केक शब्द सुनते ही जेहन में आते हैं बच्चे और उनका जन्मदिन। लेकिन जब किसी देश की सत्ता में तानाशाह हों तो केक बच्चों पर जुल्म का प्रतीक भी हो सकता है। केक की तीन प्रमुख सामग्रियां मैदा, अंडा, चीनी और बेकिंग सोडा प्रतीक बन जाते हैं आम लोगों के संघर्ष का। तानाशाही सत्ता के वीभत्स रूप को दिखाने के कई तरीके हो सकते हैं। जब तानाशाही को बाल किरदारों और स्कूल की दीवारों के जरिए दिखाया जाता है तो वह अपने समय का मार्मिक दस्तावेज बन जाता है। बाल किरदारों के जरिए तानाशाही सत्ता का ऐसा ही चित्रण किया है, इराकी निर्देशक हसन हादी ने अपनी फिल्म ‘द प्रेसिंडेंट्स केक’ में।
ईराक में सद्दाम हुसैन की तानाशाह सरकार की पृष्ठभूमि वाली इस कहानी की मुख्य किरदार है नौ साल की बच्ची लामिया। देश के राष्ट्रपति का जन्मदिन आने वाला है, और पूरी जनता को उसे धूमधाम से मनाना है। स्कूली बच्ची के घर में खाने के लिए रोटी तक नहीं है, लेकिन उसे राष्ट्रपति के जन्मदिन के अवसर पर केक बनाने का आदेश मिलता है। जब आर्थिक प्रतिबंधों के कारण रोजगार नहीं हो, महंगाई चरम पर हो तब एक गरीब लड़की के लिए केक की सामग्री जुटाना एक बड़ी जंग लड़ने सरीखा हो जाता है। आटा, चीनी और मैदा खरीदने के लिए लामिया अपनी दादी के साथ शहर जाती है। लामिया के माता-पिता नहीं हैं और उसके जीवन का एकमात्र सहारा उसकी दादी हैं। लामिया की जिंदगी में दादी के अलावा दो चीजें और हैं। एक मुर्गा और उसका सहपाठी दोस्त सईद।
काफ्का की दुनिया, जहां अकेलापन ही उसका मार्गदर्शक है | अमर किरदार
लामिया को पता है कि अगर वह केक बना कर स्कूल नहीं ले जाएगी तो उसे और उसके परिवार को कड़ी सजा दी जाएगी। केक की सामग्री जुटाने के लिए लामिया अपने मरहूम पिता की घड़ी तक बेच देती है। उसकी दादी उसे किसी शहरी परिवार के यहां काम पर रखना चाहती है तो वह भाग जाती है। अपने दोस्त के साथ वह किसी तरह अंडा, चीनी और मैदा हासिल कर पाती है। लेकिन इन चीजों को हासिल करने के संघर्ष में शहर में ही उसकी दादी की मौत हो जाती है। अपनी दादी की कब्र को मिट्टी देने के बाद लामिया अपने दोस्त की मां की मदद से केक बनाकर स्कूल ले जाती है। लामिया के संघर्ष के समांतर दिखाया जाता है कि सद्दाम हुसैन अपने राजमहल जैसे घर में अति विशालकाय केक के साथ अपना जन्मदिन मना रहा है।
हसन हादी ने राजनीतिक दमन को दिखाने के लिए गंभीर, भाषणों और नारों का सहारा नहीं लिया है। एक बच्ची की नजर से दर्शक सत्ता के क्रूरतम चेहरे को देखते हैं। बनीन अहमद नायेफ ने लामिया के किरदार को कालजयी बना दिया है। लामिया के दोस्त के रूप में सजाद मोहम्मद कासिम भी अमिट छाप छोड़ते हैं। इराक के दलदली क्षेत्रों की पृष्ठभूमि में फिल्म का छायांकन भी बेजोड़ है। इस फिल्म को 2025 के कान फिल्म समारोह में अत्यधिक सराहना मिली थी।
