Nature

दुनिया मेरे आगे: संवेदना का दायरा

मोर-मोरनी का सोसाइटी के परिसर तक आ जाना बच्चों को भी प्रफुल्लित करता रहा। चारों ओर सब कुछ बंद होने और अपने लिए सुरक्षित और खुला माहौल होने की वजह से निश्चित रूप से पक्षियों को उन्मुक्त विचरण का अवसर मिला और शायद वे थोड़े निर्भीक भी हो गए। लोगों के पास भी पक्षियों को देखने, तस्वीरें लेने और उनके बारे में बातचीत करने का समय मिला।

राजनीति: धरती के दोहन से बढ़ते संकट

बीती आधी सदी में धरती पर आबादी दोगुनी हो चुकी है, लेकिन इसी अवधि इंसानों ने अपने विकास और स्वार्थ के लिए धरती का इस तरह दोहन किया है कि जल, जंगल, जमीन से लेकर हर संसाधन पर उसका कब्जा हो गया है, जबकि शेष जीव-जंतुओं से उनकी रिहाइश, खाना-पीना और माहौल तक छिन गया है।

के. सिद्धार्थ का लेख : पर्यावरणीय नैतिकता और यथार्थ

अब सवाल यह है कि हम प्रकृति को किस रूप में देख रहे हैं और उससे क्या हासिल करना चाहते हैं। यह समझने की बात है कि पर्यावरण को संशोधित नहीं किया जा सकता और न ही उस पर कोई टिप्पणी की जा सकती है, और न ही इस पर तर्क किया जा सकता है।

लघुवृत्तांतः परिंदों का पानी- सुरेश्वर त्रिपाठी

रास्तों के दोनो ओर काफी झाडियां थीं जिनमें रह रहकर कोई पक्षी या जानवर दिखाई दे जाता। एक विचित्र प्रजाति का खरगोश दिखाई दिया।

अखिलेश आर्येंदु : वीरान होते गांव

गांवों से कुटीर उद्योग खत्म हो गए हैं। पेड़ लगातार काटे जा रहे हैं। कुएं सूख गए हैं और जो बचे हैं वे सूखने के कगार पर हैं।

शहरी नियोजन की बुनियाद

पश्चिमी आधुनिकता के अंधानुकरण के साथ पिछले एक-डेढ़ दशक से हमारे देश में विकास का यह सपना देखा जा रहा है कि हम जल्द ही ऐसा कुछ करें जिससे न्यूयॉर्क, शंघाई और तोक्यो जैसे महानगरों को मात दें और दुनिया को दिखाएं कि आधुनिकता में हमारा कोई सानी नहीं है।

नदियों की मुक्ति

जब सत्ता के तार पूंजी से जुड़ जाते हैं और संयोग से इसे धार्मिकता की भी आड़ मिल जाती है, फिर चाहे जंगल हो, जल या जमीन, सरकार द्वारा खड़ा किया गया विकास का दानव इनमें से किसी को भी नहीं बख्शता।

कथक में बहुरंग और प्रकृति का चित्रण

पिछले दिनों दिल्ली में नृत्य समारोह के आयोजन में प्रसार भारती अभिलेखागार की ओर से डीवीडी ‘पंडित बिरजू महाराज का कथक’ का लोकार्पण किया गया।

प्रकृति का सबक

साल 2015 जाते-जाते हमें बहुत कुछ सीख दे गया। खासकर पर्यावरण के प्रति क्या जिम्मेवारी होनी चाहिए इसके प्रति हमें आगाह और सजग कर गया..

प्रकृति के साए में

आज जरूरत है कि हम अपनी संवेदना को बचाए रखें। अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त न हो जाएं कि हमारे बीच से प्रकृति के बाकी तोहफे गायब हो जाएं। कुछ जिम्मेदारी सरकार ले और कुछ जवाबदेही हम भी लें.

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