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साहित्य का ‘आइटम स्वांग’

साहित्य में मूल्यवान वही माना गया जो मानवीय मूल्यों के साथ चले। लेकिन बीसवीं सदी के अंत में सोवियत रूस के विघटन के बाद मजबूत बाजार उत्तर आधुनिक मूल्यों के तौर पर मुठभेड़ कर रहा है।

Artसांकेतिक फोटो।

आज के समय के एक लोकप्रिय समझे जाने वाले कवि ने साहित्य की कसौटी क्या हो इस पर एक नई बहस को जन्म दिया है। एक कार्यक्रम में दिए अपने भाषण में उन्होंने कहा कि साहित्य की कसौटी क्या हो? क्या कसौटी ये हो कि उसके ट्विटर पर कितने फालोवर हैं, या ये हो कि उनकी रचनाधर्मिता की कैसी प्रतिबद्धता है। क्या उन्हीं चंद लोगों को साहित्य का पर्याय माना जाए जिन्हें चंद लोग पढ़ते हैं, या साहित्य उसे माना जाए जिसकी पहुंच व्यापक पाठकों तक हो।

लोकप्रियता और आभासी सफलता के विश्वास में डूबा कवि जब साहित्य की कसौटी क्या हो बताने लगे तो चिंता यह नहीं करनी चाहिए कि वह कह क्या रहा है। बल्कि बड़ा सवाल यह है कि वह कह क्यों रहा है, उसकी दुखती रग क्या है? दरअसल, हरी-पीली रूपल्ली पर चलने-नाचने वाली कामयाबी आपको सब कुछ तो दिला सकती है पर साहित्यिक गरिमा का वजन बढ़ेगा कलम की ईमानदार लिखावट से ही।

इस कचोट को दबाने के लिए ऊंची कीमत लगा खड़े किए मंचों से यह जुमला अक्सर उछाला जाता है कि साहित्य उसे माना जाए जिसकी पहुंच व्यापक हो। इन मंचों की सदारत आजकल जिन कवियों के पास है वे मंचों से मेरे पास इतनी महंगी फीस, ताली बजाते दर्शक हैं तुम्हारे पास क्या है, कह कर समाज के प्रति प्रतिबद्ध साहित्य को चुनौती देते रहते हैं।

चलिए हम साहित्य के इस स्वयंभू-पुरुष की समझ को साहित्य की ही कसौटी पर ही कसते हैं। साहित्य उसे कहते हैं जो अपने शब्दों के साथ अपने देशकाल से संवाद करे। लेकिन इन दिनों बाजार के दबाव में उन्हें साहित्यकार बताने की कोशिश की जा रही है, जिन्हें उन्हीं की भाषा में साहित्य का ‘आइटम सांग’ या सच कहें तो ‘आइटम स्वांग’ ही कह सकते हैं। वैसे हर दौर में मजमा लगाने वाले निपुण मदारी हुए हैं। लेकिन आप बस लोगों को इकट्ठा कर उस भीड़ से टिकट वसूल ताली बजवाने की व्यावसायिक क्षमता रखने भर से साहित्यकार की कतार में खड़े नहीं हो पाएंगे।

आखिर क्या वजह है कि इन दिनों साहित्य के मंचों पर ऐसे मजमा लगाने वालों को जुटाना जरूरी समझा जा रहा है, जो साहित्य को तो कमा कर कुछ नहीं दे रहे, उलटे साहित्य की आड़ में खुद का बाजार खड़ा करना चाहते हैं। इस बात को हम सिनेमा के जरिए ज्यादा समझ सकते हैं। शेक्सपियर ने ‘ओथेलो’ लिखा और दो सदियों के सफर में इस पर न जाने कितने नाटक हुए और फिल्में बनीं।

लेकिन जब ओथेलो पर ‘ओमकारा’ जैसी फिल्म बनती है तो बाजार के तकाजे सामने आ जाते हैं। सिनेमा बड़े बाजार का मामला है तो मुनाफा भी बड़ा होना चाहिए। ‘ओथेलो’ से पहली कतार में सीटी बजाने वाली जनता को जोड़ने के लिए ‘बीड़ी जलैले जिगर से पिया’ का आइटम सांग डाला जाता है, फिल्म के संवाद को गाली-गलौज से भरा जाता है। फिल्म चल भी जाती है, लेकिन एक बड़े रचनात्मक प्रयोग में बाजारू मिलावट के साथ।

दूसरी तरफ, विश्व साहित्य में ही टॉल्सटॉय जैसे नाम भी हैं, जिनके साथ छेड़छाड़ की गुंजाइश न के बराबर है। हिंदी में प्रेमचंद से रेणु तक कई मिसालें हैं, जिनके लिखे का हल्का संस्करण आप सामने नहीं ला सकते। लाएंगे भी तो आप खुद हल्के पड़ जाएंगे। मैकबेथ वाला प्रयोग हिंदी में अगर कभी चला भी तो ‘चंद्रकांता संतति’ जैसी गिनती की कुछ कृति के साथ। साफ है कि कुछ अपवादों के जरिए खड़ा किए गए कला और साहित्य के कुबेरवाद की ऐनक चढ़ाकर न तो साहित्य का औचित्य समझा सकता है और न ही साहित्य के इतिहास और वर्तमान को लेकर कोई सार्थक विमर्श खड़ा किया जा सकता है।

साफ है कि संप्रेषण का सम्मोहनी सिद्धांत आदमी को साहित्यकार नहीं बनाता बल्कि लतीफाबाज बनाता है। विडंबना यह है कि आज बीड़ी जलैलै सरीखी चीजों को ही साहित्य का सर्वश्रेष्ठ और प्रासंगिक प्रयोग बता कर उनका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। इस सबके पीछे बड़ा तकाजा और तर्क लाखों या करोड़ों रुपए का सौदा है, उसकी दीवानगी है।

साहित्य की कसौटी का मुद्दा तो तुक्केबाजी को बनाया गया। लेकिन आज के उन कवियों का क्या किया जाए जिनकी किसी कार्यक्रम में अपने कपड़े और चश्मे का ब्रांड बताने में ज्यादा दिलचस्पी रहती है। वे गुहार लगाते हैं कि मैंने अरमानी की शर्ट पहन ली तो क्या गुनाह किया। जब ये कवि आइपीएल में बिके खिलाड़ी की तरह अपने जिस्म पर चढ़े आवरण की कीमत का अनावरण करने में व्यस्त हो जाएंगे तो फिर कविता को कौन पूछेगा? ऐसे सफल व्यावसायिक कवियों की विशेषता होती है कि कोई सवाल करे या न करे, ये अपनी कीमत जरूर बताते हैं कि मैं कवि सम्मेलन में जाने के इतने पैसे लेता हूं।

गौरतलब है कि साहित्य का विमर्श जब इतिहास या आलोचना के रूप में किताबों में आया तो उसके लिए लिखित साहित्य को आधार माना गया। लेकिन साहित्य की अपनी निर्मिति में वाचिक का स्थान अक्षुण्ण रहा है। यही कारण है कि कई ऐसे रचनाकार जो छापाखाने के आने से पहले हो चुके थे, उनके साहित्य का भी हम अध्ययन करते हैं। कबीर और रैदास का साहित्य वाचिक से ही आया है।

वाचिक और लिखित दोनों का अभिष्ट एक है- मनुष्य के श्रेष्ठ भाव और सौंदर्य की तरफ बढ़ना। पर साहित्य का असल में जनतांत्रिकरण होता है छापाखाने आने के बाद से। वहीं से साहित्य का अर्थ और उद्देश्य भी बदलता गया। सामंती दौर तक साहित्य का उद्देश्य उपदेश देना या फिर मनोरंजन करना था। लेकिन जनतांत्रिकरण की प्रक्रिया में इसका उद्देश्य वृहत्तर हुआ। खास कर स्वतंत्रता आंदोलन में सामाजिक, राजनीतिक स्वतंत्रता और समानता का सवाल साहित्य से जुड़ता चला गया। आधुनिक मूल्य आने के बाद सिर्फ मनोरंजनदायी और उपदेशप्रद साहित्य मूल्यविहीन हो गए।

जनतांत्रिक साहित्य का वृहत्तर परिप्रेक्ष्य और उद्देश्य एक जगह पर ठहरा नहीं, आगे बढ़ता गया। व्यक्तिगत, राजनीतिक और सामाजिक से लेकर हर तरह की स्वतंत्रता की पैरोकारी करने वाला साहित्य इस दौरान लिखा गया। यह सिलसिला कुछ और प्रखरता के साथ आज भी जारी है। इसका सबसे उच्च रूप सोवियत क्रांति के रूप में देखा गया।

इसके बाद पूरी दुनिया में साहित्य को लेकर भी एक भाव गया कि यह सामाजिक बदलाव और क्रांति से भी जुड़ सकता है यानी दुनिया बदल सकता है। लेकिन जैसे ही बीसवीं सदी में सोवियत रूस के विघटन के साथ भूमंडलीकरण का दौर शुरू होकर बाजारवाद मजबूत होता है, पूरी दुनिया में मूल्यों को फिर चुनौतियों के कठघरे में रखा जाने लगा।

आज जब दुनिया बाजार की मार से कराह रही है तो ग्लोब के हर तरफ के देशों पर चल रहे जनांदोलन जनतांत्रिक साहित्य से ही ऊर्जा पा रहे हैं। एक दौर में मेरठ के छापेखाने से निकले उपन्यासों ने बहुत बड़ा बाजार खड़ा किया था। लेकिन आज उस तरह का बाजार खत्म होते ही उसका कोई मूल्य नहीं रह गया है।

इसके पहले भी चंद्रकांता संतति जैसी तिलस्मी रचनाएं रची गर्इं लेकिन आज उनका मूल्य कमतर हो गया है। ‘तुम्हारा नाम क्या है बसंती’ दर्शक आज भी दुहराते हैं लेकिन इन संवादों के पटकथा लेखकों को कभी साहित्य के खाते में नहीं डाला गया। व्यावसायिकता कभी भी साहित्य की मुख्यधारा नहीं बन पाई थी।

साहित्य में मूल्यवान वही माना गया जो मानवीय मूल्यों के साथ चले। लेकिन बीसवीं सदी के अंत में सोवियत रूस के विघटन के बाद मजबूत बाजार उत्तर आधुनिक मूल्यों के तौर पर मुठभेड़ कर रहा है। आज टीवी और इंटरनेट जैसे नए माध्यम भी हैं जो बिकाऊ साहित्य को श्रेष्ठतम बताने का दावा ठोक रहे हैं।

जो भी बिके, चाहे जैसे बिके की भावना को थोपा जा रहा है चाहे उसके अंदर कोई सामाजिक, राजनीतिक, मानवीय मूल्य न हों। जब बिकने को ही मूल्य मान लिया जाए तो ऐसे समाज और साहित्य से किस तरह के निर्माण की उम्मीद कर सकते हैं हम। बाजार में अपनी शुल्क सूची लगाए खड़े कवि नहीं चाहते हैं कि समाज के अंदर आर्थिक, राजनीतिक, लैंगिक विषमताओं को चिह्न्ति कर संवेदनशील साहित्य रचा जाए।

इनका मकसद सिर्फ अपने माल को बेचना है। ये कभी राम तो कभी राष्ट्र के नाम पर भुजाएं फड़कवाना चाहते हैं। ये राष्ट्रवाद को सिर्फ सैन्य राष्ट्रवाद से जोड़ कर उसे भी बेचना शुरू कर देते हैं। राष्ट्र और जातीयता को लेकर रवींद्रनाथ ठाकुर से लेकर प्रेमचंद को हाशिए पर करना चाहते हैं।

आप खुद को जिन कमजोर मूल्यों के साथ बेच रहे हैं वह साहित्य और समाज को कभी मजबूती नहीं दे पाएगा। इससे पहले मंच के जो धाकड़ कवि हमारे यहां रहे हैं। वे साहित्य में जरा भी कमजोर नहीं थे। निराला से से लेकर शिवमंगल सिंह सुमन तक संवेदना के साहित्यकार रहे हैं। लेकिन आज साहित्य का स्तर गिरा कर मंच को कीमती बनाया जा रहा है। साहित्य की कसौटी में कौन बनेगा करोड़पति का खेल शुरू तो कर दिया है लेकिन कल खेलते हुए बच्चों के लिए भी इनके साहित्य का कोई मूल्य नहीं रहेगा।

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