इंसानों ने तो गधे को एक ऐसा प्राणी समझा है, जो बस बोझ ढोने के लिए बना है। गधे को बेवकूफ जीव का प्रतीक बना दिया गया है। जरा सोचिए, क्या होगा जब एक गधे की नजर से इंसानों के जीवन को देखा जाएगा? मकबूल अफसानानिगार कृष्ण चंदर ने एक ऐसे गधे की आत्मकथा लिख डाली जो हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी बोलता है। सबसे खास बात है कि वह अखबार और किताबें पढ़ता है। इंसानी नस्ल से अलग होने के कारण वह इंसानी दुनिया की गड़बड़ियों का साफ-साफ आकलन करता है।

कृष्ण चंदर के जरिए गधे ने बदला लिया है

अगर इंसानों ने गधे को एक मूर्ख प्रजाति की तरह दिखाया है तो कृष्ण चंदर के जरिए गधे ने इसका बदला लिया है। कृष्ण चंदर का गधा इंसानों की धूर्तता और चालाकी को सामने लाकर उस पर गहरे तंज कसता है। गधे के जरिए कृष्ण चंदर समाज की विसंगतियों को उभारने में कामयाब होते हैं। अपनी आत्मकथा में गधा अपना परिचय यूं देता है—“महानुभाव! मैं न तो कोई साधु-संन्यासी हूं न कोई महात्मा-धर्मात्मा…” वह कहता है कि बचपन के कुछ दुष्कर्मों की वजह से उसे अखबार पढ़ने का रोग लग गया है।

लेकिन यह रोग गधे को भारी पड़ता है। जब गधा काम से ज्यादा अखबार पढ़ने लगता है तो उसका मालिक उसे भगा देता है। गधा पहले बाराबंकी में धब्बू कुम्हार के यहां ईंटें ढोता है। फिर सैयद करामत अली शाह की कोठी पर काम करता है। पहले तो सैयद साहब गधे की अक्ल पर फिदा रहते हैं, लेकिन शारीरिक काम से ज्यादा अक्ल को काम में लाने की गधे की आदत वे कबूल नहीं कर पाते हैं।

सांप्रदायिक दंगे के कारण सैयद साहब पाकिस्तान चले जाते हैं तो नया मालिक गंडा सिंह फल विक्रेता है। अब किताबों की जगह फल लग रहे थे और गधा माहौल बता रहा था—“यह शेक्सपियर का सेट गया और तरबूजों का टोकरा भीतर आया। ये गालिब के दीवान बाहर फेंके गए और मलीहाबाद के आम भीतर रखे गए।”

गधा दिल्ली की ओर रवाना होता है, जहां रास्ते में उसका मजहब पूछा जाता है, जिसके जवाब में वो कहता है—“गधे का कोई मजहब नहीं होता है।” गधा तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से भी मिल आता है।

गधा जब मशहूर हो जाता है तो एक व्यक्ति उसे अमीर ठेकेदार समझ कर उसके साथ अपनी बेटी की शादी की तैयारी करता है। लेकिन जब पता चलता है कि वह अमीर नहीं, एक आम गधा है, तो उसकी बहुत पिटाई की जाती है, जिससे उसकी जान पर बन आती है। अंत में गधा यही सोचता है—“यह दुनिया है ही ऐसी। यहां पर ईमानदारी, सच्चाई, सहृदयता और आदर्श की ऊंचाई का अर्थ यह है कि आदमी भूखा रहे और कुढ़-कुढ़कर दूसरों के लिए गधा बनकर मर जाए।”

आजादी के बाद लिखी गई ‘एक गधे की आत्मकथा’ को पढ़ना आज भी मनोरंजक है। सांप्रदायिकता और नौकरशाही पर जिस तरह के तंज हैं, उसे एक बार तो पढ़ना ही चाहिए।

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बहुत समय पहले की बात है। एक सुनहरे बालों वाला लंबे कद का लड़का था, जिसकी उम्र चौदह बरस थी। अपनी उम्र के आम लड़कों की तरह उसे खाने और सोने में ही मजा आता था। जाहिर सी बात है कि उसे शरारत करना सबसे अच्छा लगता था। रविवार को जब उसके माता-पिता चर्च जाने की तैयारी कर रहे थे, तब वह अगले कुछ घंटों के लिए अकेले घर में मजे करने की तैयारी कर रहा था। उसने मन में सोचा कि अब मैं पापा की बंदूक उठा सकता हूं और बिना किसी की दखलंदाजी के एक गोली चला सकता हूं…। पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक