tradition

दुनिया मेरे आगे: तारीखों की छवियां

अब तो हम नए साल में सफर शुरू कर चुके हैं। एक समय था जब साल के आखिरी महीने के तौर पर दिसंबर के सिमटना शुरू होते ही नए कैलेंडर और डायरियों के जुगाड़ वास्ते मन भटकता था।

राजनीति: भविष्य की चुनौतियां और शिक्षा

विश्व के समक्ष एक जो बहुत बड़ी चुनौती उभरी है, वह है- साथ-साथ रहना सीखना! ऐसी कोई शिक्षा व्यवस्था जो केवल ज्ञान देने का प्रयत्न करती है और परीक्षा के प्राप्त अंकों को ही उपलब्धि का मानक मानती है, इसमें सहायक नहीं हो सकेगी। भारत को ऐसे शिक्षित युवा तैयार करने हैं जो हर प्रकार की विविधता को स्वीकार करते हुए किसी भी क्षेत्र में योगदान करने की क्षमता से युक्त हों।

दुनिया मेरे आगे: स्वार्थ का समाज

इसमें कोई दो राय नहीं कि समय के साथ सामाजिक व्यवस्था और परंपराएं भी बदली हैं। ऐसे में लोगों की मानसिकता में भी अगर बदलाव आए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। यों जब-जब बदलाव होता है, तब लोगों की उम्मीद यह रहती है कि यह अच्छे के लिए हो, बुरे के लिए नहीं। यह अलग बात है कि आमतौर पर होता इसका उल्टा है।

दुनिया मेरे आगे: परंपरा का बोझ

कई बार अकाल मौत की वजह से अपनों को खोने के दुख के साथ-साथ ऐसे मृत्यु-भोज का आयोजन आर्थिक दबाव के साथ भावनात्मक और मानसिक आघात भी पहुंचाता है। हालांकि इसकी शुरुआत के पीछे के मुख्य कारणों को ठीक से समझा जाता तो शायद यह आज एक कुरीति बन कर नहीं रह जाता।

समाज : सफाई और परंपरा

स्थिति बिगड़ी है तब वृक्षारोपण की याद आने लगी है। वृक्षारोपण या पौधारोपण के नाम पर करोड़ों रुपए बर्बाद होते हैं।

विमर्श : हमारी अध्यात्म परंपरा और वर्तमान दशा

तत्त्व को अलग-अलग दृष्टियों से देखने के कारण तथा भाषिक अभिव्यक्ति के कारण पंथ-भेद हो जाते हैं। इस विश्व में सभी पदार्थों की सत्ता है। सत्ता अणु में भी है और महत् में भी है। ‘सत्ता’ एक भी है और अनेक भी है। ‘सत्ता’ सत् भी है और असत् भी है। ‘सत्ता’ चेतन भी है […]

आज का राशिफल
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