“संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ…” उत्तर भारत की राजनीति में यह नारा केवल चुनावी मंचों तक सीमित नहीं रहा। 1960 और 1970 के दशक में यह विश्वविद्यालयों, छात्र आंदोलनों और समाजवादी बैठकों में लगातार सुनाई देता था। उस समय पिछड़े वर्गों की राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर जो बहस शुरू हुई, उसने बाद के दशकों में उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति की दिशा बदल दी। मंडल राजनीति, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय दलों की जो ताकत आज दिखाई देती है, उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि उसी दौर में तैयार हो रही थी।
उस समय प्रयागराज में इलाहाबाद विश्वविद्यालय इस बहस का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। यहां राजनीति केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं मानी जाती थी। विश्वविद्यालय परिसर, छात्रसंघ चुनाव, हिंदी पत्रकारिता और समाजवादी संगठन मिलकर एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति बना रहे थे, जिसमें प्रतिनिधित्व, भाषा, जाति और गैर-कांग्रेसी राजनीति पर खुली बहस होती थी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय को उस दौर में केवल शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि उत्तर भारत की राजनीतिक प्रयोगशाला के रूप में भी देखा जाता था।
समाजवादी राजनीति की इस धारा पर राम मनोहर लोहिया का गहरा प्रभाव था। लोहिया ने कांग्रेस विरोध को केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल से जोड़ा। “राज-पाट है किसके हाथ, अंग्रेजी और ऊंची जात” और “अंग्रेजी हटाओ” जैसे नारे इसी दौर में व्यापक रूप से चर्चित हुए। इन नारों के जरिए लोहिया सत्ता संरचना, प्रशासनिक भाषा और सामाजिक वर्चस्व पर सवाल उठा रहे थे। उनका तर्क था कि लोकतंत्र में वास्तविक भागीदारी तभी संभव है जब सत्ता और शिक्षा तक पहुंच सीमित वर्गों के बाहर भी फैले।
कई राष्ट्रीय नेता विश्वविद्यालय परिसर में सभाएं करने आते थे
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उस समय छात्र राजनीति अत्यंत सक्रिय थी। समाजवादी युवजन सभा, वामपंथी छात्र संगठनों और कांग्रेस समर्थक समूहों के बीच लगातार वैचारिक टकराव होता था। छात्रसंघ चुनावों को प्रदेश की राजनीति का संकेत माना जाता था। कई राष्ट्रीय नेता विश्वविद्यालय परिसर में सभाएं करने आते थे। पुराने पत्रकारों और समाजवादी नेताओं के संस्मरणों में बार-बार यह उल्लेख मिलता है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने केवल छात्र नेता नहीं, बल्कि राजनीतिक कार्यकर्ता तैयार किए।
सिविल लाइंस का इंडियन कॉफी हाउस उस दौर की राजनीतिक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा था। यहां पत्रकार, छात्र नेता, वकील, प्रोफेसर और राजनीतिक कार्यकर्ता नियमित रूप से बैठते थे। कई राजनीतिक रणनीतियां और छात्रसंघ गठबंधन यहीं तय होते थे। यह वह समय था जब राजनीति सार्वजनिक बहसों और संगठनात्मक बैठकों के जरिए चलती थी, न कि टीवी बहसों और डिजिटल अभियानों के जरिए।
जनेश्वर मिश्र प्रयागराज की समाजवादी राजनीति के सबसे प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। उन्हें “छोटे लोहिया” कहा जाता था। छात्र राजनीति से निकलकर वे समाजवादी आंदोलन और बाद में राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचे। उनके भाषणों और राजनीतिक शैली का असर विश्वविद्यालय के छात्रों और युवा कार्यकर्ताओं पर स्पष्ट दिखाई देता था। वे अक्सर सामाजिक प्रतिनिधित्व, किसानों और पिछड़े वर्गों के सवालों को सीधे राजनीतिक मुद्दा बनाते थे।
जेपी आंदोलन के दौरान छात्र आंदोलन राष्ट्रीय संघर्ष का हिस्सा था
1974 के जेपी आंदोलन के दौरान भी प्रयागराज महत्वपूर्ण केंद्रों में था। जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर शुरू हुए छात्र आंदोलनों में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र सक्रिय रहे। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सत्ता केंद्रीकरण के खिलाफ चल रहे आंदोलनों ने बाद में आपातकाल (इमरजेंसी) विरोधी राजनीति को मजबूत आधार दिया। उस समय छात्र राजनीति केवल विश्वविद्यालय प्रशासन तक सीमित नहीं थी। वह राष्ट्रीय राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन चुकी थी।
प्रयागराज का प्रभाव केवल समाजवादी संगठनों तक सीमित नहीं था। विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर जैसे नेताओं के दौर में सामाजिक न्याय और गैर-कांग्रेसी राजनीति की जो धारा मजबूत हुई, उसकी वैचारिक जमीन पहले से तैयार थी। मंडल आयोग लागू होने के बाद पिछड़े वर्गों की राजनीति जिस तरह केंद्र में आई, वह अचानक नहीं हुआ था। उसके पीछे कई दशकों की वैचारिक और राजनीतिक तैयारी मौजूद थी।
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मुलायम सिंह यादव प्रत्यक्ष रूप से प्रयागराज की राजनीति से नहीं जुड़े थे। उनका राजनीतिक आधार इटावा और आसपास का क्षेत्र था। लेकिन वे जिस समाजवादी परंपरा से निकले, उसकी वैचारिक संरचना तैयार करने में प्रयागराज जैसे शहरों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। बाद के वर्षों में मुलायम सिंह यादव ने उसी समाजवादी राजनीति को ग्रामीण पिछड़े वर्गों और संगठनात्मक ताकत के साथ जोड़कर व्यापक जनाधार में बदला।
आज प्रयागराज का राजनीतिक वातावरण काफी बदल चुका है। छात्रसंघ राजनीति का प्रभाव सीमित हुआ है। विश्वविद्यालयों में वैचारिक बहसों की जगह प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार केंद्रित माहौल ने ले ली है। राजनीतिक दलों की कार्यशैली भी बदली है। अब नेतृत्व लंबे वैचारिक प्रशिक्षण और छात्र आंदोलनों से कम, चुनावी प्रबंधन और डिजिटल अभियानों से अधिक तैयार होता दिखाई देता है।
इसके बावजूद प्रयागराज का समाजवादी इतिहास केवल अतीत का दस्तावेज नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज भी सामाजिक न्याय, पिछड़ा वर्ग प्रतिनिधित्व और गैर-कांग्रेसी राजनीति की जो स्थायी भाषा दिखाई देती है, उसकी वैचारिक जड़ें काफी हद तक उसी दौर में मिलती हैं, जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय, छात्र आंदोलन और समाजवादी बहसें उत्तर भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करते थे।
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सन 1960 के दशक में प्रयागराज की सुबह किसी आम शहर की सुबह नहीं होती थी। अखबार की सुर्खियां दिन की शुरुआत तय नहीं करती थीं, वे सिर्फ एक बहाना होती थीं। असल शुरुआत तो उन सवालों से होती थी, जो छात्र रात से लेकर सुबह तक अपने साथ ढो रहे होते थे। ब्रेड पकौड़े की दुकानों पर भी चाय कम पी जाती थी, और वहां पर विचार ज्यादा उबलते थे। कोई रास्ते से गुजरता छात्र अगर किसी मोड़ पर रुक जाए, तो यह तय मान लिया जाता था कि वह किसी खबर को नहीं, किसी विचार को पढ़ रहा है। इस वातावरण में इलाहाबाद विश्वविद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं रह गया था, वह एक ऐसा जीवंत मंच बन चुका था, जहां समाजवाद एक सिद्धांत नहीं, एक रोजमर्रा की बातचीत थी, और राजनीति कोई दूर की चीज नहीं बल्कि छात्रावास के कमरों में बैठी हुई रात की सबसे करीबी साथी थी।
