फोन में अलार्म बजने के साथ ही नींद टूटी, कितनी देर हो गई आज आंख नहीं खुल रही। हाथ-मुंह धोकर जल्दी से रसोई में जाकर बत्तियां जलाई और दरवाजा खोला। सामने वाले घर की खिड़की पर नजर ठहर गई। अठारह साल में आज पहली बार था कि वह खिड़की बंद और अंधेरी थी। सुबह उठते ही रोजाना सबसे पहले बीबी की रसोई से ही सुबह हो जाने का पता चलता था। अंकल को नाश्ते में एक मिनट की भी देरी बर्दाश्त नहीं थी। सुबह उठकर नहाने, पूजा करने के बाद सात बजे नाश्ता करना और आठ बजे फैक्टरी खोलना। पूजा करने के बाद मेज पर खाना नहीं लगा होता तो अंकल सीधे फैक्टरी में बैठ जाते।

ऐसा भी नहीं था कि फैक्टरी कोई घर से दूर थी। घर में ही बाहर का एक कमरा फैक्टरी के नाम था जिसमें औरतें बुनाई का काम करती थीं। ठेकेदार माल देकर जाता और सामान तैयार होने पर मजदूर भेजकर सामान उठवा लेता और नया आर्डर दे जाता। बेटे-बहू दो मंजिला इमारत के ऊपरी हिस्से में रहते थे। अंकल की समय की पाबंदी के चलते ही बहू से उनकी एक दिन न बनी, सो आते ही अलग कर दिया। बीबी को भी बहू का साथ नसीब नहीं हुआ।

उनकी रसोई से निकलता धुआं मुझे अक्सर उनकी ख्वाहिशों की भाप सा महसूस होता। पर आज वो धुआं गायब था। उस रात को जब गुन्नो का फोन आया तो वह इतनी घबराई हुई थी कि न वह बता पाई और न मैं पूछ पाई कि आखिर बात क्या है? बस फोन पर पीछे से आ रही बीबी की आवाज ही कान में गूंजती रही कि उससे मेरी बात करा, बात करा मेरी। बस गुन्नो ने इतना बोला कि मां को कोरोना हो गया है, सांस नहीं आ रही। तुमसे बात करना चाहती हैं, लेकिन सांस नहीं ले पा रहीं, बोलेंगी कहां से? आवाज सुना दी न उसकी, बीबी को ये कहकर गुन्नो ने फोन रख दिया। मैं बार-बार फोन मिलाती रही, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। आधी रात को गुन्नो ने फोन करके बताया कि बीबी चली गई। उस दिन कुछ रीता हो गया था भीतर से, शायद मन।

उस दिन जाड़े की दोपहर में बीबी घर के बाहर बनी सीढ़ियों पर बाल खोलकर जब धूप लगा रही थीं, तब उनके चांदी से चमकते बाल धूप से चमक की लड़ाई करते मालूम पड़ रहे थे। मैं कपड़े सुखा रही थी। ओ माधुरी, काम नहीं निपटा अभी तक, नीचे कब आएगी बीबी ने अपनी परिचित मुस्कान से पूछा। नहीं बीबी, बेटा अभी सोया है, सोचा कपड़े फैला दूं जल्दी से, उठ जाएगा तो कपड़े नहीं सुखा पाऊंगी। मेरे पास छोड़ जाया कर न उसे, मैं रख लूंगी। छोटे बच्चों के साथ घर संभालना आसान काम नहीं। मेरे दोनों बच्चे मेरे घर से ज्यादा बीबी के आंगन में खेले होंगे।

‘आज आप अकेली बैठी हो, हिटलर अंकल कहां हैं?’ मैंने चुटकी ली। ‘पंजाब गए हैं, गांव में उनके मामे पूरे हो गए हैं। तीन-चार दिन लगेंगे आने में उन्हें।’ तो बीबी हमारे साथ हरिद्वार चलो, मकर संक्रांति पर गंगा जी में डुबकी लगवा लाती हूं, पीछे से आती घूम्मो ताई ने कहा। गली में नाम है घूम्मो ताई का अपने घूमने के शौक के चलते। गली की औरतों की मंडली बना ली है उन्होंने, हर महीने कभी कहीं कथा सुनने, कभी संगम नहाने, कभी कहीं तीर्थ यात्रा करने में हमेशा व्यस्त रहती हैं।

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बीबी का खूब मन होता उनके साथ जाने का, बाहर दुनिया देखने का, गीत-कीर्तन करने सुनने का, लेकिन अंकल के सामने वह कहना तो दूर पूछ भी न पाती। ‘ना, घूम्मो तूू ही घूम, इनको पता चल गया तो ऐसा घूमने भेजेंगे कि कभी घर में न घुसने देंगे।’ ‘बीबी इतना प्यार करते हैं अंकल कि कहीं जाने ही नहीं देते।’ मेरी बात शायद चुभी। बीबी बोली, ‘पता है, मेरा बड़ा मन होता था बचपन से ही घूमने का। बारह-चौदह साल की रही होंगी जब शादी हुई। जिस दिन शादी होकर ससुराल में आई, सूरज मेरे बाद ही जगा। भोर से पहले ही जगने का नियम मेरे लिए तय था। घूमने जाना तो दूर, मायके जाने के लिए भी मिन्नतें करनी पड़ती थी।

अगर मना कर दिया तो दोबारा कहने, पूछने का तो सवाल ही नहीं। कभी-कभी लगता है कि रब ने क्या केवल नौकर बनाने के लिए ही पैदा किया था। जब मेरा छोटा भाई गुजरा तो पति ने केवल इसलिए मुझे घर नहीं भेजा कि वह इनकी मां की मौत का अफसोस करने पंजाब से दिल्ली नहीं आया था। किसी ने ये नहीं देखा कि जब आने के साधन ही नहीं थे, तब वह कैसे आ पाता? मैं बहुत रोई थी उस समय, खूब लड़ी भी थी लेकिन ये आदमी जरा न पिघला।’

मैं बोली, ‘बीबी तुम गई क्यों नहीं, उस पल में भी अंकल का हुकुम माना।’ ‘मन की सुनने के लिए हथेली में चवन्नी होनी चाहिए माधुरी। शिकायत के बरक्स सिर पर छत और रोटी में से मुझे एक को चुनना था। मैंने रोटी और छत रख ली। वादा दे दिया भाई को कि रब ने चाहा तो ऊपर ही मिल लूंगी उससे।’ मैं जानती हूं वो मुझसे रूठेगा नहीं, कहकर बीबी उठकर घर के भीतर चली गई। पहली बार था कि बीबी मुझसे पहले उठी थी और वो आखिरी दिन भी था जब मैंने बीबी को उस घर के भीतर जाते देखा था।

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गुन्नो का रात में फोन आने के बाद वो बीबी का पीठ फेरकर जाना बार-बार आंखों के सामने घूम रहा था। अच्छा होता, वो उस दिन अंकल का कहना न मानती और न जाती उनके साथ। शायद आज यहां जिंदा तो होती। बीबी के लाख मना करने के बाद भी इलाज के लिए अंकल जिद करके गुन्नो के घर गए, बेटी-दामाद के घर नहीं जाना चाहती थी बीबी लेकिन अंकल की जिद ही जीती। अचानक गली में गाड़ी के तेज हार्न की आवाज से माधुरी चौंकी। कोरोना से गलियों में इतना सन्नाटा पसर गया था कि महज छींकने की आवाज भी दूर तक कांपती रहती थी।

बीबी का दाह-संस्कार करके आने के बाद अंकल बेटे के साथ गाड़ी से उतरे। बीमार, बूढ़ा शरीर, झुके कंधे, रो-रोकर थकी और सूजी आंखें। जैसे-तैसे सहारे से वे घर के अंदर गए। उस दिन के बाद अंकल कभी घर के बाहर नहीं दिखे। अब वह बहू की बनाई रोटियां ही खा लेते थे, समय की कोई पाबंदी नहीं थी। क्योंकि अब उसे मानने वाली बीबी ही नहीं थी।

एक दिन हिम्मत जुटाकर मैं अंकल से मिलने चली ही गई। इंतजार से भरी आंखों से वह कुर्सी पर बैठे कभी दरवाजे पर तो कभी रसोई में देख रहे थे। ‘अंकल कैसे हैं?’ इतना सुनते ही उनकी आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी। ‘तुम्हारी बीबी मुझे अकेला छोड़कर चली गई, हमेशा मेरी हर बात मानी। मैं जानता हूं कि मैं एक अच्छा साथी नहीं हूं, इतना करीब होने के बावजूद मैं उसे कभी जान नहीं पाया।

अंकल तह से खुल रहे थे, कुछ मिनट बैठने का इरादा करके गई मैं कई घंटे बस बैठी ही रह गई। सहज से रिश्तों को अक्सर हम पहेली बना देते हैं। किसी के चले जाने के बाद अपने व्यवहार का पछतावा प्रेम है या जीवन से आराम के निकल जाने का दुख? बहुत सारे सवाल और बैचेनी लेकर मैं घर वापस आई। सांझ ढल चुकी थी। चाय का पतीला गैस पर रखा और पति से पूछा, ‘क्या आप चाय लेंगें?’