‘कोई लड़की जब ससुराल जाती है और पहले दिन उससे हलवा बनाने को कहा जाता है तो वह मोबाइल से देखकर कच्चा-पक्का हलवा बनाती है। फिर सास की गालियां सुनती है कि तेरी मां ने क्या सिखाया… इसलिए मैं कहती हूं कि महिलाओं को कम से कम खाना बनाना आना चाहिए। आप टीचर बनो, आईएएस बनो, उससे पहले एक एक्सपर्ट मां बनो…।’

कानपुर के दीक्षांत समारोह में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने अपने भाषण में ये बात कही तो दूर तक चर्चा फैल गई। जिस जगह पर लड़कियों ने मेहनत से पढ़ाई कर पदक और डिग्री हासिल की, वहां राज्य की राज्यपाल कह रही हैं कि हलवा बनाना नहीं सीखा तो सब व्यर्थ है।

सत्ता के शीर्ष पर बैठी स्त्री जब ऐसा कह रही है तो आम धारणा क्या बनेगी? राज्यपाल कह रही हैं कि सास की गालियां सुनती हैं… कौन है यह सास जो गालियां देती है? क्या गालियां देना एक संवैधानिक कर्म है, जो सास नामक संस्था को करना ही चाहिए? ध्यान दिया जाए कि यहां पर स्त्री के खिलाफ एक स्त्री को ही खलनायिका बनाया जा रहा है।

बड़ी ही चालाकी से एक स्त्री यानी सास को पितृसत्ता बनाए रखने का औजार साबित किया जा रहा है। वह बहू की शिक्षा-दीक्षा नहीं, सिर्फ रसोई में उसकी काबिलियत देखेगी और हां, गाली देगी। सास अपनी बहू को किसकी सत्ता बनाए रखने के लिए गाली देगी? पति, ससुर और देवर की सत्ता बनाए रखने के लिए सास बहू को गाली देगी। ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ की तर्ज पर तो यह भी मानकर चलें कि सास को उसकी सास ने भी गाली दी ही होगी।

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खाना बनाना जब भी आर्थिक उत्पादन का साधन होता है तो वहां पर पुरुषों का कब्जा हो जाता है। दुनिया के ज्यादातर सितारा होटलों में पुरुष ही मुख्य खानसामे होते हैं। आज जब यूट्यूब से पैसे हासिल हो रहे हैं तो क्या औरत और क्या मर्द, सभी खाना बना रहे हैं। इन दिनों यूट्यूब पर खाना बनाने के वीडियो देखेंगे तो लगेगा कि भारतीय मर्द हमेशा से ही खाना बनाते रहे होंगे। स्त्रियों ने खाना बनाने से लेकर खाना कमाने तक का सफर तय करने में बहुत संघर्ष किया है।

इतिहास के पायदान पर स्त्रियां दोयम दर्जे की इसलिए रहीं क्योंकि उन्हें खाना कमाने नहीं, खाना बनाने की कतार में रखा गया था। आज जब स्त्री खाना कमाने वाले दीक्षांत समारोह की कतार में है तो उससे कहा जा रहा है कि पहले हलवा बनाने की दीक्षा लो, पहले मां बनने की दीक्षा लो।

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ऐसा कहकर उन लड़कियों के समकक्ष लड़कों के लिए संदेश दे दिया कि भले ही लड़कियां खाना कमाने वाली कतार में आकर खड़ी हो जाएं, लेकिन सत्ता उन्हें याद दिला देगी कि तुम्हें मेडल खाना बनाने में हासिल करना है। लड़कों का काम हलवा खाना है और लड़कियों का काम हलवा बनाना है।

सत्ता के शीर्ष पर पहुंची स्त्री भी जब लड़कियों को खाना बनाने वालों की कतार में ही खड़ा कर दे तो समझिए कि राजनीतिक सत्ता में अभी भी पितृसत्ता की ही पैठ है।