मोबाइल स्क्रीन पर अंगूठा चलाते हुए फिल्में देखने वाली पीढ़ी शायद कभी समझ ही न पाए कि एक दौर ऐसा भी था, जब सिर्फ तीन घंटे की एक फिल्म देखने के लिए लोग आधा दिन खर्च कर देते थे। टिकट के लिए धक्कामुक्की होती थी, जेब में सिक्के खनकते थे, साइकिल स्टैंड भर जाते थे और “हाउसफुल” का बोर्ड देखकर भी लोगों की आंखों में चमक बनी रहती थी। उस समय फिल्में केवल पर्दे पर नहीं चलती थीं, बल्कि पूरे शहर की धड़कनों में दौड़ती थीं। प्रयागराज की शामें तब सिनेमाहालों की रोशनी से जगमगाती थीं और हर शुक्रवार शहर किसी नए सपने का इंतजार करता था।
बाई का बाग स्थित झंकार सिनेमाहाल के बाहर उस दिन सुबह से ही मेला लगा था। शहर से लेकर गांव तक के लोग उमड़ पड़े थे। कोई साइकिल से आया था, कोई रिक्शे से, तो कोई बस पकड़कर। टिकट खिड़की खुलने में अभी वक्त था, लेकिन लाइन इतनी लंबी हो चुकी थी कि मोड़ पार कर सड़क तक पहुंच गई थी। फिल्म थी – नदिया के पार। जैसे ही लाउडस्पीकर पर सचिन और गुंजा पर फिल्माया गया गीत – “कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया…” – बजता, भीड़ में खड़े लोग खुद-ब-खुद झूमने लगते थे। कहते हैं कि झंकार सिनेमा में यह फिल्म ऐसी चली कि लोगों को लगने लगा था, मानो अब यह पर्दे से उतरेगी ही नहीं।
दूरदर्शन के समय में सिनेमा ही सबसे बड़ा रोमांच था
आज की पीढ़ी के लिए यह सब किसी कहानी जैसा लग सकता है, क्योंकि उनके हाथ में मोबाइल है, जेब में इंटरनेट है और मनोरंजन के हजारों विकल्प हैं। लेकिन एक समय ऐसा था, जब प्रयागराज की शामें सचमुच सिनेमा के नाम होती थीं। तब न ओटीटी था, न यूट्यूब और न सोशल मीडिया का शोर। टेलीविजन भी हर घर में नहीं था। जिन घरों में टीवी होता, वहां केवल दूरदर्शन आता था। रविवार और गुरुवार की शाम 5:45 बजे पुरानी फिल्में दिखाई जाती थीं और रात आठ बजे “चित्रहार” शुरू होते ही गलियां सूनी हो जाती थीं। मगर असली जादू सिनेमाहालों में बसता था।
ब्रिटिश शासन के अंतिम दौर तक प्रयागराज में सिनेमा संस्कृति आकार लेने लगी थी। स्थानीय इतिहासकारों, पुराने विज्ञापनों और शहर की स्मृतियों से संकेत मिलता है कि सिविल लाइंस जैसे इलाकों में शुरुआती “पिक्चर हाउस”, मूक फिल्मों के प्रदर्शन स्थल और बाद में “टॉकीज” अस्तित्व में आ चुके थे। उस समय अंग्रेज अफसरों, शिक्षित भारतीयों और संभ्रांत वर्ग के बीच फिल्में देखने का चलन धीरे-धीरे बढ़ रहा था। बाद में बोलती फिल्मों के आने के साथ यह संस्कृति पुराने शहर और आम लोगों तक फैल गई, जिसने आगे चलकर प्रयागराज को उत्तर भारत के बड़े सिनेमाई शहरों में शामिल कर दिया।
शुक्रवार को नई फिल्म लगना शहर में किसी त्योहार से कम नहीं माना जाता था। सुबह से ही सिनेमाहालों के बाहर चहल-पहल शुरू हो जाती थी। टिकट खिड़की, जिसे लोग बाक्सऑफिस कहते थे, वहां आधा किलोमीटर तक लंबी कतारें लग जाती थीं। कई बार सारी टिकटें खत्म हो जातीं और “हाउसफुल” का बोर्ड टंग जाता। लेकिन उस बोर्ड को देखकर भी लोगों का उत्साह कम नहीं होता था। कुछ लोग अगले शो की लाइन में लग जाते, तो कुछ ब्लैक में टिकट खरीदने वालों की तलाश शुरू कर देते।
दो रुपये पच्चीस पैसे की टिकट और बालकनी का अलग रुतबा
उस दौर में दो रुपये पच्चीस पैसे की टिकट और तीन रुपये पचहत्तर पैसे की बालकनी शहर के हजारों सपनों का रास्ता हुआ करती थी। आगे की लकड़ी वाली सीटों पर बैठने वालों का अपना अलग रोमांच था, जबकि बालकनी परिवारों और शहर के “प्रतिष्ठित” दर्शकों की जगह मानी जाती थी। सिनेमा देखना सिर्फ फिल्म देखना नहीं था, बल्कि पूरे हफ्ते की थकान उतार देने वाला सामाजिक उत्सव था।
पुराने प्रयागराज का सिनेमाई नक्शा भी बेहद दिलचस्प था। सिविल लाइंस से लेकर चौक, कटरा, कीडगंज, मुठ्ठीगंज, तेलियरगंज और नैनी तक सिनेमा की अपनी-अपनी दुनिया बसती थी। हिंदी साहित्य सम्मेलन के ठीक सामने चंद्रलोक सिनेमाहाल था। इसके आगे जीरो रोड की तरफ बढ़ने पर चौराहे पर मानसरोवर सिनेमाहाल पड़ता था, जिसका पुराना नाम राधा सिनेमा था। वहां से घंटाघर की तरफ बढ़ने पर पानदरीबा के पास अजंता और रूपबानी सिनेमाहाल थे। थोड़ा आगे जवाहर स्क्वायर चौराहे के पास नाज सिनेमाहाल हुआ करता था।
शहर का हर इलाका अपने सिनेमाहाल से पहचाना जाता था
इसी तरह विवेकानंद मार्ग यानी हीवेट रोड पर इंडियन गर्ल्स कॉलेज के सामने मोतीमहल सिनेमाहाल था। पास में ही शहराराबाग इलाके में विशंभर सिनेमाहाल स्थित था। पुराने शहर के यमुनापट्टी क्षेत्र में मुठ्ठीगंज के कटघर इलाके में तीन मशहूर सिनेमाहाल लगभग साथ-साथ थे – गौतम, संगीत और दर्पण। इनमें गौतम और संगीत एक-दूसरे के बगल में थे, जबकि दर्पण ठीक पीछे था।
घंटाघर से हीवेट रोड चौराहे के रास्ते सिविल लाइंस की ओर बढ़ने पर राज होटल के पास पुराना और बेहद लोकप्रिय निरंजन सिनेमाहाल पड़ता था। दूसरी ओर कीडगंज इलाके में काजल सिनेमाहाल था, जिसका पुराना नाम उत्तम था। इसके साथ ही विश्वामित्र सिनेमाहाल भी था। पास में ही बैरहना के बाई का बाग इलाके में झंकार और पायल सिनेमाहाल बगल-बगल स्थित थे। यहां फिल्म देखने वालों की भारी भीड़ उमड़ती थी।
प्रयागराज जंक्शन स्टेशन के ठीक सामने पुराना पुष्पराज सिनेमाहाल था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पास कटरा इलाके में लक्ष्मी टाकीज अपनी अलग पहचान रखता था। वहीं सिविल लाइंस में महात्मा गांधी मार्ग पर सुभाष चौराहे के पास प्लाजा सिनेमाहाल हुआ करता था, जिसका नाम बाद में राजकरन हो गया। पत्थर गिरजा के निकट पैलेस टाकीज भी उस दौर का चर्चित सिनेमाहाल था।
नैनी का इलाका भी उस समय सिनेमाई हलचल से भरा रहता था। अशोक टाकीज और शारदा सिनेमा वहां के बड़े आकर्षण माने जाते थे। खासकर अशोक टाकीज अपनी विशाल क्षमता के लिए चर्चित था। करीब एक हजार दर्शकों के बैठने की व्यवस्था वाले इस सिनेमाहाल में जब कोई बड़ी फिल्म लगती, तो शो खत्म होने के बाद बाहर ऐसा हुजूम निकलता कि सड़क पर लंबा जाम लग जाता था। रिक्शे, टेंपो, साइकिल और पैदल लौटते लोगों की भीड़ से पूरा इलाका देर रात तक गुलजार रहता था। बाद में वहां सरगम सिनेमाहाल भी खुला। दूसरी ओर तेलियरगंज में अवतार सिनेमाहाल युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय था।
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पुराने शहर के केएन काटजू रोड स्थित गढ़ी कला मिन्हाजपुर के रहने वाले मोहम्मद शाहिद बताते हैं कि उस दौर में सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि लोगों की जिंदगी का हिस्सा था। उनके मुताबिक, “अगर किसी बड़ी फिल्म का पहला शो देख लिया, तो मोहल्ले में अलग इज्जत मिलती थी। लोग कई दिन पहले से पैसे बचाकर टिकट खरीदते थे। कई बार तो ऐसा होता था कि टिकट नहीं मिली, लेकिन फिर भी लोग सिनेमाहाल के बाहर खड़े होकर अंदर से आती सीटियों और तालियों की आवाज सुनते रहते थे।”
जब पोस्टरों, सीटियों और तालियों से गूंजता था शहर
दरअसल, उस दौर में सिनेमाहालों के बाहर की दुनिया भी किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं होती थी। सैकड़ों साइकिलों से भरे स्टैंड, मूंगफली बेचने वालों की आवाजें, समोसे की खुशबू, दीवारों पर हाथ से बने पोस्टर और टेंपो पर घूमते लाउडस्पीकर पूरे शहर को सिनेमाई रंग में रंग देते थे। पुराने रिक्शों और टेंपो पर बड़े-बड़े पोस्टर बांध दिए जाते थे और लाउडस्पीकर पर आवाज गूंजती – “आज से भव्य प्रदर्शन… सुपरहिट सामाजिक फिल्म…”
शोले, बॉबी, दिलवाले दुल्हनियां… जैसी फिल्में कई सालों तक चलीं
प्रयागराज के दर्शकों का फिल्मों से रिश्ता भी बेहद भावनात्मक था। शोले लगी तो सीटियां थमती नहीं थीं। अमर अकबर एंथनी में अमिताभ बच्चन के संवादों पर लोग खड़े होकर तालियां बजाते थे। बॉबी ने युवाओं को दीवाना बना दिया था। हम आपके हैं कौन ने परिवारों को फिर सिनेमाहालों तक खींच लिया। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे कॉलेज के छात्रों के बीच जुनून बन गई। लेकिन नदिया के पार और जय संतोषी मां जैसी फिल्मों का असर कुछ अलग ही था। जय संतोषी मां के दौरान महिलाएं पूजा की थाली लेकर पहुंचती थीं और कई लोग पर्दे पर फूल तक चढ़ाते थे।
अमिताभ बच्चन का प्रयागराज से रिश्ता तो शहर के लिए गर्व की बात था। कुली, दीवार, मुकद्दर का सिकंदर और शहंशाह जैसी फिल्मों के दौरान सिनेमाहालों के बाहर ऐसा माहौल होता था, मानो कोई बड़ा उत्सव चल रहा हो। जब कुली की शूटिंग के दौरान अमिताभ घायल हुए थे, तब शहर के मंदिरों और मस्जिदों में उनके लिए दुआएं मांगी गई थीं।
फिल्मों के 25 हफ्ते चल जाने पर पूरे सिनेमाहाल को सजाया जाता था
सिनेमाहालों में रोज तीन से चार शो चलते थे – मॉर्निंग शो, मैटिनी, फिर तीन बजे, छह बजे और रात नौ बजे का शो। कुछ जगहों पर देर रात बारह से तीन बजे तक भी फिल्में दिखाई जाती थीं। अंग्रेजी और वयस्क दर्शकों के लिए बनी फिल्में अक्सर सुबह वाले शो में दिखाई जाती थीं। अखबारों में विज्ञापन छपते – “आज 12, 3, 6 और 9 बजे”, “मैटिनी स्पेशल”, “रजत जयंती सप्ताह”, “स्वर्ण जयंती समारोह”। कोई फिल्म 25 हफ्ते चल जाए तो सिनेमाहाल सजाए जाते थे और 50 हफ्ते पूरे होने पर मानो जश्न मनाया जाता था।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय और आसपास के कॉलेजों का छात्र जीवन भी सिनेमा से गहराई से जुड़ा था। क्लास खत्म होने के बाद छात्रों के समूह सीधे सिनेमाहाल पहुंच जाते थे। कई दोस्तियां टिकट की लाइन में खड़े-खड़े शुरू हुईं और कई प्रेम कहानियां बालकनी की सीटों से आगे बढ़ीं। इंटरवल में समोसे और कोल्ड ड्रिंक का स्वाद उस दौर की यादों में आज भी ताजा है।
फिर धीरे-धीरे समय बदलने लगा। पहले वीसीआर आया, फिर केबल टीवी और उसके बाद मल्टीप्लेक्स संस्कृति। आखिर में मोबाइल और इंटरनेट ने सब कुछ बदल दिया। जिन सिनेमाहालों के बाहर कभी भीड़ संभालने के लिए पुलिस बुलानी पड़ती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। कई इमारतें शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में बदल गईं, कुछ गोदाम बन गईं और कुछ खंडहर में तब्दील हो गईं।
लेकिन पुराने प्रयागराज की यादों में वे सिनेमाहाल आज भी उसी चमक के साथ जिंदा हैं।
आज भी जब कोई बुजुर्ग हिवेट रोड, लीडर रोड, कीडगंज, नैनी या सिविल लाइंस से गुजरता है, तो उसे अचानक टिकट खिड़की पर लगी लंबी लाइनें, “हाउसफुल” का बोर्ड, इंटरवल का समोसा, बाहर खड़ा रिक्शा, सीटियों से गूंजता हॉल और पर्दे पर चमकती वह दुनिया याद आ जाती है, जिसमें लोग कुछ घंटों के लिए अपनी सारी परेशानियां भूल जाया करते थे।
शायद यही वजह है कि प्रयागराज के पुराने सिनेमाहाल अब केवल बंद इमारतें नहीं हैं। वे उस दौर की आखिरी सांसें हैं, जब शहर फिल्में सिर्फ देखता नहीं था, बल्कि उन्हें जीता था।
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क्या आपने कभी सोचा है कि प्रयागराज का संगीत आखिर कहां है? न यहां बनारस जैसी कोई तयशुदा घरानेदारी दिखती है, न लखनऊ जैसी दरबारी परंपरा। फिर भी यह शहर ध्वनियों से भरा है, घाटों की आरती से लेकर मेलों की गूंज तक। दरअसल प्रयागराज का संगीत मंचों पर कम, जीवन में ज्यादा मिलता है। यह दिखता कम है, मगर हर पल बहता रहता है, ठीक संगम की तरह। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
