसा क्यों कर रहे हैं? यह सब उसके दिमाग में घूमने लगा।
सर अब उसे हर काम पूरा करने पर बधाई के संदेश भेजने लगे। कुछ दिनों में बात शुभरात्रि तक पहुंची। अब शुभरात्रि का जवाब नेहा भी देने लगी। सर, अब खुश थे नेहा से। नेहा शहर में नौकरी के चलते अकेली रहती थी। सर अब नेहा के घर जाने की जुगत में थे, लेकिन सीधे जाना भी तो उनकी थोथी गरिमा को कम करता था। इसलिए अपने केबिन में नेहा को बुलाकर बात काम से आगे बढ़ाकर उसकी रुचियों, घर के सदस्यों आदि तक बढ़ाने लगे। अगले सप्ताह नेहा का जन्मदिन था। फेसबुक ने एक दिन पहले ही ध्यान दिला दिया था। पत्नी और बच्चे बेडरूम में सो चुके थे। सर उस दिन ड्राइंग रूम में नशे में धुत्त रात बारह बजने का इंतजार कर रहे थे।
नेहा के फोन पर बारह बजे घंटी बजी। सर ने बधाई दी और बोले, कल तो पार्टी होगी। जी सर, नेहा ने शुक्रिया के साथ जवाब दिया। होटल मैंने बुक कर लिया है, सरप्राइज पार्टी है। मैं ही अपनी ब्रांच के लोगों को पार्टी के लिए बोलूंगा, तुम मत बोलना कहकर उन्होंने फोन रख दिया। नेहा को लगा कि यह तो खुशी की बात है, लेकिन सर के लहजे में जो वह महसूस कर रही थी वह उसे असहज कर रहा था। फिर उसे लगा कि शायद वह गलत समझ रही है। सर का तो भरा-पूरा परिवार है मां-बाप, पत्नी, बच्चे सब।
यह मेरी कंपनी में पहली नौकरी है, और इस तरह की कंपनियों में काम करने का मेरा कोई अनुभव भी नहीं है। इसलिए हो सकता है मैं ही कुछ गलत सोच रही हूं। इतना खुलापन मैंने देखा नहीं है। जो भी हो, पर बारह बजे के बाद नेहा की आंखों में नींद नहीं आई। खिड़की से देखा तो अंधेरा छंट रहा था। सुबह के साढ़े पांच बजे थे। वह बुदबुदाई, एक घंटा सो लेती हूं।
अगले दिन सर छुट्टी पर थे। आफिस में दिन भर काम के बाद शाम आठ बजे अपनी जन्मदिन पार्टी के लिए वह स्कूटी पर निकली। होटल के बाहर ही सर मिल गए, लेकिन आफिस का कोई भी कर्मचारी नहीं था। उसने अपने सहयोगियों के लिए पूछा तो सर बोले, सबको नहीं बोला है। हम पांच-छह लोग ही हैं। पार्टी ऊपर है, मैंने बड़ा रूम बुक कर लिया है। तुम कहो तो चलकर देख लें? नेहा को पहले से कुछ बताया नहीं गया था इसलिए उसके मन में पार्टी को ले कर उत्सुकता थी। वह सर के पीछे-पीछे चल दी।
सर रूम में घुसे और नेहा के रूम में घुस जाने के बाद उन्होंने दरवाजे की चिटकनी ऊपर सरका दी। नेहा एकदम से घबरा गई। वह अब सर की बांहों में थी। उसके दांत भिंचने लगे। घबराहट में उसने रोहित को धक्का दिया, चिटकनी खोलकर सीढ़ियों की तरफ दौड़ी, और स्कूटी उठाकर घर भागी। स्वागत-कक्ष पर बैठे होटल कर्मियों को कुछ गड़बड़ होने का अहसास हुआ। उनमें से एक ऊपर कमरे पर गया और घंटी बजाई। दरवाजा खुलने पर सामने खड़े लड़के ने विनम्रतापूर्वक पूछा, ‘सर, चाय या रात का खाना?’ ‘बस, चाय।’ लड़का लौट आया।
अब नेहा के दिल में घबराहट, घृणा और असुरक्षा के भाव कौंधने लगे। वह समझ गई कि यहां काम करना है तो इनकी बात माननी पड़ेगी। लेकिन यह मुझसे होगा नहीं। घर से बाहर निकलना कुंए से निकलना था, लेकिन यह तो खाई में गिरना है। यह नहीं होगा मुझसे, और काम करना है तो इसे स्वीकारना होगा जो मुझसे होगा नहीं। इन सबके बीच ही वह हिचकोले खा रही थी।
शाम को नेहा ने अपनी मां को फोन किया। मां यह कंपनी बंद हो सकती है, इसलिए मुझे दूसरा काम ढूंढ़ना पड़ेगा। घर में उसकी कमाई से मदद मिली थी। लेकिन मां क्या कहती? नेहा अब आफिस नहीं जा रही थी। लाइन मैनेजर होने के बावजूद उसने सर को छुट्टी की सूचना नहीं दी। राजनीतिशास्त्र की विद्यार्थी होने, कुछ पत्रकारिता और सामाजिक संस्थाओं में दोस्तों के होने से उसमें हिम्मत आई। चौथे दिन उसने आफिस जा कर अपनी कंपनी की ‘आइसीसी सेल’ को सारा माजरा बताकर ‘पाश कमेटी’ में केस फाइल किया। संशय था कि अब उसकी नौकरी जा सकती है।
तहकीकात के तीन महीनों में कई बार बैठकें हुईं। रोहित सर के बारे में अन्य महिला सदस्यों से भी पूछताछ की गई। मुक्ता को भी अपनी बात कहने का मंच मिला तो इससे नेहा के मामले को और बल मिला।
अंतत: ‘पाश कमेटी’ ने नेहा के हक में निर्णय सुनाया और रोहित सर नौकरी से बाहर हो गए। इसके बाद दफ्तर की महिला सदस्यों ने थोड़ी राहत की सांस ली। मुक्ता और नेहा को लगा, सच में यहां महिलाएं सुरक्षित हैं। यहां महिलाओं की बात सुनी जाती है।
