‘संगम तीरे’ एक ऐसी साहित्यिक-आत्मकथात्मक श्रृंखला है, जो स्मृतियों, समाज और समय के संगम पर खड़े जीवन के विविध रंगों को शब्द देती है। इसमें प्रयागराज (जिसका पुराना नाम इलाहाबाद था) शहर, गलियां, लोग, परंपराएं और बदलते दौर की आहट – सब कुछ एक साथ जीवित हो उठता है। यह सिर्फ अतीत का पुनर्स्मरण नहीं, बल्कि उस जीवन-दृष्टि की खोज है, जिसने व्यक्ति और समाज दोनों को आकार दिया। इस श्रृंखला के माध्यम से लेखक अपने अनुभवों, देखे-सुने प्रसंगों और संवेदनाओं को पाठकों तक पहुंचाते हुए उस सांस्कृतिक धरोहर को संजोने का प्रयास करता है, जो समय के साथ धुंधली पड़ती जा रही है। ‘संगम तीरे’ दरअसल उस भावभूमि की यात्रा है, जहां व्यक्तिगत स्मृतियां व्यापक सामाजिक सचाई से जुड़ती हैं।
इसमें इलाहाबाद विश्वविद्यालय की शैक्षिक परंपरा, शहर की राजनीतिक और साहित्यिक हलचल, पुराने मोहल्लों के किस्से, रहन-सहन और बदलते सामाजिक ताने-बाने को विस्तार से उकेरा गया है। गंगा-यमुना के संगम की आध्यात्मिक आभा, शहर की सांस्कृतिक विरासत, पुराने जमाने के खानपान और सोच-विचार की झलक भी इसमें मिलती है। आजादी की लड़ाई से जुड़े पंडित नेहरू की विरासत, चंद्रशेखर आजाद की शहादत, इलाहाबाद हाईकोर्ट की ऐतिहासिक भूमिका, संयुक्त प्रांत की राजधानी रहे इलाहाबाद के दौर, कंपनी बाग में स्थित पुरानी विधानसभा, उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) और पुलिस मुख्यालय जैसी संस्थाओं से जुड़े किस्से और प्रसंग भी इस श्रृंखला का हिस्सा हैं।
इसके साथ ही शहर के मंदिरों, घाटों, मठों और अखाड़ों की परंपराएं, मुस्लिम दायरों और दरगाहों की रूहानी विरासत, संतों, फकीरों, सूफियों और औघड़ों की जीवंत उपस्थिति भी यहां उभरती है। यह केवल आस्था के स्थलों का वर्णन नहीं, बल्कि उस साझा सांस्कृतिक चेतना का चित्रण है, जहां विविध मान्यताएं और जीवन-दर्शन एक साथ सांस लेते हैं। साथ ही, पर्व-त्योहारों की परंपराएं, रीति-रिवाज और शहर की जीवंत सांस्कृतिक धारा इस श्रृंखला को और व्यापक बनाती है। ‘संगम तीरे’ दरअसल उस भावभूमि की यात्रा है, जहां एक शहर की आत्मा, उसकी स्मृतियां और उसका बदलता समय, संवेदनशीलता के साथ पाठकों के सामने सजीव हो उठता है।