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बेबाक बोल: यौन हिंसा : मौन हिंसा

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के असोहा इलाके के बबुरहा गांव के बाहर संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई दो किशोरियों की अंत्येष्टि शुक्रवार की सुबह कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कर दी गई। पुलिस के अनुसार बबुरहा गांव में पशुओं के लिए चारा लेने गई तीन दलित किशोरियां खेत में संदिग्ध अवस्था में मिली थीं, जिनमें दो की मौत हो गई थी। तीसरी का इलाज चल रहा है। दोनों मृत किशोरियों के शव पोस्टमार्टम के बाद गांव लाए गए थे।

राजकाज-बेबाक बोल: कीलकर्म

एक बात तो साफ है कि यह आंदोलन एक-दो जगह और किसी खास कौम या जाति का मामला नहीं रह गया है। यह पूरे भारत का लंबे समय से खेती और किसानी के संकट से उपजा हुआ गुस्सा है जो बढ़ता जा रहा है।

राजकाज-कांग्रेस कथा-बेबाक बोल: विरोध और विरोधाभास

कभी सत्ता के खिलाफ बगावत का झंडा उठाने वाला बाद में सबसे पहले अपने खिलाफ उठी हर बागी आवाज को खत्म करना चाहता है। भारतीय राजनीति में बगावत से लेकर विरोधियों से अदावत की अब तक सबसे बड़ी मिसाल इंदिरा गांधी ही रही

बेबाक बोल-राजकाज-कांग्रेस कथा: सत्ता और संत

जयप्रकाश नारायण की अगुआई में जनता के प्रतिरोध की आंधी इंदिरा गांधी महसूस कर रही थीं। उस समय चंद्रशेखर ने उन्हें जेपी की ताकत की चेतावनी देते हुए उनके साथ सुलह-समझौते का रिश्ता बनाने की सलाह दी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने चंद्रशेखर की सलाह न मान कर संत को ही साधने की ठान ली। लेकिन संत से टकराने के बाद इंदिरा गांधी की सत्ता का विनाश हुआ। इसी तरह अण्णा हजारे के आंदोलन की ताकत पहचानने की नसीहत को सोनिया गांधी ने परे रखा और कांग्रेस रसातल में चली गई। आज दिल्ली की सीमाओं पर किसान संतन की तरह धुनी रमाए हैं और चंद्रशेखर जैसी भूमिका सुप्रीम कोर्ट निभा चुका है। हम गांधी से लेकर जेपी और अण्णा तक की कथा को एक बार फिर से सुनेंगे तो पाएंगे कि आजादी के पहले से लेकर आज तक के भारत में बड़े सियासी परिवर्तन उन्हीं संत जैसे लोगों के कारण हुए जिन्हें सत्ता का मोह नहीं था। बेबाक बोल में संतन से भिड़ी सत्ता पर बात।

बेबाक बोल- राजकाज- कांग्रेस कथाः एक समय की बात है

अब तक इंदिरा गांधी को निज के परिवार से मिली लोक की सत्ता पर अहंकार होने लगा था। उनका यह अहंकार टूटा 1972 में शिमला में हुए कांग्रेस कार्यसमित के चुनाव में।

बेबाक बोल-राजकाज-कांग्रेस कथा: शक और मात

दिल्ली की सीमाओं पर एक से दो डिग्री की कड़कड़ाती ठंड में जवान से लेकर बुजुर्ग किसान हौसले का अलाव तेज कर रहे थे तो कांग्रेस के खेमे की तरफ ‘राहुल कहां हैं’ का आलाप शुरू हो गया।

राजकाज-बेबाक बोल-कांग्रेस कथा 13: जहाज के पंछी

फिलहाल कांग्रेस भाजपा की नीति का कोई विकल्प नहीं दे पाई है। उसकी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि समस्या क्या है यह सभी समझ रहे हैं लेकिन उसका हल बताने और उस पर चलने का हौसला नहीं है।

राजकाज-बेबाक बोल-कांग्रेस कथा: इसलिए सुनो ये कहानी

2014 में कांग्रेस एक ऐसी कथा बन गई जिससे हर तरह की प्रेरणा तसल्लीबख्श ली जा सकती है। राजनीति में क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसके लिए बस कांग्रेस की तरफ देखिए। लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस से आज क्या सीख ली जा सकती है।

राजकाज-बेबाक बोल-कांग्रेस कथा 11: गरचे दकन में…

राष्ट्रीयता और हिंदुत्व के आधार पर भाजपा अपनी जिस राष्ट्रीय पहचान को बनाने में जुटी थी उसमें वह लगातार कामयाब होती दिख रही है। हैदराबाद का छोटा चुनाव हो या तमिलनाडु का आगे आने वाला बड़ा चुनाव, इसी राष्ट्रीयता और हिंदुत्व के आधार पर वह दक्षिण में भी अपने पांव पसार रही है।

बेबाक बोल-कांग्रेस कथा: वाम से राम तक

बंगाल अपनी राजनीतिक हिंसा के कारण भी जाना जाता रहा है। आम चुनावों के मसले के साथ यहां राजनीतिक पहचान की लड़ाई भी अहम है। तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दल और कांग्रेस। इन विरोधाभासी पहचानों के बीच कांग्रेस अपनी पहचान कैसे बनाएगी?

राजपाट: नेताओं की नैतिकता और सियासी सवाल

सत्ता के लिए समझौते तो करने ही पड़ते हैं। नीतीश कुमार को ही अपवाद कैसे कह सकते हैं। उनके पास भाजपा की शर्तों को मानने के सिवा और कोई विकल्प भी तो नहीं था।

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