प्रयागराज में साहित्य लिखा ही नहीं जाता था, वह रोज जीया जाता था।” वरिष्ठ कथाकार रवीन्द्र कालिया ने अपने संस्मरणों में कई बार इस शहर का जिक्र किया है, जहां सुबह की शुरुआत अखबारों के दफ्तरों से होती थी, दोपहर विश्वविद्यालय की कक्षाओं में बीतती थी और शाम इंडियन कॉफी हाउस की मेजों पर उतर आती थी। उन मेजों पर चाय और कॉफी से ज्यादा शब्द उबलते थे। कोई नई कविता पर बहस कर रहा होता, कोई गालिब और निराला की तुलना में उलझा होता, तो किसी को नई कहानी आंदोलन की चिंता सताती थी। वहां बैठे लोगों में कोई प्रोफेसर था, कोई पत्रकार, कोई वकील और कोई सरकारी मुलाजिम। लेकिन रात होते-होते सबकी पहचान एक ही रह जाती थी – लेखक।

शायद यही वह शहर था, जहां पेशे अलग-अलग थे, मगर जुनून एक था। अदालत में बैठा एक जज अपनी शायरी से पूरे समाज पर व्यंग्य करता था। अंग्रेजी का प्रोफेसर उर्दू गजल का सबसे बड़ा नाम बन जाता था। दारागंज का एक फक्कड़ कवि हिंदी कविता की दिशा बदल देता था। एक गांव का लड़का जासूसी उपन्यासों की ऐसी दुनिया रच देता था, जिसकी किताबें रेलवे स्टेशनों पर हाथों-हाथ बिकती थीं। अखबार का रिपोर्टर शाम को कहानी लिखता था और कवि अगले दिन संपादकीय पर बहस करता दिखाई देता था।

यही वह इलाहाबाद था, जिसने केवल बड़े लेखक नहीं दिए, बल्कि साहित्य की पूरी एक संस्कृति गढ़ी। अकबर इलाहाबादी, फिराक गोरखपुरी, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, धर्मवीर भारती, इब्ने सफी, अमरकांत, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह, शम्सुर्रहमान फारूकी जैसे नाम उसी संस्कृति की अलग-अलग आवाज़ें हैं। इनकी रचनाएं पढ़ते-पढ़ते एक बात समझ में आती है कि इलाहाबाद केवल एक शहर नहीं था, वह एक चलता-फिरता साहित्यिक विश्वविद्यालय था, जिसकी कोई चारदीवारी नहीं थी।

लेकिन सच यह है कि इन सबके बीच सबसे बड़ा किरदार कोई व्यक्ति नहीं, इलाहाबाद खुद था। जहां अखबार का दफ्तर भी साहित्य का अड्डा था। इलाहाबाद की पहचान सिर्फ कवियों और शायरों ने नहीं गढ़ी। पत्रकारों ने भी इस शहर की आत्मा को शब्द दिए। एक समय था जब ‘लीडर’, ‘भारत’, ‘अमृत प्रभात’, ‘नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका’ और बाद में दूसरे अखबारों के दफ्तर सिर्फ खबरें लिखने की जगह नहीं होते थे। वहीं बहस होती थी कि देश किस दिशा में जा रहा है, नई कविता किस ओर मुड़ रही है और अगला संपादकीय किस स्वर में लिखा जाए।

वरिष्ठ पत्रकार रजा अब्बास काजमी अक्सर कहा करते थे कि इलाहाबाद में पत्रकारिता और साहित्य दो अलग-अलग रास्ते नहीं थे। दोनों एक-दूसरे के घर आते-जाते थे। एक रिपोर्टर शाम को कविता सुनाता था और कवि अगले दिन अखबार में स्तंभ लिख देता था।

पत्रकार अनिल सिद्धार्थ भी कई बार लिख चुके हैं कि इलाहाबाद का साहित्यिक माहौल किसी संस्थान ने नहीं बनाया, उसे उन लोगों ने बनाया जो किताबों को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा मानते थे।

शायद इसलिए यहां लेखक और पत्रकार के बीच कभी दीवार नहीं खड़ी हुई। अदालत का वह जज, जिसने हंसते-हंसाते पूरी एक सदी को आईना दिखा दिया इलाहाबाद हाईकोर्ट की पुरानी इमारत से कुछ दूरी पर अगर कोई सौ-सवा सौ साल पहले खड़ा होता, तो रोज ऐसे लोगों को आते-जाते देखता जिनके हाथों में कानून की मोटी किताबें होती थीं।

उन्हीं में एक शख्स थे – सैयद अकबर हुसैन। दुनिया उन्हें अकबर इलाहाबादी के नाम से जानती है। 16 नवंबर 1846 को इलाहाबाद जिले के बारा कस्बे में जन्मे अकबर ने अंग्रेजी शासन में न्यायिक सेवा की और सेशन जज बने। दिन भर कानून की धाराओं के बीच बैठने वाला यह आदमी रात को जब कलम उठाता, तो उसकी भाषा बदल जाती। उसकी अदालत में फैसले लिखे जाते थे। उसकी शायरी में समाज का फैसला सुनाया जाता था।

अकबर इलाहाबादी की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे गुस्से में भी मुस्कुराते थे। उनका व्यंग्य तलवार की तरह नहीं, मुस्कान की तरह चोट करता था। उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा का विरोध नहीं किया, बल्कि अंधानुकरण का मजाक उड़ाया। आधुनिकता से उन्हें शिकायत नहीं थी, अपनी जड़ों को भूल जाने से थी।

उर्दू के बड़े निबंधकार और शिक्षाविद रशीद अहमद सिद्दीकी ने अकबर इलाहाबादी को याद करते हुए लिखा था कि उनके यहां व्यंग्य कभी हल्का नहीं पड़ता था, लेकिन भाषा की शालीनता भी कभी नहीं टूटती थी। यही वजह थी कि उनके शेर सुनकर जिस पर तंज होता, वह भी मुस्कुरा देता।

आज भी उनका यह शेर लोगों की जुबान पर है –

“हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी-सी जो पी ली है, डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है।”

शेर पढ़ते ही महफिल हंस पड़ती है, लेकिन थोड़ी देर बाद एहसास होता है कि सवाल शराब का नहीं, समाज के दोहरे मापदंडों का है। यही अकबर थे। हंसाकर सोचने पर मजबूर कर देने वाले।

अदालत से विश्वविद्यालय तक का सफर

अकबर इलाहाबादी की अदालत से निकलिए और शहर के दूसरे छोर पर बने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की तरफ चलिए। यहीं आपको एक और शख्स मिलेगा। हाथ में अंग्रेजी साहित्य की किताब होगी। लेकिन जब शाम ढलेगी, तो वही आदमी उर्दू गजल का जादूगर बन जाएगा। नाम था – रघुपति सहाय। दुनिया उन्हें फिराक गोरखपुरी कहती है। विडंबना देखिए, नाम में गोरखपुर था, लेकिन पहचान इलाहाबाद ने दी। 1930 से 1959 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाने वाले फिराक सिर्फ अध्यापक नहीं थे। वे एक पूरी पीढ़ी की बौद्धिक बेचैनी का नाम थे उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, जेल गए और फिर विश्वविद्यालय लौट आए। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान क्लासरूम नहीं, उनकी गजलें बनीं।

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साहित्यकार नामवर सिंह ने एक बार कहा था कि फिराक की बातचीत भी उतनी ही आकर्षक होती थी, जितनी उनकी शायरी। वे किसी सामान्य बातचीत को भी साहित्यिक अनुभव में बदल देते थे। उनकी गजलों में प्रेम था, लेकिन वह किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं था। उसमें स्मृति थी, अकेलापन था और मनुष्य की गहरी संवेदना थी। उनका यह शेर शायद हर पीढ़ी अपनी तरह से पढ़ती रही है –

“एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें, और हम भूल गए हों तुझे, ऐसा भी नहीं।”

यह सिर्फ इश्क का शेर नहीं है। यह उन शहरों का भी शेर है, जिन्हें छोड़ तो दिया जाता है, लेकिन भुलाया कभी नहीं जाता। इलाहाबाद छोड़कर गए हजारों लोगों के लिए यह शेर आज भी निजी अनुभव जैसा लगता है।

जब एक कविता ने पूरे देश को अपना हमसफर बना लिया

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उन्हीं गलियों में एक और अध्यापक धीरे-धीरे अपनी पहचान बना रहा था। नाम – हरिवंश राय बच्चन। आज ‘मधुशाला’ का नाम लेते ही बच्चन याद आते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी आत्मकथा “क्या भूलूं, क्या याद करूं” इलाहाबाद का शायद सबसे जीवंत साहित्यिक दस्तावेजों में से एक है।

वह लिखते हैं कि प्रयाग उनके लिए केवल नौकरी का शहर नहीं था, बल्कि आत्मनिर्माण की भूमि था। यहीं मित्र मिले, साहित्यिक बहसें मिलीं और वह वातावरण मिला जिसने उनकी रचनाशीलता को आकार दिया। 1935 में जब ‘मधुशाला’ प्रकाशित हुई, तो लोगों ने उसे शराब की कविता समझा। लेकिन जल्दी ही स्पष्ट हो गया कि वह जीवन, संघर्ष, मृत्यु और आशा का रूपक है।

कविता-पाठ के दौरान बच्चन की आवाज में ऐसा आकर्षण था कि सभागार भर जाते थे। लोग सिर्फ कविता सुनने नहीं, उसे महसूस करने आते थे। इलाहाबाद ने बच्चन को मंच दिया। और बच्चन ने इलाहाबाद को अमर कर दिया। इसी शहर में एक और आदमी था, जो फटे कुर्ते में गंगा किनारे घूमता था। कोई उसे सनकी कहता, कोई फक्कड़। लेकिन वही आदमी आगे चलकर हिंदी कविता का ऐसा शिखर बना, जिसे दुनिया ‘निराला’ के नाम से जानने लगी।

इलाहाबाद की खूबी यह थी कि यहां कोई किसी की तरह बनने की कोशिश नहीं करता था। अकबर इलाहाबादी ने व्यंग्य को अपनी पहचान बनाया, फिराक ने गजल को, बच्चन ने कविता को। लेकिन शहर की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अगर आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दारागंज की ओर उतरें, तो हवा का मिजाज बदल जाता है। यहां गंगा कुछ और शांत लगती है और गलियां कुछ ज्यादा आत्मीय। इन्हीं गलियों में एक ऐसा कवि रहता था, जिसे लोग उसके नाम से कम और उसके स्वभाव से ज्यादा पहचानते थे।

फक्कड़ आदमी, जिसे दुनिया ‘निराला’ कहने लगी

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जीवन किसी कवि का कम और किसी संन्यासी का ज्यादा लगता है। अभाव उनके साथ जन्म से नहीं था, लेकिन जीवन ने उन्हें लगातार कठिन परीक्षाओं से गुजारा। पत्नी का असमय निधन, बेटी सरोज की मृत्यु, आर्थिक संकट और सामाजिक उपेक्षा – इन सबने उन्हें तोड़ा जरूर, लेकिन झुकाया नहीं। दारागंज उनके जीवन का अहम पड़ाव बना।

प्रयागराज के साहित्यकार अमृत राय ने अपने संस्मरणों में निराला की फक्कड़ प्रकृति का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उनके पास जो होता, वह भी किसी जरूरतमंद को दे देते थे। संचय उनके स्वभाव में नहीं था। प्रयागराज के पुराने लोग आज भी बताते हैं कि निराला को गंगा किनारे टहलते हुए कई बार देखा जाता था। वे किसी औपचारिक साहित्यिक व्यक्तित्व की तरह नहीं दिखते थे। साधारण धोती, ढीला कुर्ता और विचारों में डूबा चेहरा। कोई पहचान भी न पाए कि यही आदमी हिंदी कविता की दिशा बदल रहा है।

उनकी कविता “वह तोड़ती पत्थर” का दृश्य भी इसी शहर की जमीन से जुड़ा है। इलाहाबाद की सड़क पर पत्थर तोड़ती एक महिला को देखकर उन्होंने जो कविता लिखी, वह केवल श्रम का चित्र नहीं, भारतीय समाज का दस्तावेज बन गई। यही निराला थे, जिन्होंने साहित्य को महलों से निकालकर सड़क पर खड़ा कर दिया।

वह घर, जहां घायल पक्षी भी परिवार का हिस्सा था

दारागंज से थोड़ा आगे बढ़िए, तो एक और घर मिलता है। वहां साहित्य की चर्चा भी होती थी और घायल गिलहरियों की मरहम-पट्टी भी। यह घर था महादेवी वर्मा का। महादेवी वर्मा को केवल छायावाद की प्रमुख कवयित्री कह देना उनके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। उन्होंने प्रयाग महिला विद्यापीठ के माध्यम से महिलाओं की शिक्षा को नई दिशा दी, लेकिन उनकी संवेदनशीलता मनुष्यों तक सीमित नहीं थी।

उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “मेरा परिवार” दरअसल मनुष्यों की नहीं, उन पशु-पक्षियों की कहानी है, जिन्हें उन्होंने अपने घर में आश्रय दिया। “गिल्लू”, “नीलकंठ”, “सोना”, “गौरा” जैसे पात्र आज भी हिंदी साहित्य के सबसे जीवंत संस्मरणों में गिने जाते हैं। महादेवी ने एक जगह लिखा था –

“स्नेह का अधिकार मनुष्य तक ही सीमित नहीं है।”

यही एक वाक्य उनके पूरे व्यक्तित्व को समझा देता है। उनके घर में निराला आते थे, पंत आते थे, बच्चन आते थे। युवा लेखक अपनी पांडुलिपियां लेकर पहुंचते थे। साहित्य वहां किसी औपचारिक गोष्ठी की तरह नहीं, परिवार की बातचीत की तरह होता था।

एक प्रेम कहानी, जिसने इलाहाबाद को हमेशा के लिए अमर कर दिया

हर शहर की एक किताब होती है। इलाहाबाद की वह किताब है – “गुनाहों का देवता”। इसके लेखक धर्मवीर भारती थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई और अध्यापन के बाद भारती आगे चलकर धर्मयुग के संपादक बने, लेकिन उनकी सबसे लोकप्रिय रचना की आत्मा इलाहाबाद ही रहा। चंदर और सुधा के प्रेम को पढ़ते हुए पाठक सिर्फ दो पात्रों के साथ नहीं चलता, वह पूरे शहर में घूमता है। विश्वविद्यालय की इमारतें, छात्र जीवन, पुस्तकालय, सिविल लाइंस की सड़कें – सब कुछ कहानी का हिस्सा बन जाते हैं।

वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह ने एक बातचीत में कहा था कि उत्तर भारत का शायद ही कोई विश्वविद्यालय रहा हो, जहां विद्यार्थियों ने “गुनाहों का देवता” पढ़कर अपने प्रेम की कल्पना न की हो। यह केवल उपन्यास नहीं था। एक पीढ़ी की भावनात्मक स्मृति था।

वह लड़का, जिसने जासूसी साहित्य को घर-घर पहुंचा दिया

साहित्य केवल कविता और उपन्यास नहीं होता। मनोरंजन भी साहित्य का हिस्सा है। यह बात इलाहाबाद ने बहुत पहले समझ ली थी। 26 जुलाई 1928 को इलाहाबाद जिले के नारा गांव में जन्मे असरार अहमद, जिन्हें दुनिया इब्ने सफ़ी के नाम से जानती है, बचपन से ही दास्तानों के दीवाने थे। यूइंग क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उनकी कल्पना लगातार विस्तृत होती गई। बाद में उन्होंने “जासूसी दुनिया” और “इमरान सीरीज” लिखी।

उनके पात्र – कर्नल फरीदी, कैप्टन हमीद और अली इमरान – उपमहाद्वीप के सबसे लोकप्रिय काल्पनिक पात्रों में शामिल हुए। साठ और सत्तर के दशक में उत्तर भारत के रेलवे स्टेशनों की पुस्तक दुकानों पर उनकी किताबों की मांग इतनी रहती थी कि नया संस्करण आते ही खत्म हो जाता था। दिलचस्प बात यह है कि इब्ने सफ़ी ने जासूसी साहित्य को केवल रहस्य तक सीमित नहीं रखा। उसमें हास्य, मनोविज्ञान और सामाजिक टिप्पणियां भी थीं।

कॉफी हाउस की वे मेजें, जिन पर साहित्य पकता था

इलाहाबाद के इंडियन कॉफी हाउस का जिक्र किए बिना इस शहर की साहित्यिक कहानी अधूरी रहती है। यह केवल रेस्तरां नहीं था। यह एक चलता-फिरता विश्वविद्यालय था। दोपहर बाद यहां ऐसी-ऐसी मेजें सजती थीं, जहां एक तरफ कवि बैठा होता, दूसरी तरफ पत्रकार, तीसरी तरफ वकील और चौथी तरफ विश्वविद्यालय का छात्र। बहस कभी नई कविता पर होती, कभी उर्दू अफसाने पर, कभी राजनीति पर। कॉफी ठंडी हो जाती थी, लेकिन बहसें गर्म रहती थीं।

कॉफी हाउस के पुराने कर्मचारियों ने बाद के वर्षों में कई संस्मरणों में बताया कि वहां आने वाले साहित्यकार नियमित चेहरे थे। कौन किस समय आएगा, किस मेज पर बैठेगा, यह लगभग तय रहता था। उन कर्मचारियों के नाम अब दर्ज नहीं मिलते, लेकिन वे अनजाने में हिंदी-उर्दू साहित्य के एक स्वर्णिम दौर के प्रत्यक्षदर्शी बन गए थे। उनके लिए वे ग्राहक थे, लेकिन इतिहास जानता है कि उन्हीं मेजों पर कई किताबों के बीज पड़े।

इसी शहर की शामें आगे चलकर अमरकांत, मार्कण्डेय, दूधनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया और नई कहानी आंदोलन की पीढ़ी तक पहुंचीं। इलाहाबाद की साहित्यिक दुनिया की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि यहां कोई अकेला नहीं था। एक पीढ़ी दूसरी को पढ़ रही थी, दूसरी तीसरी को तैयार कर रही थी और तीसरी आने वाली पीढ़ी के लिए रास्ता बना रही थी। यही वजह है कि यह शहर कभी सिर्फ एक लेखक का शहर नहीं बना। यहां पूरा साहित्य साथ चलता था।

नई कहानी की नई राजधानी

पचास और साठ का दशक आते-आते इलाहाबाद की साहित्यिक हवा बदलने लगी थी। कविता के साथ कहानी भी केंद्र में आ गई। अमरकांत, मार्कण्डेय, दूधनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, नरेश मेहता, उपेन्द्रनाथ अश्क, इलाचंद्र जोशी जैसे नाम साहित्य की नई पहचान बन रहे थे। इनमें से कई लोग एक-दूसरे के घर बिना सूचना पहुंच जाते थे। कहीं पांडुलिपि पढ़ी जा रही होती, कहीं कहानी पर बहस चल रही होती, कहीं कोई संपादक किसी नए लेखक को छापने का वादा कर रहा होता। इलाहाबाद में लेखक बनने का कोई औपचारिक स्कूल नहीं था। शहर ही उनका विश्वविद्यालय था।

अमरकांत : जिन्होंने साधारण आदमी को साहित्य का नायक बनाया

अगर इलाहाबाद ने निराला की फक्कड़ता देखी, तो अमरकांत का सादापन भी देखा। ज्ञानपीठ से लेकर साहित्य अकादमी तक सम्मान पाने वाले इस लेखक को देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था कि सामने हिंदी कथा साहित्य का इतना बड़ा नाम खड़ा है। उनकी कहानियों में बड़े लोग कम, छोटे लोग ज्यादा दिखाई देते हैं।

रिक्शा चलाने वाला…

क्लर्क…,

बेरोजगार युवक…

संघर्ष करती गृहिणी…

वे उन्हीं लोगों को साहित्य का केंद्र बनाते थे, जिन्हें समाज अक्सर किनारे कर देता है। शायद यही इलाहाबाद की सबसे बड़ी सीख थी। यह शहर आदमी को उसके पद से नहीं, उसके अनुभव से पहचानता था।

जब लेखक, संपादक और पत्रकार एक ही मेज पर बैठते थे

इलाहाबाद की पहचान सिर्फ किताबों से नहीं बनी। पत्रिकाओं और अखबारों ने भी उसे उतना ही समृद्ध किया। ‘लीडर’, ‘भारत’, ‘अमृत प्रभात’, ‘नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका’ और बाद में अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने ऐसी पीढ़ी तैयार की, जिसने पत्रकारिता और साहित्य के बीच कोई दीवार नहीं रहने दी। रिपोर्टर शाम को कहानी लिखता था। कवि अगले दिन संपादकीय पढ़ रहा होता था।

रवीन्द्र कालिया ने अपने संस्मरणों में कई बार इलाहाबाद के उस जीवंत साहित्यिक माहौल का उल्लेख किया है, जहां बहसें व्यक्ति पर नहीं, विचार पर होती थीं। दूधनाथ सिंह भी अपने संस्मरणों में इलाहाबाद को केवल एक शहर नहीं, बल्कि लेखकों की प्रयोगशाला बताते हैं। वहां असहमति भी थी। कटु आलोचना भी। लेकिन साहित्य सबसे ऊपर था।

फारूकी ने बुझती लौ को संभाले रखा

समय आगे बढ़ा। कई बड़े लेखक इस दुनिया से विदा होने लगे। लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि इलाहाबाद का साहित्यिक स्वर्णकाल खत्म हो गया। लेकिन उसी दौर में शम्सुर्रहमान फारूकी जैसे आलोचक और कथाकार लगातार यह साबित करते रहे कि परंपरा केवल अतीत नहीं होती। उन्होंने ‘शबखून’ जैसी पत्रिका के जरिए उर्दू साहित्य को नई दृष्टि दी। उनका उपन्यास “कई चांद थे सरे आसमां” केवल कथा नहीं, भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का दस्तावेज माना गया। फारूकी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे परंपरा का सम्मान करते थे, लेकिन उसे संग्रहालय में बंद नहीं होने देते थे।

नासिरा शर्मा और बदलता हुआ इलाहाबाद

समय बदल रहा था। नई पीढ़ी आ रही थी। इसी दौर में नासिरा शर्मा जैसी लेखिका ने हिंदी साहित्य को नया क्षितिज दिया। उनके लेखन में प्रयाग की मिट्टी भी है और ईरान की सामाजिक उथल-पुथल भी। यह इलाहाबाद की परंपरा ही थी कि यहां का लेखक अपने शहर से प्रेम करता था, लेकिन उसकी दृष्टि पूरी दुनिया पर रहती थी।

आखिर इस शहर में ऐसा क्या था?

यह सवाल बार-बार लौटता है। आखिर ऐसा क्या था कि एक ही शहर ने अकबर इलाहाबादी, फिराक, बच्चन, महादेवी, निराला, धर्मवीर भारती, इब्ने सफ़ी, अमरकांत, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह और न जाने कितने साहित्यकार दिए? शायद इसका जवाब किसी एक किताब में नहीं मिलेगा। कुछ लोग इसका श्रेय इलाहाबाद विश्वविद्यालय को देंगे। कुछ हाईकोर्ट को। कुछ आजादी के आंदोलन को। कुछ गंगा-जमुनी तहजीब को। और शायद सभी सही होंगे। क्योंकि यह शहर विचारों को मिलने की जगह देता था। यहां भाषा कभी दीवार नहीं बनी। हिंदी और उर्दू एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं थीं। वे एक ही शहर की दो आवाजें थीं।

और आज…

आज प्रयागराज बदल चुका है। नई सड़कें हैं। नई इमारतें हैं। नई पीढ़ी है। कॉफी हाउस की बहसें अब मोबाइल स्क्रीन पर सिमट गई हैं। मुशायरों की रातें पहले जैसी नहीं रहीं। अखबारों के दफ्तर भी बदल गए हैं। लेकिन कुछ चीजें अब भी बची हुई हैं।

विश्वविद्यालय की पुरानी इमारतें…

पब्लिक लाइब्रेरी की खामोशी…

हिंदुस्तानी अकादमी की दीवारें…

और उन अलमारियों में रखी किताबें, जिनके पन्नों से आज भी इलाहाबाद की खुशबू आती है।

चलते-चलते…

कई शहर अपने किलों पर गर्व करते हैं। कुछ अपने महलों पर। कुछ अपनी ऊंची इमारतों पर। इलाहाबाद का गर्व उसकी किताबें हैं। उसकी कलम है। उसके लेखक हैं। संगम का पानी हर बार नई लहर लेकर आता है। लेकिन शहर की असली धारा उन शब्दों में बहती है, जिन्हें अकबर इलाहाबादी ने हंसी में लिखा, फिराक ने मोहब्बत में, बच्चन ने दर्शन में, महादेवी ने करुणा में, निराला ने विद्रोह में, धर्मवीर भारती ने प्रेम में, इब्ने सफ़ी ने रोमांच में और अमरकांत ने आम आदमी के संघर्ष में ढाला।

शायद इसी लिए प्रयागराज सिर्फ एक शहर नहीं है। वह एक खुली किताब है। जिसका हर पन्ना पलटते ही कोई लेखक मिल जाता है। और आखिरी पन्ना बंद करते समय यही लगता है कि इस शहर की सबसे बड़ी इमारत न हाईकोर्ट है, न विश्वविद्यालय और न ही कोई स्मारक। उसकी सबसे बड़ी इमारत है – उसकी साहित्यिक स्मृति, जिसे समय आज तक ढहा नहीं सका।

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इसे एक शहर कहना आसान है, लेकिन समझना कठिन। दरअसल यह शहर एक साथ कई समयों में जीता है। यहां धर्म भी है, लोकतंत्र भी। यहां अदालत की भाषा भी है और कविता की भी। यहां इतिहास किताबों में कम, लोगों की स्मृतियों में ज्यादा दर्ज है। कई महीने पहले एक बुज़ुर्ग ने मुझसे कहा था -“किसी को प्रयागराज को जानना-समझना हो तो उसके लोगों से मिलिए, इमारतों से नहीं।” शायद उसी वाक्य ने इस शहर को देखने का मेरा नजरिया बदल दिया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक