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साहित्यः बाजार में रचनाधार्मिता

रचना को अधिक से अधिक पढ़ा जाए- यह आज के लेखक-प्रकाशक का प्राथमिक उद्देश्य नहीं है। प्राथमिक उद्देश्य है उसकी बिक्री, अनुवाद, प्रचार, चर्चा। फिर अनुवाद और चर्चा की चर्चा। इस तिकड़म में लगे लोग एक से एक तरीका निकालते जा रहे हैं।

रम्य रचना : अध्यक्षता में दफ्न

शायद कभी अध्यक्षता से फुरसत मिले और वह जीवन को उस तरह से जीने की सोचे जिस तरह से जीने के लिए जीवन बना होता है। फिलहाल, ऐसा होता दीखता नहीं।

रेखाचित्रः धुन्नी

मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ की शुरुआत इस तरह से है- ‘रमजान के पूरे तीस रोज बाद ईद आई…।’ किस तरह ईद का आना कहानी के मुख्य पात्र हामिद के गांव के सूरज में एक नई रोशनी, नई उमंग भर देता है।

भाषाः बोलियों की शक्ति

हिंदी की शक्ति बोलियों में छिपी है। हिंदी प्रदेश की प्रमुख बोलियों- जैसे भोजपुरी, मैथिली, वज्जिका, अंगिका, अवधी, ब्रज आदि में तो इस विविधता को खासकर महसूस किया जा सकता है।

पराकरषण

अपनी बाल-सखी सीमा के दमकते चेहरे को अनामा देखती रह गई। इतना अपूर्व रूप! सीमा पहले भी सुंदर दिखती थी, पर इस समय उसके चेहरे पर नवयौवन की ताजगी, मधुरिमा और कमनीयता एक साथ उतर आई थी।

मीडिया : धारणा बनाम हकीकत

अमित चमड़िया भारत की ज्यादातर आबादी आज भी मीडिया द्वारा परोसी गई सामाग्री को स्वाभाविक मानती है। शायद उसमें खबरों के विश्लेषण की क्षमता विकसित नहीं हो पाई है। सार्वजनिक स्थानों पर बातचीत के क्रम में लोग अपनी बात को जायज ठहराने के लिए अक्सर कहते हैं, यह बात फलां अखबार में छपी है या […]

सिनेमा : अवांछित तर्क

महेंद्र राजा जैन फिल्म निर्माताओं को राहत देते हुए पिछले दिनों फिल्म सेंसर बोर्ड की सात घंटे तक चली बैठक में सदस्यों ने इस बात पर जोर दिया कि बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा फिल्म निर्माताओं को अंगरेजी और हिंदी के अट्ठाईस अवांछित शब्दों की सूची बना कर भेजना ही नहीं, बल्कि यह सूची बनाना भी […]

अप्रासंगिक : प्रश्न परंपरा

अपूर्वानंद प्रश्न करें या न करें: प्रश्न यही है! रोमिला थापर ने निखिल चक्रवर्ती की याद में दिए व्याख्यान में यह सवाल उठाया। यह शेक्सपीयर की प्रसिद्ध उक्ति के साथ एक शब्द-क्रीड़ा मात्र न थी। रोमिला की चिंता भारत के वर्तमान परिदृश्य को लेकर ही थी और है। उन्हें लग रहा है कि हम समाज […]

निनाद : सुर धरोहर

कुलदीप कुमार इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो उसकी दिशा ही बदल देते हैं। 1837 में जब तक जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में सफलता नहीं पाई थी, तब तक किसी को नहीं पता था कि भारत और अफगानिस्तान में फैले अशोक स्तंभों और शिलालेखों पर क्या इबारत खुदी हुई थी। […]

दक्षिणावर्त : बंद आंखों का खुलापन

तरुण विजय समय की रफ्तार बदल रही है और कुछ तो ऐसा नयापन है जो द्वार पर दस्तक दे रहा है। आप चाहें तो सुनें और देखें या जी कड़ा करके, जीवाश्म बन चुके पूर्वग्रहों से चिपके उन्हें अनदेखा, अनसुना कर दें। भारत तो बढ़ेगा ही, श्रेय आप किसी को दें या न दें, बढ़ते […]

समांतर संसार : परीक्षा की घड़ी

सय्यद मुबीन ज़ेहरा इस समय जबकि सारा देश आम बजट की बारीकियों में उलझा है, हमारी उलझन का कारण कुछ और है। देश भर में बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाएं आरंभ हो रही हैं। इसमें बारह लाख से अधिक विद्यार्थी भाग लेने जा रहे हैं। बारहवीं कक्षा की परीक्षा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है […]

अभिमत : आम आवाज की ताकत

शंभुनाथ ‘रंगभूमि’ (1925) का अंधा सूरदास उजबक-सा दिखता है, पर पहला आम आदमी है जो अपनी जमीन बचाने के लिए निर्दय औद्योगिक विकास और राजनीतिक छल-छद्म से बहादुरी के साथ लड़ता है। उसके पास एक भीतरी आंख है, जो इतिहास, राजनीति और औपनिवेशिक बौद्धिकता से ऊपर उठ कर देखती है। वह परिघटनाओं के बीच इस […]

साहित्य : अदृश्य पत्रिकाएं

वेंकटेश कुमार हिंदी में चार सौ से भी ज्यादा साहित्यिक पत्रिकाएं छपती हैं। लेकिन इस देश में एक भी ऐसी जगह नहीं जहां एक साथ बीस-पच्चीस साहित्यिक पत्रिकाएं बिक्री के लिए उपलब्ध हों। प्रत्येक वह व्यक्ति जिसकी साहित्य में दिलचस्पी है, इस बात का रोना रोता रहता है कि उसे पत्रिकाएं नहीं मिल पातीं। फिरलेखक, […]

प्रतिक्रिया : मुसलमान की मुश्किल

चांद खां रहमानी अपूर्वानंद ने ‘ओबामा का गांधी-स्मरण’ (8 फरवरी) में बहुत साहसिक ढंग से सारगर्भित बात कही है। ‘घृणा और असहिष्णुता का अभ्यास किया जाता है और समाज को धीरे-धीरे उसकी आदत पड़ जाती है। जो घृणा का लक्ष्य है, वह निरंतर उसे सहते हुए मानने लगता है कि उसी में कुछ कमी है, […]

राजनीति : आज के बाद ‘आप’

सुधीर चंद्र आज खुशी का दिन है। जीत का दिन। अब तक की जिल्लत और बेचारगी को भुला, अच्छे दिन की उम्मीद का दिन। अभी नौ महीने भी नहीं हुए हैं जब कुछ इसी तरह की उम्मीद हुई थी आम नागरिक को। वह उम्मीद अंशत: भी पूरी हुई होती- आसार भी होते उसके पूरा होने […]

समांतर संसार : स्त्री का विजय पर्व

सय्यद मुबीन ज़ेहरा लोगों ने बहुत सोच-समझ कर एक ऐसी पार्टी को सरकार चलाने की जिम्मेदारी सौंपी है, जो दिल्ली की तकदीर बदलने का दावा करती रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में कसर रह गई थी, लेकिन इस बार पांच साल केजरीवाल को दे दिए गए हैं। अब या तो काम करेंगे और अन्य राज्यों […]

दक्षिणावर्त : बस देश न हारे

तरुण विजय घृणा, विद्वेष और घनीभूत ईर्ष्या के बिना क्या राजनीति हो सकती है? उत्तर प्रदेश में जब पचास के दशक में जनसंघ की हार के बावजूद पं. दीनदयाल उपाध्याय ने कहा- ‘हम जीत गए’ तो स्तब्ध कार्यकर्ताओं को उन्होंने समझाया- भाई, जो भी जीता, है तो आखिर भारतीय ही। इससे तो लगता है विद्वेष […]

अप्रासंगिक : ओबामा का गांधी-स्मरण

अपूर्वानंद ‘भारत में पिछले कुछ समय में हर प्रकार के मतावलंबियों को मात्र उनके विश्वास के कारण दूसरे मत के लोगों द्वारा निशाना बनाया गया है, ये असहिष्णुता की ऐसी घटनाएं हैं कि गांधीजी को, जिन्होंने उस राष्ट्र की मुक्ति में भूमिका निभाई, सदमा पहुंचता।’ बराक ओबामा के इस वक्तव्य पर भारत में परस्पर विरोधी […]