सन 1960 के दशक में इलाहाबाद (जिसे अब प्रयागराज कहते हैं) की सुबह किसी आम शहर की सुबह नहीं होती थी। अखबार की सुर्खियां दिन की शुरुआत तय नहीं करती थीं, वे सिर्फ एक बहाना होती थीं। असल शुरुआत तो उन सवालों से होती थी, जो छात्र रात से लेकर सुबह तक अपने साथ ढो रहे होते थे। ब्रेड पकौड़े की दुकानों पर भी चाय कम पी जाती थी, और वहां पर विचार ज्यादा उबलते थे। कोई रास्ते से गुजरता छात्र अगर किसी मोड़ पर रुक जाए, तो यह तय मान लिया जाता था कि वह किसी खबर को नहीं, किसी विचार को पढ़ रहा है। इस वातावरण में इलाहाबाद विश्वविद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं रह गया था, वह एक ऐसा जीवंत मंच बन चुका था, जहां समाजवाद एक सिद्धांत नहीं, एक रोजमर्रा की बातचीत थी, और राजनीति कोई दूर की चीज नहीं बल्कि छात्रावास के कमरों में बैठी हुई रात की सबसे करीबी साथी थी।

उस दौर के संस्मरणों और अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि राम मनोहर लोहिया तब छात्र चर्चा में मुख्य विषय होते थे। उनका नाम हर आम और गंभीर छात्र के मानस पटल पर रहता था। वह न तो केवल भाषणों के नेता थे, न ही केवल पुस्तकों की सोच। उनके विचार छात्रों के बीच ऐसे घुल चुके थे जैसे पानी में नमक, दिखते नहीं थे, लेकिन हर घूंट में मौजूद थे। समाजवाद यहां किसी पार्टी की पहचान नहीं था, बल्कि एक सवाल था – ‘समाज कैसा होना चाहिए?’ और यही सवाल हर बहस की शुरुआत और अंत दोनों था।

छात्रावास के कमरे, रात की चर्चाएं, बहस तथा विचारों की प्रयोगशाला

छात्रावास के कमरों में रातें किसी तय योजना के तहत नहीं, बल्कि अपने आप, स्वाभाविक रूप से जाग उठती थीं। ये कमरे अक्सर वैचारिक बहसों के केंद्र बन जाते थे। विश्वविद्यालय राजनीति पर हुए अध्ययनों में छात्रावासों और ऐसे अनौपचारिक स्थानों को एक तरह की ‘वैचारिक प्रयोगशाला’ के रूप में देखा गया है, जहां नए विचार आकार लेते और टकराते थे। एक कमरा, दीवारों पर पुराने पोस्टर चिपके हुए, हल्की-सी मद्धम रोशनी, इधर-उधर बिखरी किताबें, और खिड़की से आती हवा में पन्नों का हल्का-हल्का हिलना, और उसी बीच फर्श पर बैठे चार-पांच छात्र। घड़ी रात के बारह को पार कर चुकी थी, लेकिन समय जैसे वहां अपना मतलब खो चुका था। किसी को न घड़ी की जल्दी थी, न नींद की याद। फिर अचानक किसी ने सवाल उठा दिया – ‘क्या आजादी सिर्फ सरकार बदलने का नाम है?’

और जैसे ही यह सवाल हवा में आया, कमरे का माहौल बदल गया, दीवारें वही थीं, रोशनी वही थी, लेकिन माहौल भीतर से हिल गया। जवाब तुरंत नहीं आए, क्योंकि उस कमरे में जवाब देना उतना जरूरी नहीं था जितना रुककर सोचना। सवाल वहीं हवा में ठहर गया, लटका रहा, और उसी ठहराव से एक लंबी चर्चा शुरू हो गई – जो किसी पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं थी। कोई इतिहास से उदाहरण खींच लाया, कोई अपने गांव की जिंदगी को बीच में रखकर बात करने लगा, और कोई बस चुप बैठकर दूसरों को सुनता रहा, और उस चुप्पी में भी एक अलग तरह की भागीदारी थी, मानो वह भी बहस का ही हिस्सा हो। जवाब सीधे-सीधे नहीं आते थे, वे धीरे-धीरे टुकड़ों में बनते थे, कभी इतिहास से, कभी अपने अनुभवों से, और कभी आपसी असहमति के बीच से।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय: संवाद, असहमति और लोहिया की विरासत

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का यह समय इस बात का उदाहरण था कि पढ़ाई केवल कक्षा की चार दीवारों में नहीं होती। सुबह कक्षाएं चलती थीं, लेकिन असली शिक्षण शाम के बाद शुरू होता था। कटरा की चाय की दुकानें, सिविल लाइंस की सड़कें और विश्वविद्यालय के गलियारे मिलकर एक दूसरा विश्वविद्यालय बनाते थे। एक ऐसा बौद्धिक वातावरण, जिसे हिंदी आलोचक रामविलास शर्मा भी प्रयागराज को हिंदी साहित्य और वैचारिक बहसों का सबसे सक्रिय केंद्र मानने के संदर्भ में रेखांकित करते हैं।

जहां न कोई प्रवेश परीक्षा थी, न कोई पाठ्यक्रम, लेकिन सीखने की प्रक्रिया सबसे कठोर थी। यहां विचारों का मूल्यांकन नंबरों से नहीं, असहमति से होता था। समकालीन संस्मरणों में यह बात बार-बार मिलती है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय की बौद्धिक परंपरा में असहमति को भी एक अनुशासन माना जाता था, जैसा कि आलोचक और शिक्षाविद् विष्णुकांत शास्त्री अपने लेखन में इस विश्वविद्यालय की वैचारिक संस्कृति को रेखांकित करते हैं।

किसी मेज पर गांधी की अहिंसा पर चर्चा चल रही होती, तो दूसरी मेज पर मार्क्स की वर्ग-व्यवस्था पर बहस जारी रहती। कहीं अंबेडकर के सामाजिक न्याय की व्याख्या होती, तो कहीं ग्रामीण भारत की वास्तविकता को राजनीति से जोड़ने की कोशिश होती। और इन सबके बीच लोहिया का विचार एक सूत्र की तरह मौजूद रहता था, जिसके बारे में राजनीतिक इतिहासकार पॉल आर. ब्रास (Paul R. Brass) और दक्षिण एशिया को गहराई से समझने वाले राजनीतिक विज्ञानी क्र‍िस्‍टोफे जैफरलॉट (Christophe Jaffrelot) के अध्ययन भी यह संकेत देते हैं। ये दोनों इतिहासकार बताते हैं कि 1960 के दशक में उत्तर भारत की छात्र राजनीति पर समाजवादी विचारधारा, विशेषकर लोहिया की सोच, का गहरा प्रभाव था। जो सबको जोड़ता भी था और चुनौती भी देता था। उनका कहना सरल था, लेकिन प्रभाव गहरा – समानता कोई आदर्श नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद है।

छात्र सहमत भी होते थे, असहमत भी होते थे, पर नजरअंदाज नहीं करते थे

दिलचस्प बात यह थी कि लोहिया का प्रभाव किसी एक दिशा में नहीं था। वे किसी विचार को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत नहीं करते थे, बल्कि उसे सवाल की तरह छोड़ देते थे। और शायद यही कारण था कि छात्र उनसे जुड़ते भी थे और उनसे असहमत भी होते थे, लेकिन उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पाते थे। उनके विचारों ने छात्रों को यह सिखाया कि सहमति जितनी जरूरी है, असहमति उससे कम नहीं।

इसी असहमति और सहमति के बीच एक अजीब संतुलन बनता था। कोई किसी विचार से पूरी तरह सहमत नहीं होता था, लेकिन कोई किसी विचार को सुनने से इनकार भी नहीं करता था। यह एक अदृश्य समझ थी कि बहस रुकनी नहीं चाहिए। शायद यही प्रयागराज की सबसे बड़ी बौद्धिक विशेषता थी। यहां टकराव नहीं होता था, यहां संवाद होता था। और संवाद में जीत या हार नहीं होती थी, सिर्फ विस्तार होता था।

धीरे-धीरे यह वैचारिक वातावरण केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहा। यह शहर की सोच बन गया। छात्रावासों की दीवारों के बाहर भी वही प्रश्न घूमने लगे जो अंदर पूछे जाते थे। राजनीति अब अखबारों की खबर नहीं रह गई थी, वह लोगों की बातचीत का हिस्सा बन गई थी। कोई छात्र जब गांव लौटता, तो अपने साथ केवल किताबें नहीं ले जाता, वह सवाल लेकर जाता और सवाल फैलते जाते।

इस पूरे दौर में एक और चीज बहुत महत्वपूर्ण थी, वह थी समाजवाद का व्यवहारिक रूप। यह केवल भाषणों में नहीं था, यह रोजमर्रा की चर्चा में था। कोई छात्र अपने साथी से पूछता – ‘अगर समाज बराबरी चाहता है, तो शुरुआत कहां से होगी?’ और यह सवाल किसी किताब में दर्ज नहीं होता था, लेकिन हर कमरे में दोहराया जाता था।

रातें अक्सर किसी निष्कर्ष पर खत्म नहीं होती थीं। वे किसी नए सवाल पर खत्म होती थीं। और शायद यही उस समय की सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि किसी को अंतिम उत्तर नहीं चाहिए था, सभी को बेहतर सवाल चाहिए थे। यही सवाल आगे चलकर केवल विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहे, उन्होंने उत्तर भारत की राजनीति की दिशा बदलने में भूमिका निभाई।

समय बीतता गया। शहर बदल गया, विश्वविद्यालय बदल गया, छात्र बदल गए। लेकिन एक चीज आज भी बची रह गई यानी सवाल पूछने की आदत। और शायद यही लोहिया की सबसे स्थायी विरासत है, जो किसी भाषण या किताब में नहीं, बल्कि उन अनगिनत रातों में दर्ज है जब युवा नींद से ज्यादा विचारों को जरूरी समझते थे।

और जब हम आज पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वह पूरा दौर किसी आंदोलन की तरह नहीं दिखता। वह एक लंबे संवाद की तरह दिखता है। ऐसा संवाद जो कभी पूरा नहीं हुआ, बस अलग-अलग पीढ़ियों में आगे बढ़ता रहा।

यह भी पढ़ें: प्रयागराज: जब बहस और असहमतियों से गढ़े जाते थे विचार – बच्चन, फिराक और शहर का साहित्यिक ताप | संगम तीरे

‘कविता का अर्थ क्या है?’ कक्षा में बैठे एक छात्र का यह सीधा-सा सवाल था, और सामने खड़े थे फिराक गोरखपुरी। समकालीन संस्मरणों में बताया गया है कि ऐसे ही एक प्रसंग में उन्होंने मुसकुराकर कहा था कि कविता को समझने से ज्यादा उसे महसूस करना जरूरी है; यदि भीतर संवेदना नहीं जागी, तो अर्थ भी निष्प्राण रह जाएगा। यह वाक्य केवल एक शिक्षक का जवाब नहीं था, बल्कि एक पूरे शहर की सांस्कृतिक चेतना का सार था – एक ऐसा शहर, जिसे आज प्रयागराज कहा जाता है, लेकिन जिसने प्रयागराज के नाम से एक ऐसा साहित्यिक दौर जिया, जहां शब्द सचमुच सांस लेते थे। उस समय का प्रयागराज किताबों में बंद नहीं था, वह गलियों में चलता था, चाय की भाप में उठता था, कॉफी हाउस की मेजों पर बैठकर बहस करता था और रात के सन्नाटे में किसी अधूरी कविता की तरह फुसफुसाता था। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक