Society

चौपाल : प्रतिगामी प्रवृत्ति

भीड़तंत्र का उत्थान पिछले कुछ वर्षों से अक्सर देखने को मिल रहा है। कठुआ से लेकर हाथरस तक। दादरी से लेकर धातकीडीह तक। ऐसी बहुत सारी घटनाओं को भीड़ द्वारा जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है।

चौपाल: वक्त का पहिया

हमारे अभिवावक अपनी पूरी जिंदगी की कमाई बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा करने में लगा देते हैं। वे हमसे, हमारे साथ से ज्यादा कुछ नहीं चाहते हैं। उन्होंने हमें बहुत प्यार से बड़ा किया होता है।

तीरंदाज: इतिहास में गधे

हर तरफ से गधों की पुन: इतिहास लिखने की जुर्रत पर वार होने लगा था। पर गधे अड़ गए। पीपल वाले ने इन तत्त्वों के खिलाफ दुलत्ती अभियान छेड़ दिया। उपद्रव इतना बढ़ा कि दूर जंगल में सो रहा शेर जाग गया।

दुनिया मेरे आगे: अच्छा बनाम बुरा

अच्छाई अपने आप में हम सबके जीवन का साध्य है। बुराई के साधन से अच्छाई को हासिल करने की पहल करना यानी अपनी जीवनी शक्ति को ही नकारना है। दिन इसलिए दिन है कि वह हमेशा प्रकाशवान रहता है। प्रकाश खत्म तो दिन खत्म हैं। इसी तरह अच्छाई भी अपने-आप ही अच्छी है।

दुनिया मेरे आगे: प्रश्न बनाम प्रतिक्रिया

बालक गुरु गोबिंद सिंह के सवाल का आदर उनके पिता तो करते ही हैं, पूरी सभा भी सदका करती है। गुरु गोबिंद के पिता ने कहा कि कौम की रक्षा के लिए तत्काल एक बलिदानी की जरूरत है, बलि कौन देगा। बारह वर्षीय गोविंद सिंह कहते हैं- ‘पिताजी आपसे बड़ा बलिदानी कौन? आप अपना बलिदान देकर दूसरों की प्रेरणा बनें।’

दुनिया मेरे आगे : ढलती सांझ का दुख

मेरी नजरें लगातार उन्हें ढूंढ़ रही थीं। अपनी बात रखते हुए अंत में मैंने सभी वृद्धों का अभिवादन किया। मेरी बातें शायद कुछ ज्यादा भावुक हो गई थीं, क्योंकि वहां बैठे लगभग सभी बुजुर्गों की आंखों में आंसू थे।

समाज : सफाई और परंपरा

स्थिति बिगड़ी है तब वृक्षारोपण की याद आने लगी है। वृक्षारोपण या पौधारोपण के नाम पर करोड़ों रुपए बर्बाद होते हैं।

अकेलेपन का अंधेरा

आत्महत्या को समझने के लिए पुलिसिया जांच की जरूरत नहीं होती, बल्कि सामाजिक तौर पर इसकी जांच होनी चाहिए।

स्वच्छता का समाज

यह कोई छिपी बात नहीं है कि जगह-जगह थूकने से कई तरह के रोग फैलने की आशंका हमेशा बनी रहती है।

समाज : आंबेडकर का सपना

1950 के दशक में बेटियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार देने की बात करना आसान नहीं था। जो भी यह बात करता उसके विरुद्ध आम जनता का जाना स्वाभाविक था।

सफाई, समाज और सरकार

हमारे देश में सफाई भी वही रख सकता है, जिसके पास सफाई रखने के साधन हों। पानी हो। रहने के लिए साफ-सुथरी हवादार जगह हो।

दुनिया में एक चौथाई मौतों के लिए पर्यावरण जिम्मेदार: WHO

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि दुनिया में होने वाली कुल मौतों में से एक चौथाई के लिए पर्यावरणीय कारक जैसे वायु, जल और भूमि प्रदूषण, तथा असुरक्षित सड़कें और कार्यस्थल का तनाव आदि जिम्मेदार हैं।

रिश्तों के तार

पुरानी पीढ़ी को भी यह समझने की जरूरत है कि दुनिया में संचार और संपर्क का जरिया और संजाल फैलते जाने के दौर में आज की पीढ़ी पहले के मुकाबले तेजी से बदल रही है।

समाज : निर्भया और हिंसा का मिथ

निर्भया कांड और उसके चरम हिंसात्मक प्रतिबिंबों से दहला यह समाज अपनी प्रतिक्रिया से उसे हर संभव ऐतिहासिक बना गया, फिर भी हिंसा का मिथक यहां इतिहास का पीछा नहीं छोड़ रहा..

दोहरी जिम्मेदारी का वक्त

समाज सामुदायिक भावनाओं की वह इकाई है, जिसके व्यापकता ग्रहण करने पर राष्ट्रीय स्वरूप सामने आता है। सामाजिक संदर्भों में समाज की रचना एक समन्वित सोच को पुष्ट करती और एक चेतनाशील विचार बिंदु को उभारती है..

शिक्षा का समाज

पिछले दिनों गांव जाना हुआ तब पता चला कि शहरी सभ्यता का जामा ओढे़ बहुत सारे लोग कुछ मायने में ग्रामीण इलाकों में रह रहे कई लोगों के मुकाबले कितना पीछे हैं.

दरारों का क्या काम

ठीक ही यह माना जाता है कि यह दायित्व माता-पिता का ही है कि वे अपनी संतान में ‘साझा’ करने का संस्कार डालें। अगर बच्चा कोई चीज खा-पी रहा है और वहां दूसरे भी मौजूद..

बचपन : भय के माहौल में कोमल मन

हमारे समाज में बच्चों को शक्ति और सत्ता से नियंत्रित करने की परंपरा और उसकी स्वीकृति बड़े पैमाने पर और बहुत पहले से रही है। अपने विचारो को बहुत ज्यादा बदल नहीं पाए हैं हम…

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