ताज़ा खबर
 

कृष्ण की लीलाओं से बंधा समा

संचारी भाव से पगे नृत्य में शिव के अनेक रूपों को भंगिमाओं और हस्तकों से उन्होंने दर्शाया। गंगा अवतरण प्रसंग का चित्रण करते हुए, मृदंगम और नटुवंगम के ताल अवर्तन पर हस्त संचालन और पद संचालन के जरिए शिव की जटा और गंगा के प्रवाह को मोहक अंदाज में दिखाया।

Author June 14, 2019 1:40 AM
भरतनाटयम नृत्यांगना मालविका सरूकई ने सात वर्ष की उम्र से नृत्य सीखना शुरू कर दिया था।

शशिप्रभा तिवारी

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्वर्ण जयंती के अवसर पर नृत्य समारोह का आयोजन किया गया। स्पीक मैके की ओर से आयोजित इस समारोह में भरतनाट्यम नृत्यांगना मालविका सरूकई ने शिरकत की। उनकी रसासिक्त प्रस्तुति देखकर हर दर्शक का मन आनंदित हो गया। उनके साथ मनोहारी संगत करने वाले कलाकारों में शामिल थे, नटुवंगम पर श्रीलता, मृदंगम पर एन बालाजी, वायलिन पर श्रीलक्ष्मी वेंकटरमणी और गायन किया मुरली पाथर्सारथी ने।

भरतनाटयम नृत्यांगना मालविका सरूकई ने सात वर्ष की उम्र से नृत्य सीखना शुरू कर दिया था। उन्होंने बारह वर्ष की उम्र में अपनी पहली प्रस्तुति अरंगेत्रम पेश की। इसके बाद वह लगातार सीखतीं रहीं और देश-विदेश में नृत्य प्रस्तुत करती रहीं। उनकी कला को पद्मश्री और संगीत नाटक अकादेमी सम्मान से सम्मानित किया गया है। इस समारोह में उन्होंने अपनी प्रस्तुति का आगाज नृत्य ‘शंभू महादेव’ से किया। यह संत त्यागराज की रचना ‘शंभो महादेव शंकर गिरिजारमण’ पर आधारित थी। यह रचना राग पंतुवराली और रूपकम ताल में निबद्ध थी।

संचारी भाव से पगे नृत्य में शिव के अनेक रूपों को भंगिमाओं और हस्तकों से उन्होंने दर्शाया। गंगा अवतरण प्रसंग का चित्रण करते हुए, मृदंगम और नटुवंगम के ताल अवर्तन पर हस्त संचालन और पद संचालन के जरिए शिव की जटा और गंगा के प्रवाह को मोहक अंदाज में दिखाया। आदि शंकराचार्य रचित श्रृंगारलहरी पर आधारित उनकी अगली पेशकश थी। रचना ‘श्रृंगारलहरी आश्रितजन शुभकरी’ में देवी पार्वर्ती के सौंदर्य का मनोरम वर्णन पेश किया। उनकी अगली पेशकश वरणम की तरह थी।

भक्ति श्रृंगार रस की पराकाष्ठा अगली पेशकश ‘कृष्णाकर्णामृत’ में दिखी। यह राग मालिका और ताल मालिका में निबद्ध थी। नायक कृष्ण के श्याम वर्ण को प्यासी गाय नदी समझती हैं, मोर श्याम मेघ समझते हैं और गोपिका उन्हें नव पल्लवयुक्त वृक्ष समझती है। इसके बाद, भी गोपिका सखी से पूछती है कि कृष्ण कौन है? इन भावों को आंगिक अभिनय, नेत्रों और चेहरे के भावों से बहुत ही मनभावन अंदाज में नृत्यांगना मालविका सरूकई ने पेश किया। कृष्ण के आगमन के दृश्य को पद्यांश ‘मौलीचंद्रकभूष मरकत स्तंभ अभिराम’ में गोपिका की चंचल मनोदशा को संचारी भावों के जरिए नृत्यांगना ने दर्शा कर, दर्शकों को विमुग्ध कर दिया।

वहीं इस प्रस्तुति का समापन वल्लभाचार्य के मधुराष्टकम के कृछ अंशों से किया। कृष्ण के मधुर रूप ‘अधरं मधुरं वदनं मधुरं’ के वर्णन से समां बंध गया। वास्तव में , स्थूल से सूक्ष्म अथवा साकार से निराकार का प्रतिपादन भारतीय शास्त्रीय कलाओं की देन है। इसे मालविका सारूकई ने अपने नृत्य के जरिए वाकई साकार कर दिया। उन्होंने तिल्लाना और वंदे मातरम को अपनी प्रस्तुति में समाहित किया। तिल्लाना बाला मुरली कृष्ण की रचना थी। यह राग वृंदावनी और आदि ताल में निबद्ध थी। इसमें भरतनाट्यम की तकनीकी बारीकियों को सशक्त पद व अंग संचालन में पेश किया। वहीं, उन्होंने अंतिम प्रस्तुति वंदे मातरम में भारत देश की समृद्धि और संपन्नता की कामना की। सच, मालविका सरूकई नृत्य प्रस्तुति का साक्षी होना, अपने-आप में अद्भुत संयोग होता है, जो दिल्लीवासियों को कभी-कभी ही मिल पाता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X