आज स्टार्टअप, फाउंडर, फंडिंग, नेटवर्क और बिजनेस इकोसिस्टम की भाषा है; लेकिन कारोबार को बाजार, हुनर, संगठन, संपर्क और भरोसे से जोड़ने की जरूरत नई नहीं। गंगा-यमुना के मैदान की प्राचीन नगरीय दुनिया में आधुनिक कारोबारी माहौल की कुछ बुनियादी धड़कनें अपने समय की भाषा में पहले से मौजूद थीं।

आज किसी नए कारोबार की शुरुआत होती है तो उसके साथ कुछ शब्द लगभग अपने आप चले आते हैं – स्टार्टअप, फाउंडर, फंडिंग, नेटवर्क, मार्केट, ब्रांड और इकोसिस्टम। किसी नए कारोबारी विचार को अब सिर्फ एक व्यक्ति का सपना नहीं माना जाता। उसके आसपास निवेशक, कर्मचारी, सलाहकार, तकनीक, ग्राहक, बाजार, कारोबारी संगठन और संपर्कों का पूरा संसार खड़ा होता है। इसी पूरे संसार को आज की भाषा में ‘स्टार्टअप इकोसिस्टम’ कहा जाता है।

लेकिन कारोबार की यह दुनिया जितनी नई दिखाई देती है, उसकी बुनियादी जरूरतें उतनी नई नहीं हैं। करीब दो हजार साल पीछे चलें तो न स्टार्टअप शब्द था, न फाउंडर, न वेंचर कैपिटल और न ‘इकोसिस्टम’ जैसा कोई आधुनिक कारोबारी मुहावरा। फिर भी किसी चीज को बनाना, उसे बाजार तक पहुंचाना, दूसरे लोगों के साथ मिलकर काम करना, अपनी पहचान और भरोसा कायम करना और कारोबार को टिकाए रखना – ये जरूरतें तब भी थीं।

फर्क शब्दों का था, जरूरतों का नहीं। और इन जरूरतों के निशान उस विशाल भूगोल में मिलते हैं जिसे आज हम गंगा-यमुना का मैदान कहते हैं। यहां नदियों के किनारे नगर उभरे, नगरों के भीतर बाजार बने, बाजारों के साथ कारीगर और व्यापारी जुड़े, व्यापारियों और शिल्पकारों ने संगठन बनाए और इन नगरों को दूर-दूर तक जाने वाले स्थल और जलमार्गों ने जोड़ दिया।

यही वह जगह है जहां आज का ‘स्टार्टअप इकोसिस्टम’ एक आधुनिक उपमा बनकर अतीत को समझने का रास्ता खोलता है। यह कहना गलत होगा कि दो हजार साल पहले स्टार्टअप थे। वे नहीं थे। लेकिन कारोबार को अकेले व्यक्ति की गतिविधि से आगे ले जाकर लोगों, हुनर, संगठन, बाजार और संपर्कों की व्यवस्था में बदलने की जरूरत तब भी थी। प्राचीन भारतीय श्रेणियों और निगमों से जुड़े अभिलेख बताते हैं कि व्यापार और शिल्प अनेक जगहों पर संगठित समूहों के माध्यम से चलते थे।

नगर सिर्फ रहने की जगह नहीं थे

आज किसी स्टार्टअप के लिए सबसे जरूरी शब्दों में एक है – लोकेशन। किसी शहर में कौन-सी प्रतिभा उपलब्ध है, बाजार कितना बड़ा है, कनेक्टिविटी कैसी है और दूसरे कारोबारियों से संपर्क कितना आसान है, इससे कारोबारी माहौल बनता है। प्राचीन नगरों की दुनिया में भी भूगोल का महत्व कम नहीं था।

गंगा और यमुना केवल नदियां नहीं थीं। वे आवाजाही और संपर्क की बड़ी प्राकृतिक धुरियां थीं। इनके आसपास बसे नगरों का महत्व केवल राजनीतिक या धार्मिक कारणों से नहीं बनता था; उनका स्थान व्यापार और आवागमन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण था। कौशाम्बी इसका बड़ा उदाहरण है। यमुना के किनारे स्थित यह नगर प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण संचार और व्यापारिक मार्गों के संगम पर था। उपलब्ध पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक सामग्री इसे उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम संपर्कों से जुड़े एक बड़े कारोबारी केंद्र के रूप में रखती है।

UNESCO की भारतीय सिल्क रूट संबंधी सामग्री में प्राचीन उत्तरापथ से जुड़े नगरों की सूची में तक्षशिला, मथुरा, कौशाम्बी, प्रयाग, काशी, वैशाली और पाटलिपुत्र जैसे केंद्र आते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि गंगा-यमुना क्षेत्र कोई अलग-थलग आर्थिक दुनिया नहीं था, बल्कि लंबे व्यापारिक नेटवर्क का हिस्सा था।

यानी आज के कारोबारी इकोसिस्टम में जिस चीज को कनेक्टिविटी कहते हैं, उसकी सबसे पुरानी शर्त शायद भूगोल ही था। जिस नगर तक लोग पहुंच सकते थे, जहां माल पहुंच सकता था और जहां से माल आगे जा सकता था, उसके पास विकसित होने की स्वाभाविक संभावना थी।

रास्ते ही तब के नेटवर्क थे

आज किसी स्टार्टअप की सफलता में नेटवर्किंग का बड़ा महत्व है। कोई निवेशक से मिलाता है, कोई बाजार तक पहुंचाता है, कोई तकनीकी मदद देता है और कोई ग्राहक तक पहुंचाता है। प्राचीन व्यापार में नेटवर्क का अर्थ था – रास्ते। कौशाम्बी के बारे में पुराने स्रोत इसे उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम की दिशाओं से आने वाले मार्गों से जुड़ा महत्वपूर्ण केंद्र बताते हैं। गंगा और यमुना के रास्ते भी व्यापारिक संपर्कों का हिस्सा थे।

बहती जमीन पर बसता और मिटता एक जीवित शहर, प्रयागराज | संगम तीरे

इसी व्यापक क्षेत्र में वाराणसी का अपना व्यापारिक संसार था। भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास की सामग्री में प्राचीन वाराणसी के स्थल और जलमार्गों से जुड़े व्यापारिक संबंधों का उल्लेख मिलता है। जातक साहित्य में वाराणसी से जुड़े व्यापारियों और दूर के नगरों तक जाने वाले व्यापारिक संबंधों के संकेत मिलते हैं; गंगा का जलमार्ग भी इस संपर्क का हिस्सा था। इसका मतलब यह नहीं कि उस समय कोई आधुनिक अर्थों में ‘लॉजिस्टिक्स कंपनी’ थी। लेकिन माल के आने-जाने की व्यवस्था थी। और कारोबार के लिए इससे ज्यादा बुनियादी चीज क्या हो सकती है?

बाजार के पीछे खड़े थे कारीगर

किसी आधुनिक स्टार्टअप की कहानी केवल उसके फाउंडर की कहानी नहीं होती। उसके पीछे डिजाइनर, इंजीनियर, उत्पादन करने वाले लोग, सप्लायर, वितरक और ग्राहक होते हैं। प्राचीन कारोबार भी सिर्फ व्यापारी का कारोबार नहीं था। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले, धातु पर काम करने वाले, वस्त्र तैयार करने वाले, मनके बनाने वाले, पत्थर और हाथीदांत पर काम करने वाले तथा दूसरे शिल्पकार उस आर्थिक दुनिया के जरूरी हिस्से थे। अलग-अलग स्थानों से मिले अभिलेख बताते हैं कि अनेक शिल्प और व्यापार संगठित श्रेणियों से जुड़े थे।

यहां आधुनिक उपमा बहुत सहज हो जाती है। आज फाउंडर अकेले उत्पाद नहीं बनाता। तब व्यापारी अकेले माल नहीं बनाता था। उसके पीछे हुनर था। हुनर के पीछे कारीगर था। कारीगर के पीछे संगठन था। और संगठन के सामने बाजार था। यानी कारोबार का मूल ढांचा किसी न किसी रूप में साझेदारी और परस्पर निर्भरता पर टिका था।

कारोबारियों का अपना संगठन भी था

यहीं से कहानी में आता है वह शब्द जिसने आधुनिक कारोबारी दुनिया और प्राचीन भारत के बीच सबसे दिलचस्प पुल बनाया है – गिल्ड। प्राचीन भारतीय संदर्भों में श्रेणी, निगम जैसे शब्द मिलते हैं। इनका अर्थ हर जगह और हर काल में एक जैसा नहीं था, इसलिए इन्हें सीधे आधुनिक कंपनी या कॉरपोरेशन कहना ठीक नहीं होगा। लेकिन अभिलेखीय सामग्री यह जरूर दिखाती है कि व्यापारी और कारीगर संगठित समूहों में काम करते थे।

मथुरा से मिले अभिलेखों में अलग-अलग श्रेणियों का उल्लेख मिलता है। कुछ गिल्डों के पास धन जमा किए जाने और उस धन से धार्मिक या सामाजिक कार्यों के लिए नियमित आय निकालने के प्रमाण भी हैं। एक अध्ययन में प्राचीन गिल्डों के कुछ कार्यों की तुलना आधुनिक बैंकिंग जैसी भूमिकाओं से की गई है।

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यहां आधुनिक शब्द फिर काम आता है। आज कोई कारोबारी संगठन सिर्फ परिचय का मंच नहीं होता। वह संपर्क, सामूहिक हित, भरोसे और कभी-कभी वित्तीय सहयोग का माध्यम भी बनता है। प्राचीन श्रेणियों के बारे में उपलब्ध प्रमाणों से भी कुछ ऐसी ही सामूहिक आर्थिक भूमिका दिखाई देती है। नाम अलग था। व्यवस्था का उद्देश्य अलग-अलग जगहों पर अलग था। लेकिन अकेले से संगठन की ओर जाने की जरूरत पुरानी थी।

और फिर मिट्टी से निकली एक मुहर

अब कहानी प्रयागराज के पास भीटा पहुंचती है। लेकिन भीटा यहां कहानी का अंत नहीं, बल्कि वह छोटा-सा पुरातात्त्विक प्रमाण है जो पूरे विचार को अचानक ठोस बना देता है। 1909-10 की खुदाई में यहां बड़ी संख्या में सीलिंग और मुहरें मिलीं। पुरातात्त्विक रिपोर्ट में कुछ सीलिंग को गिल्ड या सभाओं से जुड़ा बताया गया और उन पर nigama अथवा nigamasa जैसे पाठ दर्ज किए गए। उसी रिपोर्ट में भीटा से मिले भौगोलिक नामों में Vichhi का उल्लेख भी मिलता है।

सबसे रोचक बात यह है कि एक भवन की पहचान गिल्ड से जोड़ी गई। जॉन मार्शल की खुदाई में मिले एक मकान में आंगन के चारों तरफ 12 कमरे थे। एक मुहर पर गिल्ड से संबंधित संकेत मिलने के आधार पर इसे बाद के पुरातात्त्विक अध्ययनों में ‘House of the Guild’ के रूप में जाना गया।

अब इस दृश्य को आज की भाषा में देखिए। एक संगठन। उसकी पहचान। एक साझा भवन। काम करने वाले लोग। सड़क से जुड़ी आर्थिक गतिविधियां। और बाजार से जुड़ा एक नगर। क्या इसे स्टार्टअप का ऑफिस कहा जा सकता है? नहीं। क्या इसे आधुनिक कंपनी कहा जा सकता है? नहीं। लेकिन क्या यह हमें उस विचार की बहुत पुरानी मिसाल दिखाता है कि कारोबार अकेले व्यक्ति से बड़ा होकर संगठन बन सकता है? हां। और यही वह महीन रेखा है जिसे यह कहानी पकड़ना चाहती है।

मुहर उस समय का ‘ब्रांड’ नहीं, लेकिन पहचान जरूर थी

आज किसी कंपनी की पहचान उसके लोगो, ब्रांड नाम और डिजिटल प्रोफाइल से होती है। दो हजार साल पहले कोई लोगो फाइल नहीं थी। लेकिन मुहर थी। उस पर किसी संगठन, व्यक्ति, अधिकारी, धार्मिक संस्था या समूह की पहचान दर्ज हो सकती थी। भीटा से मिली सीलिंग में धार्मिक संस्थाओं, अधिकारियों, शासकों और गिल्ड/सभाओं से जुड़े प्रमाणों की अलग-अलग श्रेणियां सामने आई हैं।

इसलिए मुहर को सीधे ‘ब्रांड’ कहना इतिहास को सरल बना देना होगा। लेकिन यह कहना उचित है कि पहचान और प्रामाणिकता की जरूरत तब भी थी। आज ग्राहक पूछ सकता है – यह माल किस कंपनी का है? तब किसी वस्तु या दस्तावेज पर लगी मुहर किसी व्यक्ति या संगठन की पहचान का संकेत दे सकती थी। आज ब्रांड भरोसा बनाता है। तब संगठन और उसकी प्रतिष्ठा भरोसे का हिस्सा रहे होंगे। कारोबार में भरोसे की जरूरत शायद डिजिटल युग की खोज नहीं है।

पैसा भी सिर्फ जेब में नहीं रहता था

आज किसी स्टार्टअप के लिए फंडिंग की बात होती है। निवेशक पैसा लगाते हैं और कारोबार बढ़ता है। प्राचीन दुनिया में वेंचर कैपिटल नहीं था। लेकिन संगठित आर्थिक गतिविधियों के पास संसाधन जुटाने के दूसरे तरीके थे। मथुरा और पश्चिमी भारत के अभिलेखीय प्रमाण बताते हैं कि गिल्डों के पास धन जमा किया जाता था और वे उस पर आय उत्पन्न कर धार्मिक या सामाजिक कार्यों के लिए संसाधन उपलब्ध कराते थे। नासिक के एक अभिलेख में बुनकरों की दो गिल्डों के पास बड़ी रकम जमा किए जाने का उल्लेख मिलता है।

यहां फिर आधुनिक तुलना की सीमा समझनी होगी। यह वेंचर कैपिटल नहीं था। लेकिन यह जरूर बताता है कि आर्थिक संगठन सिर्फ माल खरीदने-बेचने तक सीमित नहीं थे। वे धन, प्रतिष्ठा और सामूहिक जिम्मेदारी से भी जुड़े हो सकते थे। यानी कारोबार की दुनिया में पूंजी और संगठन का रिश्ता भी नया नहीं है।

कारोबार का असली नेटवर्क आदमी से आदमी तक जाता था

आज LinkedIn, कारोबारी सम्मेलन, निवेशक नेटवर्क और उद्योग संगठन किसी कारोबारी को अकेला नहीं रहने देते। प्राचीन व्यापार में यह काम रास्ते, कारवां, व्यापारी समूह, गिल्ड और नगरों के नेटवर्क करते थे। कौशाम्बी का उदाहरण फिर सामने आता है। यह नगर यमुना के किनारे था और अलग-अलग दिशाओं से आने वाले मार्गों से जुड़ा था। एक पुरानी अध्ययन सामग्री में कौशाम्बी को यमुना के नदी-व्यापार का महत्वपूर्ण पड़ाव और प्राचीन भारत के अंतर्देशीय व्यापार का प्रमुख केंद्र बताया गया है।

और उसके आसपास छोटे-बड़े दूसरे बसाव भी थे। एक शैक्षिक अध्ययन में कौशाम्बी के आसपास श्रृंगवेरपुर और कर्रा जैसे बड़े स्थलों तथा उनसे जुड़े छोटे स्थलों का उल्लेख मिलता है। इसमें कौशाम्बी को क्षेत्र के प्रमुख व्यापारिक और राजनीतिक केंद्र के रूप में तथा आसपास के छोटे स्थलों को दैनिक जरूरत की वस्तुओं और शिल्प-उत्पादन से जुड़े स्तरों के रूप में देखा गया है। यह तस्वीर बेहद दिलचस्प है। एक बड़ा नगर। उसके आसपास छोटे केंद्र। उनके आसपास उत्पादन करने वाली बस्तियां। और इन सबको जोड़ते रास्ते। आज इसे हम कारोबारी भाषा में सप्लाई चेन और मार्केट नेटवर्क कह सकते हैं। तब यह बस जीवन था।

संगम सिर्फ तीर्थ का भूगोल नहीं था

इस पूरी कहानी में प्रयाग का महत्व यहीं से समझ में आता है। गंगा और यमुना का संगम धार्मिक स्मृति में जितना बड़ा है, भूगोल की दृष्टि से भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्राचीन प्रयाग के बारे में पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक स्रोत उसकी नदी-संगम वाली स्थिति को दर्ज करते हैं।

और जब उत्तर भारत के बड़े मार्गों की सूची में प्रयाग, कौशाम्बी और काशी जैसे नगर एक ही व्यापक नेटवर्क में दिखाई देते हैं, तो संगम को सिर्फ तीर्थ के रूप में देखना अधूरा रह जाता है। UNESCO की सामग्री में उत्तरापथ से जुड़े नगरों की श्रृंखला में प्रयाग और कौशाम्बी दोनों आते हैं। नदी यहां सिर्फ पानी नहीं है। वह रास्ता भी है। रास्ता सिर्फ आवाजाही नहीं है। वह बाजार भी बनाता है। बाजार सिर्फ खरीद-बिक्री नहीं है। वह लोगों को जोड़ता है। और लोगों का यह जुड़ना ही किसी भी कारोबारी इकोसिस्टम की पहली शर्त है।

विन्ध्य से गंगा तक पहुंचता था कच्चा माल

इस कहानी का एक और कम दिखाई देने वाला पक्ष है – कच्चा माल कोई भी बाजार सिर्फ खरीदारों से नहीं चलता। उसे माल चाहिए। गंगा के मैदान के पुरातात्त्विक अध्ययन बताते हैं कि विन्ध्य क्षेत्र से मिलने वाले अर्ध-मूल्यवान पत्थरों जैसे चैल्सेडनी, अगेट और कार्नेलियन का संपर्क गंगा के मैदानी क्षेत्रों के स्थलों से था। एक अध्ययन में मिर्जापुर-विन्ध्य क्षेत्र से इलाहाबाद/प्रयाग क्षेत्र और फिर वाराणसी की ओर जाने वाले नदी-आधारित संपर्कों का उल्लेख है। श्रृंगवेरपुर, कौशाम्बी और वाराणसी जैसे स्थलों के साथ इस व्यापक सांस्कृतिक-आर्थिक अक्ष को जोड़ा गया है।

यानी किसी प्राचीन नगर में बैठा कारीगर केवल अपने आसपास की मिट्टी और पत्थर से काम नहीं कर रहा था। कच्चा माल कहीं से आ रहा था। किसी ने उसे निकाला। किसी ने ढोया। किसी ने खरीदा। किसी ने उससे वस्तु बनाई। किसी ने उसे बाजार में पहुंचाया। और किसी ने उसे खरीदा। आज की भाषा में यही पूरी वैल्यू चेन है।

तब का बाजार भी अकेला नहीं था

यही कारण है कि भीटा को अकेले देखने पर कहानी छोटी हो जाती है। भीटा में मिली गिल्ड-संबंधी मुहर हमें एक संगठन दिखाती है। कौशाम्बी हमें एक बड़े व्यापारिक नगर का दृश्य देती है। श्रृंगवेरपुर हमें इस क्षेत्र के दूसरे नगरीय केंद्रों की तस्वीर में जोड़ता है।

वाराणसी हमें नदी और दूरस्थ व्यापार के संबंध दिखाती है। मथुरा हमें पश्चिम की ओर जाने वाले संपर्कों से जोड़ता है। और गंगा-यमुना तथा विन्ध्य का भूगोल इस पूरे संसार को कच्चे माल, लोगों और माल की आवाजाही से जोड़ता है। यानी कहानी किसी एक नगर की नहीं है। यह एक कारोबारी भूगोल की कहानी है।

आज का स्टार्टअप, तब का कारोबार

अब वापस वर्तमान में लौटिए। आज किसी स्टार्टअप के लिए जरूरी है – एक विचार। फिर चाहिए – लोग। फिर – हुनर। फिर- संसाधन। फिर – बाजार। फिर – नेटवर्क। फिर – भरोसा। और इन सबको जोड़ने वाला एक ऐसा माहौल, जिसमें कारोबार टिक सके। करीब दो हजार साल पहले शब्द अलग थे।

कहीं व्यापारी थे। कहीं कारीगर। कहीं श्रेणी। कहीं निगम। कहीं बाजार। कहीं नदी। कहीं सड़क। कहीं नगर। कहीं मुहर। इनमें से किसी को ‘स्टार्टअप इकोसिस्टम’ नहीं कहा जाता था। लेकिन अगर आज के शब्द को सिर्फ एक समझाने वाली उपमा की तरह इस्तेमाल करें, तो तस्वीर अचानक साफ होने लगती है। स्टार्टअप नया है। इकोसिस्टम की जरूरत पुरानी है।

कारोबार का यह वंश बहुत पुराना है

असल में कारोबार की दुनिया का वंश किसी एक कालखंड से शुरू नहीं होता। आज हम जिस चीज को बिजनेस नेटवर्क कहते हैं, उसका पुराना रूप व्यापारी समूहों और मार्गों में खोजा जा सकता है। जिसे हम सप्लाई चेन कहते हैं, उसकी बुनियादी जरूरत तब भी थी – कच्चा माल कहीं से आए और तैयार वस्तु कहीं पहुंचे।

जिसे हम ब्रांड पहचान कहते हैं, उसकी जगह तब मुहर और प्रतिष्ठा जैसी चीजें महत्वपूर्ण हो सकती थीं। जिसे आज बिजनेस एसोसिएशन कहते हैं, उसके साथ प्राचीन श्रेणियों और निगमों की तुलना की जा सकती है – बशर्ते यह याद रहे कि दोनों बिल्कुल एक जैसी संस्थाएं नहीं थीं। और जिसे आज इकोसिस्टम कहते हैं, उसकी सबसे सरल परिभाषा शायद यही है – कारोबार को चलाने वाले लोगों और परिस्थितियों का वह पूरा संसार, जिसमें कोई एक कारोबारी गतिविधि संभव होती है। यह संसार नया नहीं है। उसकी भाषा नई है।

मिट्टी में मिली मुहर से आज तक

भीटा की वह मुहर इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह हमें अचानक किसी राजमहल में नहीं ले जाती। वह हमें काम करने वाले लोगों की दुनिया में ले जाती है। उस दुनिया में जहां किसी ने कुछ बनाया होगा। किसी ने उसे खरीदा होगा। किसी ने दूर ले जाकर बेचा होगा।

किसी ने उसके लिए रास्ता बनाया होगा। किसी संगठन ने अपने सदस्यों की पहचान बचाई होगी। और किसी नगर ने इन सबको साथ रहने और काम करने की जगह दी होगी। यही वह दुनिया है जिसमें कौशाम्बी, वाराणसी, मथुरा, श्रृंगवेरपुर, प्रयाग और गंगा-यमुना के दूसरे केंद्र अपनी-अपनी भूमिका निभाते दिखाई देते हैं।

आज हम इन सबके लिए नई-नई कारोबारी शब्दावली गढ़ते हैं। लेकिन मनुष्य की आर्थिक जरूरतें शब्दों से बहुत पहले पैदा हो चुकी थीं। स्टार्टअप शब्द नया है। फाउंडर नया शब्द है। फंडिंग की आधुनिक भाषा नई है। ‘इकोसिस्टम’ की कारोबारी व्याख्या नई है। लेकिन कारोबार का अकेले से समूह बनने का सफर पुराना है।

और शायद यही इस कहानी का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष है – दो हजार साल पहले कोई ‘स्टार्टअप इकोसिस्टम’ नहीं था। लेकिन आज के कारोबारी इकोसिस्टम का बहुत पुराना पूर्वज जरूर था – एक ऐसा संसार जिसमें बाजार अकेला नहीं था; उसके साथ लोग थे, हुनर था, संगठन था, रास्ते थे, पूंजी थी, पहचान थी और सबसे बढ़कर भरोसा था।

भीटा की मिट्टी में मिली एक मुहर उस लंबे वंश की सिर्फ एक निशानी है। असली कहानी उस मुहर से कहीं बड़ी है। वह उस कारोबारी संसार की कहानी है, जिसकी भाषा समय के साथ बदलती रही – श्रेणी से संगठन तक, बाजार से नेटवर्क तक, मुहर से ब्रांड तक और रास्तों से इकोसिस्टम तक। शब्द बदल गए। साधन बदल गए। बाजार बदल गए। लेकिन कारोबार को कारोबार बनाने वाली मानवीय जरूरतें अब भी कहीं न कहीं वही हैं।

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यमुना के किनारे प्रयागराज से कुछ दूर एक ऐसी जगह है, जिसे आज भीटा के नाम से जाना जाता है। यहां कोई भव्य इमारत नहीं है, न किसी पुराने राजमहल के खंडहर दूर से दिखाई देते हैं। लेकिन इसी साधारण-सी जमीन के नीचे कभी एक ऐसा नगर बसा था, जिसकी गलियों में लोग आते-जाते थे, घरों में चूल्हे जलते थे, कारीगर चीजें बनाते थे, व्यापारी लेन-देन करते थे और मुहरों से सामान और संदेशों की पहचान होती थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक