कृत्रिम मेधा आज की दुनिया का सबसे बड़ा सच बन चुकी है। इसी सच को समझते हुए भारत ने वैश्विक स्तर पर कृत्रिम मेधा सम्मेलन की मेजबानी की। इस धरती पर किसी भी व्यवस्था को मानव ही बनाता है, और वही इसे लागू भी करता है। आग, पहिये से लेकर विकास का यह सफर कृत्रिम मेधा तक पहुंच चुका है। जिस मानव ने कृत्रिम मेधा को बनाया, अब वही इससे डरा हुआ है।
सवाल है कि क्या जिसने आविष्कार किया, उसे अपने आविष्कार से डरने की जरूरत है? इसी समय भारत की जमीन पर फ्रांस के राष्ट्रपति ने बच्चों को डिजिटल दुनिया के खतरे से बचाने पर जोर दिया। इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि बच्चों को आनलाइन दुनिया में उन चीजों से अवगत नहीं कराया जाना चाहिए जो वास्तविक दुनिया में कानूनी रूप से निषिद्ध है। उन्होंने ‘ग्रोक चैटबाट’ के दुरुपयोग का उदाहरण दिया, जहां बच्चों की छवियों को यौन कुंठाओं और दुराग्रहों से विकृत किया गया था।
मैक्रों का तर्क है कि वास्तविक समाज में हम बच्चों को बहुत ही चीजों से निषिद्ध रखते हैं। उनके कोमल मन को देखते हुए किसी भी तरह की हिंसा, यौन हिंसा, घृणा फैलाने वाली चीजों से दूर रखा जाता है। लेकिन सोशल मीडिया पर इन निषिद्ध चीजों तक बच्चों की पहुंच आराम से हो जाती है। फ्रांस में 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। मैक्रों चाहते हैं कि भारत भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बने।
औद्योगिक क्रांति के समय से ही बाजार को आविष्कार के जनक के तौर पर देखा गया है। कृत्रिम मेधा आज बाजार की जरूरत बन चुकी है। पारंपरिक उपभोग की चीजों के सिकुड़न के बाद कृत्रिम मेधा में बाजार को अपना नवजीवन दिखा है। अब यह समाज और उसके द्वारा चुनी गई सत्ता को तय करना है कि इसके बाजार को कितना विस्तार दे।
सोशल मीडिया व इंटरनेट को मैक्रों सभ्यतागत मुद्दा बताते हुए जोर देते हैं कि हमें बच्चों के लिए सुरक्षात्मक कदम उठाने चाहिए। इसे कानूनी मजबूरी नहीं सभ्यता की रक्षा के संदर्भ में ही लेना चाहिए। अहम यह है कि मैक्रों ने ये बातें जी-7 के सदस्य के बतौर कहीं। यह सुखद है कि एक सशक्त राजनीतिक मंच सोशल मीडिया के संदर्भ में बच्चों की सुरक्षा को मुद्दा बना रहा है। जाहिर है इस मंच पर यह मुद्दा और मुखर होगा।
बच्चों के मानसिक विकास पर इस बात का बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता है कि उनके लिए सीखने व सिखाने की प्रक्रिया कैसी है। एक संगणक आसानी से जोड़-घटाव, गुणा-भाग कर सकता है। लेकिन बच्चों के लिए जरूरी है कि वे ‘एक चिड़िया, दो चिड़िया और अनेक चिड़ियां’ से ही गिनती सीखें। अभिभावकों की तरह शिक्षकों, किताबों और दोस्तों से उनका वास्तविक संपर्क हो। किसी भी राष्ट्र के लिए वहां के बच्चे सबसे बड़ी राष्ट्रीय पूंजी हैं। उनकी सुरक्षा के लिए जरूरी है कि उन्हें इंटरनेट के बाजार की पकड़ से हर संभव दूर रखा जाए।
